बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

भारतीय पत्रकारिता मुद्दे, स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका,/ 1-3

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पत्रकारिता ही है एकमात्र रक्षा-कवच
डा. वेद प्रताप वैदिक
 
भारतीय प्रेस परिषद् को इस बार जबर्दस्त अध्यक्ष मिला है| जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने यह नया पद संभालते ही वैचारिक विस्फोट कर दिया है| उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तौर पर भी वे अनेक साहसिक और विवादास्पद बातें कहते रहे हैं लेकिन उनसे असहमत होनेवाले लोग इस डर से मुँह नहीं खोलते थे कि वे कहीं न्यायालय की अवमानना के शिकार न हो जाएं लेकिन अब तो दोनों तरफ खुला खेल फारूख्खाबादी है| श्री काटजू अगर एक कहेंगे तो उन्हें दो सुननी पड़ेंगी|
किसी टीवी चैनल की भेंटवार्ता में श्री काटजू ने कह दिया कि भारतीय पत्रकारिता को वे ऊँची निगाह से नहीं देखते| उनके अनुसार ज्यादातर पत्रकारों को अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास और दर्शन का ज्ञान नहीं होता| कुछ हद तक यह बात सत्य हो सकती है लेकिन मेरा पहला प्रश्न यह है कि क्या श्री काटजू को यह कटु और अर्धसत्य इतने कठोर शब्दों में सार्वजनिक तौर पर कहना चाहिए था? क्या ऐसा बोलने से सत्यं वद पि्रयं वदके सिद्घांत का उल्लंघन नहीं हुआ है? जिस पत्रकार-जगत को संचालित, नियमित और प्रोत्साहित करने के लिए उनकी नियुक्ति हुई है, क्या इस तरह के बयानों से वे उसे अपना शत्रु नहीं बना लेंगे? क्या इस लूली-लंगड़ी सरकार में इतना दम है कि पत्रकारों की सहमति के बिना वह भारतीय प्रेस परिषद को वे अधिकार दे पाएगी, जो श्री काटजू चाहते हैं?
जहां तक पत्रकारों के ज्ञान का प्रश्न है, उनकी तुलना विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों और विश्वविद्यालयों के आचार्यों से नही की जा सकती और उलटकर यह प्रश्न भी पूछा जा सकता है कि विशेषज्ञों और आचार्यों में क्या इतनी योग्यता और मेधा होती है कि वे किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर कोई मौलिक टिप्पणी कर सकें| वे अपने विषय के सीमित दायरे से इतने घिरे होते हैं कि कई दशक बीत जाने पर भी वे कोई मौलिक विचार प्रस्तुत नहीं कर पाते| यह बात हर व्यवसाय पर लागू होती है, न्याय और कानून के व्यवसाय पर भी | उच्चतम न्यायालय में ऐसे कितने जज हुए हैं, जिन्हें आप मौलिक चिंतक कह सकते हैं? पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे अनेक लोग हुए है और आज भी हैं जो भारत के प्रधान न्यायाधीशों और प्रधानमंत्रियों के मुकाबले कहीं अधिक सुपठित, कहीं अधिक निष्पक्ष, कहीं अधिक निडर और कहीं अधिक मौलिक हैं| श्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान जब संविधान पर पुनर्विचार करने के लिए एक उच्च समिति बनी तो उसका अध्यक्ष एक वास्तव में सुप्रतिष्ठित पूर्व प्रधान न्यायधीश को बना दिया गया| मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि ये सज्जन योग्य और ईमानदार तो हैं और संविधान को लागू करने में इनकी भूमिका भी है लेकिन संविधान-निर्माण के बारे में इनकी समझ कितनी है, इसमें मुझे संदेह है तब तो अटलजी को आश्चर्य हुआ लेकिन समिति का काम पूरा होने के बाद उन्होंने कहा कि आपका संदेह निराधार नहीं था| भारत के पत्र्कारों ने देश के नीति-निर्माण में जैसी भूमिका अदा की है, वह कुशाग्र बुद्घि और मौलिकता के बिना संभव नहीं हो सकती| क्या वजह है कि देश के अनेक सफल प्रधानमंत्री विदेशनीति, रक्षा-नीति और अर्थ नीति के लिए कई विचारशील पत्रकारों पर अपने अफसरों और विशेषज्ञों से भी ज्यादा निर्भर रहे हैं ?
