बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

सामाजिक दायित्व से दूर होती मीडिया



human rights day-
उमाशंकर मिश्र
भारत देश जिसका संविधान समतावाद के सिद्धांत पर आधारित है, आज उस परिमाण में असमानतावाद का गवाह है जो औपनिवेशिक शासन के दौरान भी नहीं देखी गई। आज जो देश विश्व के अरबपतियों की सूची में चौथे स्थान पर है, मानव विकास के मामले में वही 126वें स्थान पर है।
ऐसा माना जा रहा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास का चक्का तेजी से घूमने लगेगा और सभी को समान अवसर प्राप्त हो सकेंगे, जिससे संतुलित विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। लेकिन इस तरह की विषमता आज क्यों देखने को मिल रही है, इस बात को लेकर विचार करने का समय आ गया है।
रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्र जैसे जनमाध्यम विभिन्न सरकारी, गैर सरकारी एवं सार्वजनिक हित से जुड़े तथ्यों, नीति एवं योजनाओं के बारे में जानकारी जनता तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इस तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होती है और जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने लगती है। अपने अधिकारों का ज्ञान हो जाने पर जागरुक नागरिक उनकी मांग के लिए आवाज उठाता है और इस तरह सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त होने लगता है।
सामाजिक पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण सूचना एवं जानकारी का अभाव होता है। यही कारण है कि ज्ञान को शक्ति माना गया है। मीडिया सूचना एवं समाचार प्रसार का माध्यम बनकर जागरुकता का प्रचार प्रसार करता है और इस तरह से पिछड़ेपन के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश रूपी चुनौती का सामना करना पड़ता है।
‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के मुताबिक मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो मानव के जीवन, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं।’ इसका अर्थ उन अधिकारों से लगाया जाता है जो मानव जाति के विकास के लिए मूलभूत हैं तथा मानव की गरिमा से सम्बंधित हैं और मानवीय गरिमा के पोषण के लिए आवश्यक हैं। मानव अधिकार कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि यह मानव-जीवन से जुड़ी वह मूलभूत आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति किए बिना गरिमापूर्ण जीवन का उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए जिन अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत है, उनकी समग्रता का नाम ही मानवाधिकार है।
चार जुलाई 1776 को ‘अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा’ में मानवाधिकारों को सर्वोच्च स्थान देते हुए यह स्वीकार किया गया कि, ‘हम इन सत्यों को स्वयंसिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य जन्म से समान हैं, सभी मनुष्यों को ईश्वर ने कुछ ऐसे अधिकार प्रदान किए हैं, जिन्हें छीना नहीं जा सकता और इन अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता और अपनी समृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहने के अधिकार भी सम्मिलित हैं।’
वास्तव में अधिकार कुछ दावों के रूप में प्रकट होते हैं, लेकिन सभी दावों को वैध करार होने की संज्ञा नहीं दी जा सकती। अधिकार वस्तुत: वे दावे होते हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है और राज्य के द्वारा लागू किए जाते हैं। उपरोक्त अवधारणा के बाद यह कहा जा सकता है कि मानव अधिकारों की उत्पत्ति मानव जीवन के प्रारंभ से हो गई थी, क्योंकि मानवाधिकारों का संबंध मानव से ही तो है। किन्तु समाज के प्रारंभिक काल में सत्ता की और पितृसत्ता की व्यवस्था होने के कारण मानव समाज में दासों, दलितों और महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाने लगा और उनके साथ शोषण और उत्पीड़न का सिलसिला चलता रहा। संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन से मानवाधिकारों की आवाज बुलंद होने लगी और इन पीड़ित वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना आई।