इसके अलावा आज भी लोकतंत्र के चार स्तम्भों में सबसे सशक्त कोई स्तंभ है तो वह है, पत्रकारिता! ज़रा 1975 याद कीजिए! संसद और अदालतें तो गूंगी-बहरी हो चुकी थीं| अकेली पत्रकारिता ने ही इस लोकतंत्र को बचाया| आज अदालतों की भूमिका महत्वपूर्ण और सराहनीय हो गई है लेकिन उसका श्रेय किसको है? क्या निडर पत्रकारिता को नहीं है? यदि सरकारी धांधलों के बारे में अखबार और टीवी चैनल चुप रह जाते तो हमारी अदालतें क्या कर लेतीं? इसीलिए मार्कंडेय काटजू जैसे कुशाग्र बौद्घिक और पूर्व न्यायमूर्ति से आशा की जाती है कि वे भारतीय पत्रकारिता को उसके उचित सम्मान से वंचित न करें|
जहॉं तक भय बिनु होय न प्रीतकी बात है, यह अपराधियों, दुष्टों और अति साधारण लोगों के लिए तो सही है लेकिन पत्रकारों, न्यायाधीशों और प्रबुद्घ लोगों पर यह कहावत एकदम उलटी बैठती है| जहां प्रीत होती है, वहां से भय एक दम भाग जाता है| प्रेम में भय का कोई स्थान है ही नहीं| पत्रकारों को डराकर आप पत्ता भी नहीं हिला सकते| बल्कि उलटा होता है| पत्रकारिता के सामने सरकारें सूखे पत्ते की तरह उड़ती नज़र आती हैं| बेचारी प्रेस परिषद किस खेत की मूली है?
इसका मतलब यह कतई नहीं कि न्यायमूर्ति काटजू ने जिन अधिकारों की मांग की है, वे अनुचित हैं| प्रेस परिषद को चुनाव आयोग की तरह सक्षम बनाने की उनकी मांग का डटकर समर्थन किया जाना चाहिए| भ्रष्ट और पूर्वग्रह ग्रस्त अखबारों और चैनलों और यहां तक कि आपत्तिजनक इंटरनेट अभियानों के विरूद्घ दंडात्मक कार्रवाई का अधिकार भी प्रेस परिषद को होना चाहिए| श्री काटजू ने हमारे टीवी चैनलों के उथलेपन, संकीर्ण और सांप्रदायिक पहलुओं को सही ढंग से उजागर किया है लेकिन इनका सुधार सिर्फ नियमों और कानूनों से नहीं हो सकता| जिन्हें अपराध करना होता है, उनके पास कानून निर्माताओं से ज्यादा अक़ल होती है| वे चोर दरवाज़ा ढूंढ ही लेते हैं| कानून तो जरूर बनें लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि पत्रकारीय कुकर्मो की स्पष्ट निंदा की जाए| काटजू जैसे पूर्व न्यायमूर्ति को अपनी पृष्ठभूमि का दास बनने से बचना होगा| उन्हें अपना पग अब उच्चतर पायदान पर रखना है| देश में आज ऐसा नैतिक वातावरण नितांत आवश्यक है, जो पत्र्कारिता या संचार माध्यमों की भूमिका को अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण, निष्पक्ष और मौलिक बनाए| यह इसलिए भी आवश्यक है कि आज देश में एक राजनीतिक शून्य पैदा हो चुका है| कोई भी पार्टी, नेता विचारधारा ऐसी नहीं है, जो आम लोगों को संतुष्ट कर सके| यह देश के लिए बहुत नाजुक समय है| इस शून्य को भरने की कोशिश कुछ जन-आंदोलनों ने जरूर की है लेकिन सरकार और सत्तारूढ़ दल उनकी कमर तोड़ने पर उतारू है| यों भी उन आंदोलनों के पास अब तक न तो कोई प्रभावी नेतृत्व है, न नीति है और न ही संगठन! ऐसी विकट स्थिति में इस देश का संचारतंत्र् ही इसका सबसे सशक्त रक्षा-कवच मालूम पड़ता है| देखना है कि प्रेस परिषद इस कवच को सबल बनाती है या दुर्बल?
नया इंडिया में प्रकाशित
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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजी और भाषाई पत्रकारिता की भूमिका

जेम्स अगस्टन हिक्की ने 29 जनवरी 1780 में पहला भारतीय समाचार पत्र बंगाल गजट कलकत्ता से अंग्रजी में निकाला। इसका आदर्श वाक्य था - सभी के लिये खुला फिर भी किसी से प्रभावित नहीं ।
अपने निर्भीक आचरण और विवेक पर अड़े रहने के कारण हिक्की को इस्ट इंडिया कंपनी का कोपभाजन बनना पड़ा। हेस्टिंगस सरकार की शासन शैली की कटू आलोचना का पुरस्कार हिक्की को जेल यातना के रूप में मिली।
हिक्की ने अपना उद्देश्य ही घोषित किया था - अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिये अपने शरीर को बंधन में डालने में मुझे मजा आता है। समाचार पत्र की शुरूआत विद्रोह की घोषणा से हुई।
हिक्की भारत के प्रथम पत्रकार थे जिन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता के लिये ब्रिटिश सरकार से संघर्ष किया।
उत्तरी अमेरिका निवासी विलियम हुआनी ने हिक्की की परंपरा को समृद्ध किया। 1765 में प्रकाशित बंगाल जनरल जो सरकार समर्थक था 1791 में हुमानी के संपादक बन जाने के बाद सरकार की आलोचना करने लगा। हुमानी की आक्रामक मुद्रा से आतंकित होकर सरकार ने उसे भारत से निष्कासित कर दिया।
जेम्स बंकिघम ने 2 अक्टूबर 1818 को कलकत्ता से अंग्रजी का कैलकटा जनरल प्रकाशित किया। जो सरकारी नीतियों का निर्भीक आलोचक था।
पंडित अंबिकाप्रशाद ने लिखा कि इस पत्र की स्वतंत्रता व उदारता पहले किसी पत्र में नही देखी गयी।
कैलकटा जनरल उस समय के एंग्लोइंडियन पत्रों को प्रचार प्रसार में पीछे छोड़ दिया था। एक रूपये मुल्य के इस अखबार का दो वर्ष में सदस्य संख्या एक हजार से अधिक हो गयी थी।
जेम्स बंकिघम को प्रेस की स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता था। सन् 1823 में उन्हें देश निकाला दे दिया गया। हालांकि इंगलैंड जाकर उन्होंने आरियंटल हेराल्ड निकाला जिसमें वह भारतीय समस्याओं और कंपनी के हाथों में भारत का शासन बनाये रखने के खिलाफ लगातार अभियान चलाता रहा।
1961 के इंडियन कांउसिल एक्ट के बाद समाज के उपरी तबकों में उभरी राजनीतिक चेतना से भारतीय व गैरभारतीय दोनों भाषा के पत्रों की संख्या बढ़ी।
1861 में बंबई में टाइम्स आफ इंडिया की 1865 में इलाहाबाद में पायनियर 1868 में मद्रास मेल की 1875 में कलकत्ता स्टेटसमैन की और 1876 में लाहौर में सिविल ऐंड मिलटरी गजट की स्थापना हुई। ये सभी अंग्रेजी दैनिक ब्रिटिश शासनकाल में जारी रहे।
टाइम्स आफ इंडिया ने प्रायः ब्रिटिश सरकार की नीतियों का समर्थन किया।
पायोनियर ने भूस्वामी और महाजनी तत्वों का पक्ष तो मद्रास मेल ने यूरोपीय वाणिज्य समुदाय का पक्षधर था।
स्टेटसमैन ने सरकार और भारतीय राष्ट्रवादियों दोनों का ही आलोचना की थी।
सिविल एण्ड मिलिटरी गजट ब्रिटिश दाकियानूसी विचारों का पत्र था।
स्टेटसमैन टाइम्स आफ इंडिया सिविल एण्ड मिलिटरी गजट पायनियर और मद्रास मेल जैसे प्रसिद्ध पत्र अंग्रेजी सरकार और शासन की नीतियों एवं कार्यक्रम का समर्थन करते थे।
अमृत बाजार पत्रिका बांबे क्रानिकल बांबे सेंटिनल हिन्दुस्तान टाइम्स हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड फ्री प्रेस जनरल नेश्नल हेराल्ड नेश्नल काल अंग्रेजी में छपने वाले लक्ष्य प्रतिष्ठित राष्ट्रवादी दैनिक और साप्ताहिक पत्र थे। हिन्दू लीडर इंडियन सोशल रिफार्मर माडर्न रिव्यू उदारपंथी राष्ट्रीयता की भावना को अभिव्यक्ति देते थे।
इंडियन नेशनल कांग्रेस की नीतियों और कार्यक्रमों को राष्ट्रीय पत्रों ने पूर्ण और उदारपंथी पत्रों ने आलोचनात्मक समर्थन दिया था।
डान मुस्लिम लीग के विचारों का पोषक था। देश के विद्यार्थी संगठनों के अपने पत्र थे जैसे स्टूडेंट और साथी।
सुरेंद्रनाथ बनर्जी का बंगाली ( 1879 अंग्रेजी में )