मानवाधिकारों को मूलाधिकार, आधारभूत अधिकार, अन्तर्निहित अधिकार तथा नैसर्गिक अधिकार भी कहा जाता है। मानव अधिकार की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है, इसलिए विभिन्न देश इसकी परिभाषा देशकाल के अनुरूप देते हैं। विकसित देश मानवाधिकार की परिभाषा को मनुष्य के राजनीतिक तथा मानवीय अधिकारों तक ही सीमित रखते हैं। भारत सहित अन्य विकासशील देश मानवाधिकारों के अंतर्गत राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार को भी शामिल करते हैं। चीन तथा इस्लामी राज्य कहते हैं कि मानवाधिकार की परिभाषा सांस्कृतिक मूल्य के अंतर्गत दी जानी चाहिए। अर्थात् मानवाधिकार में मनुष्यों के सांस्कृतिक अधिकार को भी शामिल किया जाना चाहिए।
आज पूरी दुनिया के लोगों के समक्ष मानव अधिकार एक समस्या के रूप में विद्यमान हैं। मनुष्य अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए दुनिया भर में प्रयत्नशील है। मामला चाहे गाजा पर किए जा रहे इस्राइली हमलों का हो या फिर पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबानियों के आतंक का। बात चाहे श्रीलंका में तमिलों पर किए जा रहे लिट्टे के अत्याचारों से जुड़ा हो या फिर भारत में नक्सली हिंसा की बात हो। मानवाधिकार की चीत्कार समाचार पत्रों के कालम से लेकर टेलीवीजन और रेडियो पर अकसर देखी-सुनी जा सकती है।
मानवाधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। सन् 1215 का मैग्नाकार्टा, सन् 1679 का बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम, सन् 1989 का विल आफ राइट्स, सन् 1776 में अमेरिका का स्वतंत्रता का घोषणा पत्र, सन् 1789 में मानव अधिकार संबंधी फ्रांस की घोषणा तथा सन् 1948 में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की घोषणा इस परंपरा के महत्वपूर्ण कदम हैं।
व्यक्ति के रूप में तथा समूह के तौर पर मानव के तीन मुख्य तथा अंतरसंबंधित लक्ष्य रहे हैं-जीवन का अस्तित्व, भरण-पोषण एवं सुरक्षा। पर्यावरण की सुरक्षा तथा पारीस्थितिकीय संतुलन भी मानव जीवन के लिए आवश्यक तत्व हैं। भरण-पोषण के लिए भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार और यातायात आदि की आवश्यकता होती है। सुरक्षा हेतु उसके मौलिक अधिकारों की समाज व राज्य द्वारा मान्यता सुनिश्चित करना और उनका उपभोग करने के लिए सामाजिक सहमति एवं वैधानिक आश्वासन आवश्यक है।
प्रसिद्ध विद्वान नंदकिशोर आचार्य ने अपनी पुस्तक ‘मानवाधिकार के तकाजे’ में लिखा है, ‘अधिकांश मानवाधिकारों को केवल असहमति व्यक्त करने के अधिकार तक सीमित कर पूंजीवादी राष्ट्र उस का उपयोग अपनी विदेश नीति के हित में करते रहे हैं और अपनी व्यवस्था में असहमति की अभिव्यक्ति के अधिकार की औपचारिक और लगभग प्रभावहीन स्वीकृति के माध्यम से अपने को लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों के समर्थक बताने का प्रयास करते रहे हैं। लेकिन यदि संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणा-पत्र की प्रस्तावना और घोषणा को पढ़ा जाये, जिसे महासभा ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है, तो मालूम होगा कि शायद ही कोई राष्ट्र होगा जो वास्तव में अपने नागरिकों एवं अन्य देशों के निवासियों के जीवन को मानवाधिकारों की भावना के अनुकूल विकसित करने के प्रयास कर रहा है।’
मानवाधिकारों की समग्रता की पृष्ठभूमि और प्रतिष्ठा को जनव्यापी बनाने में मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उपरोक्त बातों को ध्यान में रखा जाये तो मानवाधिकारों की भावना के अनुकूल नागरिकों के जीवन को ऊंचा उठाने में मीडिया प्रभावशाली साबित हो सकता है। मीडिया एक ओर जहां मानवीय सरोकारों के संरक्षण का माध्यम बनता है, वहीं वह मानवाधिकारों के प्रति जनचेतना जागृत करने की ताकत भी रखता है। लेकिन क्या मीडिया अपनी इस ताकत का उपयोग जनसरोकारों को पोषित करने में करता है? यह सोचने का विषय है।
मीडिया अपनी इस ताकत का सार्थक उपयोग करता है अथवा नहीं यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन यह तो तय है कि मीडिया के पास एक ऐसी शक्ति है जिससे जागरुकता का प्रसार संभव है और अंतत: यह जागरुकता लोगों को अपने मूल अधिकारों के प्रति सचेत करने में सहायक साबित होती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि जो मीडिया जागरुकता का प्रसार कर समाज में सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बन सकता है यदि उसके तंत्र पर बाह्य दबाव, राज्य का हस्तक्षेप, विभिन्न हित समूहों के द्वारा किये जाने वाले प्रोपेगेण्डा या फिर व्यावसायिकता हावी होगी तो उसका प्रभाव समाज पर नकारात्मक पड़ेगा।
ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाने वाला मीडिया न केवल अपने सामाजिक दायित्व से पथभ्रष्ट हो रहा है, बल्कि समकालीन एवं भावी समाज के लिए भी कांटे बोने का कार्य कर रहा है। यदि किसी विषयवस्तु की सटीक जानकारी प्रसारित करने के बजाय किसी व्यक्ति, समूह, संगठन, संस्थान, राज्य अथवा राष्ट्रों के हित की पूर्ति हेतु प्रायोजित प्रोपेगेण्डा के प्रचार-प्रसार का माध्यम जाने-अनजाने में मीडिया बनने लगे तो संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे में जनाधिकार हाशिये पर चले जाते हैं।
मानवाधिकार संरक्षण में सहायक मीडिया
ऐसा नहीं है कि मानवाधिकारों एवं मीडिया का अंर्तसंबंध महज प्रोपेगेण्डा तक ही सीमित है। इस बात को 11 अक्टूबर 1980 को इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली संस्करण के आंतरिक पृष्ठ पर मात्र एक कॉलम में “10 undertrials blame police for losing sight.” शीर्षक के तहत प्रकाशित खबर से समझा जा सकता है। इस खबर में बिहार की भागलपुर जेल में 10 कैदियों पर किए गए पुलिसिया अत्याचार की कहानी बयां की गई थी।
तभी इस मामले से जुड़ी एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas corpus petition) उच्चतम न्यायालय में बंदियों की ओर से दाखिल कर दी गई, जिन्होंने पुलिस पर तेजाब डालकर सभी कैदियों की आंखों की रोशनी छीन लिए जाने का आरोप लगाया था। इस छोटी सी रिपोर्ट ने उस समय बहुत अधिक प्रभाव नहीं दिखाया, लेकिन करीब एक महीने बाद इस खबर की एक खोजपरक विस्तृत फालो-अप रिपोर्ट ने पूरे देश ही नहीं संसद को भी झकझोर दिया।
‘अखबार के आवरण पृष्ठ पर 22 नवंबर 1980 को एक अंधे किए गए आदमी के चित्र के साथ “Eyes punctured twice to ensure total blindness” शीर्षक के तहत पूरी घटना की क्रमिक एवं विस्तारपूर्वक व्याख्या की गई। इंडियन एक्सप्रेस के पटना संवाददाता अरुण सिन्हा की इस रिपोर्ट ने अत्याचारों की ओर जनमानस एवं सरकार का ध्यान आकर्षित किया।
 बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने उस समय मामले की जांच के आदेश दे दिये। दो दिन बाद संसद में मामला उठाया गया। साप्ताहिक प्रकाशनों में इस घटना के अंधे किए गए कैदियों के चित्रों को और अधिक क्लोज-अप में साइकिल की तिल्लियों से छेदी गई आंखों की रक्त रंजित पुतलियों को दिखाया गया, जिन्हें बाद में तेजाब उंडेल कर झुलसा दिया गया था।’
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इस घटना से स्तब्ध रह गईं और उन्होंने तत्काल मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से फोन पर बातचीत कर स्थिति के बारे में जानकारी हासिल की। इसके करीब एक सप्ताह के बाद 30 नवंबर को 15 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया। इंडियन एक्सप्रेस की यह श्रृंखला काफी समय तक चलती रही और तत्कालीन कार्यकारी संपादक अरुण शौरी ने अपने लेखों में इस तरह के अत्याचारों को लेकर प्रशासन, पुलिस और जेल प्रक्रियाओं की जमकर आलोचना की।
भागलपुर जेल में घटित इस खौफनाक घटना की रिपोर्टिंग से एक तरह से यह साबित हो गया कि समाचार जगत की खोजपरक रिपोर्टें मानवाधिकार संबंधी जागरुकता के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं। इस घटना के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत जैसे देश का पारंपरिक जनसमाज जो भ्रूण हत्या, सती प्रथा, बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम, दलित अत्याचार और हिंसा जैसी कुरीतियों से आज भी ग्रस्त है, वहां मानवाधिकार संबंधी संवेदनशीलता स्थापित करने में मीडिया की भूमिका उल्लेखनीय साबित हो सकती है। हालांकि यह काम सरल नहीं है।
मानवाधिकार रिपोर्टिंग का कार्य तलवार की धार पर चलने के समान होता है। संवाददाता को उल्लिखित दुर्व्यवहार के कानूनी, सामाजिक और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर कलम चलानी होती है, जिससे पाठकों को इस तरह के मामलों में निहित गुत्थियों से भली भांति अवगत कराया जा सके। रिपोर्ट ऐसी हो कि उसमें निहित संदेश को पढ़कर लक्षित पाठक की अंतरात्मा झनझना उठे और रूढ़वादी कुरीतियों एवं परंपराओं के बारे में पुनर्विचार के लिए विवश हो जाये।
इस तरह के लेखन के लिए पर्याप्त लेखकीय कौशल की आवश्यकता होती है और संवाददाता को इसके लिए समय और अनुभव की कसौटी पर स्वयं को कसना होता है, क्योंकि उसके लेखन का समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।
(भारतीय पक्ष से साभार)

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