भारत के राष्ट्रीय नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने 1874 में बंगाली ( अंग्रेजी ) पत्र का प्रकाशन व संपादन किया। इसमें छपे एक लेख के लिये उनपर न्यायालय की अवज्ञा का अभियोग लगाया गया था। उन्हें दो महीने के कारावास की सजा मिली थी। बंगाली ने भारतीय राजनीतिक विचारधारा के उदारवादी दल के विचाो का प्रचार किया था।
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की राय पर दयाल सिंह मजीठिया ने 1877 में लाहौर में अंग्रेजी दैनिक ट्रिब्यून की स्थापना की। पंजाब की उदारवादी राष्ट्रीय विचारधारा का यह प्रभावशाली पत्र था।
लार्ड लिटन के प्रशासनकाल में कुछ सरकारी कामों के चलते जनता की भावनाओं को चोट पहुंची जिससे राजनीतिक असंतोष बढ़ा और अखबारों की संख्या में वृद्धि हुई। 1878 में मद्रास में वीर राधवाचारी और अन्य देशभक्त भारतीयों ने अंग्रेजी सप्ताहिक हिन्दू की स्थापना की। 1889 से यह दैनिक हुआ। हिन्दु का दृष्टिकोण उदारवादी था। लेकिन इसने इंडियन नेश्नल कांग्रेस की राजनीति की आलोचना के साथ ही सका समर्थन भी किया।

राष्ट्रीय चेतना का समाज सुधार के क्षेत्र में भी प्रसार हुआ। बंबई  में 1890 में इंडियन सोशल रिफार्मर अंग्रेजी साप्ताहिक की स्थापना हुई। समाज सुधार ही इसका मुख्य लक्ष्य था।
1899 में सच्चिदानंद सिन्हा ने अंग्रेजी मासिक हिन्दुस्तान रिव्यू की स्थापना की। इस पत्र का राजनैतिक और वैचारिक दृष्टिकोण उदारवादी था।
1900 के बाद
1900 में जी ए नटेशन ने मद्रास से इंडियन रिव्यू का और 1907 में कलकत्ता से रामानन्द चटर्जी ने मॉडर्न रिव्यू का प्रकाशन शुरू किया।
मॉडर्न रिव्यू देश का सबसे अधिक विख्यात अंग्रेजी मासिक सिद्ध हुआ। इसमें सामाजिक राजनीतिक ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विषयों पर लेख निकलते थे और अंतराष्ट्रीय घटनाओं के विषय में भी काम की खबरें होती थी। इसने इंडियन नेश्नल कांग्रेस में प्रायः दक्षिणपंथियों का समर्थन किया।
1913 में बी जी हार्नीमन के संपादकत्व में फिरोजशाह मेहता ने बांबे क्रानिकल निकाला।
1918 में सर्वेंटस आफ इंडिया सोसाइटी ने श्रीनिवास शास्त्री के संपादकत्व में अपना मुखपत्र सर्वेंट आफ इंडिया निकालना शुरू किया। इसने उदारवादी राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देश की समस्याओं का विश्लेषण और समाधान प्रस्तुत किया। 1939 में इसका प्रकाशन बंद हो गया।
1919 में गांधी ने यंग इंडिया का संपादन किया और इसके माध्यम से अपने राजनीतिक दर्शन कार्यक्रम और नीतियों का प्रचार किया। 1933 के बाद उन्होंने हरिजन ( बहुत सी भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक ) का भी प्रकाशन शुरू किया।
पंडित मोतीलाल नेहरू ने 1919 में इलाहाबाद से इंडीपेंडेंट ( अंग्रेजी दैनिक ) का प्रकाशन शुरू किया।
स्वराज पार्टी के नेता ने दल के कार्यक्रम के प्रचार के लिये 1922 में दिल्ली में के एम पन्नीकर के संपादकत्व में हिन्दुस्तान टाइम्स ( अंग्रेजी दैनिक ) का प्रकाशन शुरू किया। इसी काल में लाला लाजपत राय के फलस्वरूप लाहौर से अंग्रेजी राष्ट्रवादी दैनिक प्युपल का प्रकाशन शुरू किया गया।
1923 के बाद धीरे  - धीरे समाजवादी, साम्यवादी विचार भारत में फैलने लगे। वर्कर्स एंड प्लेसंट पार्टी आफ इंडिया का एक मुखपत्र मराठी साप्ताहिक क्रांति था। मर्ट कांसपीरेसी केस के एम जी देसाई और लेस्टर हचिंसन के संपादकत्व में क्रमशः स्पार्क और न्यू स्पार्क ( अंग्रेजी साप्ताहिक ) प्रकाशित हुआ।
मार्क्सवाद का प्रचार करना और राष्ट्रीय स्वतंत्रता एवं किसानों मजदूरों के स्वतंत्र राजनीतिक आर्थिक संघर्षों को समर्थन प्रदान करना इनका उद्देश्य था।
1930 और 1939 के बीच मजदूरों किसानों के आंदोलनों का विस्तार हुआ और उनकी ताकत बढ़ी। कांग्रेस के नौवजवानों के बीच सामाजवादी साम्यवादी विचार विकसित हुए। इस तरह स्थापित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने अधिकारिक पत्र के रूप में कांग्रेस सोशलिस्ट का प्रकाशन किया।
कम्युनिस्ट के प्रमुख पत्र नेश्नल फ्रंट और बाद में प्युपलस् वार थे। ये दोनों अंग्रेजी सप्ताहिक पत्र थे।
एम एन रॉय के विचार अधिकारिक साम्यवाद से भिन्न थे। उन्होंने अपना अलग दल कायम किया जिसका मुखपत्र था इंडीपेंडेंट इंडिया।
राजा राममोहन राय
राजा राममोहन राय ने सन् 1821 में बंगाली पत्र संवाद कौमुदी को कलकत्ता से प्रकाशित किया। 1822 में फारसी भाषा का पत्र मिरात उल अखबार और अंग्रेजी भाषा में ब्रेहेनिकल मैगजीन निकाला।
राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी में बंगला हेराल्ड निकाला। कलकत्ता से 1829 में बंगदूत प्रकाशित किया जो बंगला फारसी हिन्दी अंग्रेजी भाषाओं में छपता था।
संवाद कौमुदी और मिरात उल अखबार भारत में स्पष्ट प्रगतिशील राष्ट्रीय और जनतांत्रिक प्रवृति के सबसे पहले प्रकाशन थे। ये समाज सुधार के प्रचार और धार्मिक दार्शनिक समस्याओं पर आलोचनात्मक वाद विवाद के मुख्य पत्र थे।
राजा राममोहन राय की इन सभी पत्रों के प्रकाशन के पीछे मूल भावना यह थी ... मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौध्दिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ावें और सामाजिक प्रगति में सहायक सिध्द हो। मैं अपनी शक्ति भर शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं ताकि जनता को शासन अधिकाधिक सुविधा दे सके। जनता उन उपायो से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी करायी जा सके।
दिसंबर 1823 में राजा राममोहन राय ने लार्ड एमहस्ट को पत्र लिखकर अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार हेतु व्यवस्था करने का अनुरोध किया ताकि अंग्रेजी को अपनाकर भारतवासी विश्व की गतिविधियों से अवगत हो सके और मुक्ति का महत्व समझे।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
विष्णु शास्त्री चिपलणकर और लोकमान्य तिलक ने मिलकर 1 जनवरी 1881 से मराठी में केसरी और अंग्रेजी में मराठा साप्ताहिक पत्र निकाले।
तिलक और उनके साथियों ने पत्र प्रकाशन की उदघोषणा में कहा - हमारा दृढ़ निश्चय है कि हम हर विषय पर निष्पक्ष ढंग से तथा हमारे दृष्टिकोण से जो सत्य होगा उसका विवेचन करेंगे। निःसंदेह आज भारत में ब्रिटिश शान में चाटुकारिता की प्रवृति बढ़ रही है। सभी ईमानदार लोग यह स्वीकार करेंगे कि यह प्रवृति अवांछनीय तथा जनता के हितों के विरूद्ध है। इस प्रस्तावित समाचारपत्र (केसरी) में जो लेख छपेंगे वे इनके नाम के ही अनुरूप होंगे।
केसरी और मराठा ने महाराष्ट्र में जनचेतना फैलाई तथा राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में स्वर्णिम योगदान दिया। उन्होंने भारतीय जनता को दीन हीन व दब्बू पक्ष की प्रवृति से उठ कर साहसी निडर व देश के प्रति समर्पित होने का पाठ पढ़ाया। बस एक ही बात उभर कर आती थी -स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।
सन् 1896 में भारी आकाल पड़ा जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई। बंबई में इसी समय प्लेग की महामारी फैली। अंग्रज सरकार ने स्थिति संभालने के लिये सेना बुलायी। सेना घर घर तलाशी लेना शुरू कर दिया जिससे जनता में क्रोध पैदा हो गया। तिलक ने इस मनमाने व्यवहार व लापरवाही से          क्षुब्ध होकर केसरी के माध्यम से सरकार की कड़ी आलोचना की। केसरी में उनके लिखे लेख के कारण उन्हें 18 महीने कारावास की सजा दी गयी।
महात्मा गांधी
गांधीजी ने 4 जून 1903 में इंडियन ओपिनियन साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। जिसके एक ही अंक से अंग्रेजी हिन्दी तमिल गुजराती भाषा में छः कॉलम प्रकाशित होते थे। उस समय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में रहते थे।
अंग्रेजी में यंग इंडिया और जुलाई 1919 से हिन्दी - गुजराती में नवजीवन का प्रकाशन आरंभ किया।
इन पत्रों के माध्यम से अपने विचारों को जनमानस तक पहुंचाया। उनके व्यक्तित्व ने जनता पर जादू सा कर दिया था। उनकी आवाज पर लोग मर - मिटने को तैयार हो गये।
इन पत्रों में प्रति सप्ताह महात्मा गांधी के विचार प्रकाशित होते थे। ब्रिटिश शासन द्वारा पारित कानूनों के कारण जनमत के अभाव में ये पत्र बंद हो गये। बाद में उन्होंने अंग्रेजी में हरिजन और हिन्दी में हरिजन सेवक तथा गुजराती में हरिबन्धु का प्रकाशन किया तथा ये पत्र स्वतंत्रता तक छापते रहे।
अमृत बाजार पत्रिका
सन् 1868 में बंगाल के छोटे से गांव अमृत बाजार से हेमेन्द्र कुमार घोष, शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष के संयुक्त प्रयास से एक बांगला साप्ताहिक पत्र अमृत बाजार पत्रिका शुरू हुआ। बाद में कलकत्ता से यह बांगला और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छपने लगी।
1878 के वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से बचने के लिये इसे पूर्णतः अंग्रेजी साप्ताहिक बना दिया गया। सन् 1891 में अंग्रेजी दैनिक के रूप में इसका प्रकाशन शुरु हुआ।
अमृत बाजार पत्रिका ने तगड़े राष्ट्रीय विचारों का प्रचार किया और यह अत्याधिक लोकप्रिय राष्ट्रवादी पत्र रहा है। सरकारी नीतियों की कटू आलोचना के कारण इस पत्र का दमन भी हुआ। इसके कई संपादकों को जेल की भी सजा भुगतनी पड़ी।
जब ब्रिटिश सरकार ने धोखे से कश्मीर मे राजा प्रताप सिंह को गद्दी से हटा दिया और कश्मीर को अपने कब्जे में लेना चाहा तो इस पत्रिका ने इतना तीव्र विरोध किया कि सरकार को राजा प्रताप सिंह को राज्य लौटाना पड़ा।
पयामे आजादी
स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता अजीमुल्ला खां ने 8 फरवरी 1857 को दिल्ली से पयामे आजादी पत्र प्रारंभ किया। शोले की तरह अपनी प्रखर व तेजस्वनी वाणी से जनता में स्वतंत्रता की भावना भर दी। अल्पकाल तक जीवित रहे इस पत्र से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इसे बंद कराने में कोई कसर नही छोड़ी।
पयामे आजादी पत्र से अंग्रेज सरकार इतनी आतंकित हुई कि जिस किसी के पास भी इस पत्र की कॉपी पायी जाती उसे गद्दार और विद्रोही समझ कर गोली से उड़ा दिया गया। अन्य को सरकारी यातनायें झेलनी पड़ती थी। इसकी प्रतियां जब्त कर ली गयी फिर भी इसने जन जागृति फैलाना जारी रखा।
युगांतर
जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी ने लिखा है - जहां तक क्रांतिकारी आंदोलन का संबंध है भारत का क्रांतिकारी आंदोलन बंदूक और बम के साथ नही समाचारपत्रों से शुरु हुआ।
वारिन्द्र घोष का पत्र युगांतर वास्तव में युगान्तरकारी पत्र था। कोई जान नही पाता था कि इस पत्र का संपादक कौन है। अनेक व्यक्तियों ने ससमय अपने आपको पत्र का संपादक घोषित किया और जेल गये। दमनकारी कानून बनाकर पत्र को बंद किया गया।
चीफ जस्टिस सर लारेंस जैनिकसन ने इस पत्र की विचारधारा के बारे में लिखा था इसकी हर एक पंक्ति से अंग्रेजों के विरुध्द द्वेष टपकता है। प्रत्येक शब्द में क्रांति के लिये उत्तेजना झलकती है।
युगांतर के एक अंक में तो बम कैसे बनाया जाता है यह भी बताया गया था। सन् 1909 में इसका जो अंतिम अंक प्रकाशित हुआ उस पर इसका मुल्य था फिरंगदि कांचा माथा ( फिरंगी का तुरंत कटा हुआ सिर )
एक से अधिक भाषा वाले भाषाई पत्र
हिन्दु मुसलमान दोनों सांप्रदायिकता के खतरे को समझते थे। उन्हें पता था कि साम्प्रदायिकता साम्राज्यवादियों का एक कारगर हथियार है। पत्रकारिता के माध्यम से सामप्रदायिक वैमनस्य के खिलाफ लड़ाई तेज की गयी थी। भाषाई पृथकतावाद के खतरे को देखते हुए एक से अधिक भाषाओं में पत्र निकाले जाते थे। जिसमें द्विभाषी पत्रों की संख्या अधिक थी।
हिन्दी और उर्दू पत्र
मजहरुल सरुर, भरतपुर 1850
पयामे आजादी, दिल्ली 1857
ज्ञान प्रदायिनी, लाहौर 1866
जबलपुर समाचार, प्रयाग 1868
सरिश्ते तालीम, लखनऊ 1883
रादपूताना गजट, अजमेर 1884
बुंदेलखंड अखबार, ललितपुर 1870
सर्वाहित कारक, आगरा 1865
खैर ख्वाहे हिन्द, मिर्जापुर 1865
जगत समाचार, प्रयाग 1868
जगत आशना, आगरा 1873
हिन्दुस्तानी, लखनऊ 1883
परचा धर्मसभा, फर्रुखाबाद 1889
समाचार सुधा वर्षण, हिन्दी और बांगला, कलकत्ता 1854
हिन्दी प्रकाश, हिन्दी उर्दू गुरुमुखी, अमृतसर 1873
मर्यादा परिपाटी समाचार, संस्कृत हिन्दी, आगरा 1873
1846 में कलकत्ता से प्रकाशित इंडियन सन् भी हिन्दु हेरोल्ड की भांति पांच भाषाओं हिन्दी फारसी अंग्रेजी बांगला और उर्दू में निकलता था।
1870 में नागपुर से हिन्दी उर्दू मराठी में नागपुर गजट प्रकाशित होता था।
बंगदूत बांगला फारसी हिन्दी अंग्रेजी भाषओं में छपता था।
गुजराती
बंबई में देशी प्रेस के प्रणेता फरदून जी मर्जबान 1822 में गुजराती में बांबे समाचार शुरु किया जो आज भी दैनिक पत्र के रुप में निकलता है।
1851 में बंबई में गुजराती के दो और पत्रों रस्त गोफ्तार और अखबारे सौदागर की स्थापना हुई। दादाभाई नौरोजी ने रस्त गोफ्तार का संपादन किया। यह गुजराती भाषा का प्रभावशाली पत्र था।
1831 में बंबई से पी एम मोतीबाला ने गुजराती पत्र जामे जमशेद शुरु किया।
मराठी
सूर्याजी कृष्णजी के संपादन में 1840 में मराठी का पहला पत्र मुंबई समाचार शुरु हुआ।
1842 में कृष्णजी तिम्बकजी रानाडे ने पूना से ज्ञान प्रकाश पत्र प्रकाशित किया।
1879 80 में बुरहारनपुर से मराठी साप्ताहिक पत्र सुबोध सिंधु का प्रकाशन लक्ष्मण अनन्त प्रयागी द्वारा होता था।
मध्य भारत में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का विकास मराठी पत्रों के सहारे ही हुआ था।



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भारतीय पत्रकारिता और उसकी जरूरतें

Wednesday, 05 January 2011
धीरज
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PoorBest 
हर देश की पत्रकारिता की एक अपनी जरूरत होती है और उसी के मुताबिक वहां की पत्रकारिता का तेवर तय होता है। इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो भारत की पत्रकारिता और पश्चिमी देशों की पत्रकारिता में बुनियादी स्तर पर कई फर्क दिखते हैं। भारत को आजाद कराने में यहां की पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। जबकि ऐसा उदाहरण किसी पश्चिमी देश की पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता है। समय के साथ-स‌ाथ यहां की पत्रकारिता की प्राथमिकताएं बदल गईं और काफी भटकाव आया। पश्चिमी देशों की पत्रकारिता भी बदली लेकिन वहां जो बदलाव हुए उसमें बुनियादी स्तर पर भारत जैसा बदलाव नहीं आया। इस बात पर दुनिया भर में आम सहमति दिखती है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में गिरावट आई है। इस गिरावट को दूर करने के लिए हर जगह अपने-अपने यहां की जरूरत के हिसाब से रास्ते सुझाए जा रहे हैं। हालांकि, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें हर जगह पत्रकारिता की कसौटी बनाया जा सकता है।
दुनिया के कुछ जाने माने प्रिंट और टीवी पत्रकारों ने इस दुर्दशा को भांप ठोस कदम उठाने की स‌ोची और एक स‌मिति का गठन किया। करीब तीन स‌ाल पहले अमेरिका में बनी इस स‌मिति का नाम था कमेटि ऑफ कंसर्न्ड जर्नलिस्ट्स। करीब ढाई स‌ाल के शोध के बाद इस स‌मिति ने पत्रकारिता में आ रहे गिरावट को दूर करने के लिए कुछ उपाय स‌ुझाए हैं। अगर हम अपने देश के लिहाज स‌े देखें तो ये स‌ुझाव काफी कारगर स‌िद्ध होंगे।
समिति ने अपने अध्ययन और शोध के बाद इस बात को स्थापित किया कि सत्य को सामने लाना पत्रकार का दायित्व है। वैसे तो पत्रकारिता के पारंपरिक बुनियादी सिद्धांतों में यह शामिल रहा ही है। पर यहां सवाल उठता है कि इसका कितना पालन किया जा रहा है? भारत की पत्रकारिता को देखा जाए तो हालात का अंदाजा सहज ही लग जाता है। अब अयोध्या मुद्दे को ही देखा जाए। एक रपट में यह बात उजागर हुई कि तथ्यों को लेकर भी अलग-अलग मीडिया संस्थान अपनी सुविधा के अनुसार रिपोर्टिंग करते हैं। जब एक ही घटना की रिपोर्टिंग कई तरह से होगी, वो भी अलग-अलग तथ्यों के साथ तो इस बात को तो समझा ही जा सकता है कि सच कहीं पीछे छूट जाएगा। दुर्भाग्य से ही सही लेकिन ऐसा हो रहा है।
दूसरी बात यह है कि पत्रकार को सबसे पहले जनता के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। इस कसौटी पर देखा जाए तो अपने यहां उल्टी गंगा बह रही है। आज एक पत्रकार को किसी मीडिया संस्थान में कदम रखते ही स‌बसे पहले यह समझाया जाता है कि वे किसी मिशन भावना के साथ काम नहीं कर सकते। वे नौकरी कर रहे हैं इसलिए स्वभाविक तौर पर उनकी जिम्मेदारी अपने नियोक्ता के प्रति है। यहां इस बात को समझना आवश्यक है कि अगर मालिक की प्रतिबद्धता भी पत्रकारिता के प्रति है तब तो हालात सामान्य रहेंगे, लेकिन आज इस बात को भी देखना होगा कि मीडिया में लगने वाले पैसे का चरित्र का किस तेजी के साथ बदला है। जब अपराधियों और नेताओं के पैसे से मीडिया घराने स्थापित होंगे तो स्वाभाविक तौर पर उनकी प्राथमिकताएं अलग होंगी।
खबर तैयार करने के लिए मिलने वाली सूचनाओं की पुष्टि में अनुशासन को बनाए रखना पत्रकारिता का एक अहम तत्व है। अगर देखा जाए तो पुष्टि की परंपरा ही गायब होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के मीडिया कवरेज के दौरान देखने को मिला। एक खबरिया चैनल ने खुद को आतंकवादी कहने वाले एक व्यक्ति से फोन पर हुई बातचीत का सीधा प्रसारण कर दिया। अब सवाल यह उठता है कि क्या वह व्यक्ति सचमुच उस आतंकवादी संगठन से संबद्ध था या फिर वह मीडिया का इस्तेमाल कर रहा था। जिस समाचार संगठन ने उस साक्षात्कार, उस इंटरव्यू को प्रसारित किया क्या उसने इस बात की पुष्टि की थी कि वह व्यक्ति मुंबई हमले के जिम्मेवार आतंकवादी संगठन से संबंध रखता है? निश्चित तौर ऐसा नहीं किया गया था। ऐसे कई मामले भारतीय मीडिया में समय-समय पर देखे जा सकते हैं। आतंकवादी का इंटरव्यू प्रसारित करने के मामले में एक अहम सवाल यह भी है कि क्या किसी आतंकवादी को अपनी बात को प्रचारित और प्रसारित करने के लिए मीडिया का एक मजबूत मंच देना सही है? ज्यादातर लोग इस सवाल के जवाब में नकारात्मक जवाब ही देंगे।
एक अहम स‌ुझाव यह भी है कि पत्रकारिता करने वालों को वैसे लोगों के प्रभाव से खुद को स्वतंत्र रखना चाहिए जिन्हें वे कवर करते हों। भारत की पत्रकारिता के समक्ष यह एक बड़ा संकट दिखता है। अपने निजी संबंधों के आधार पर खबर लिखने की कुप्रथा चल पड़ी है। कई ऐसे मामले उजागर हुए हैं जिसमें यह देखा गया है कि निहित स्वार्थ के लिए खबर लिखी गई हो। राजनीति के मामले में नेता जो जानकारी देते हैं उसी को इस तरह से पेश किय जाता है जैसे असली खबर यही हो। अपराध की रिपोर्टिंग करते वक्त भी जो जानकारी पुलिस देती है उसी के प्रभाव में आकर अपराध की पत्रकारिता होने लगती है। पुलिस हत्या को एनकाउंटर बताती है और ज्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि मीडिया उसे एनकाउंटर के तौर पर ही प्रस्तुत करती है।
पत्रकारिता को सत्ता की स्वतंत्र निगरानी करने वाली व्यवस्था के तौर पर काम करना चाहिए। इस तथ्य पर सोचने के बाद यह पता चलता है कि जब पत्रकार सत्ता से नजदीकी बढ़ाने के लोभ स‌े बच नहीं पाता तो पत्रकारिता कहीं पीछे रह जाती है। एक बार किसी बड़े विदेशी पत्रकार ने कहा था कि भारत में जो भी अच्छे पत्रकार होते हैं उन्हें राज्य सभा भेजकर उनकी धार को कुंद कर दिया जाता है। ऎसे पत्रकारों के नाम याद करने में यहां की पत्रकारिता को जानने-समझने वालों को दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं देना पड़ेगा। ऐसे पत्रकार भी अक्सर मिल जाते हैं जो यह बताने में बेहद गर्व का अनुभव करते हैं कि उनके संबंध फलां नेता के साथ या फलां उद्योगपति के साथ बहुत अच्छे हैं। यही संबंध उन पत्रकारों से पत्रकारिता की बजाए जनसंपर्क का काम करवाने लगता है और उन्हें इस बात का पता भी नहीं चलता।
पत्रकारिता को जन आलोचना के लिए एक मंच मुहैया कराना चाहिए। इसकी व्याख्या इस तरह से की जा सकती है कि जिस मसले पर जनता के बीच प्रतिक्रिया स्वभाविक तौर पर उत्पन्न हो उसकी अभिव्यक्ति का जरिया पत्रकारिता को बनना चाहिए। लेकिन आज कल ऐसा हो नहीं रहा है। इसमें मीडिया घराने उन सभी बातों को प्रमुखता से उठाते हैं जिन्हें वे अपने व्यावसायिक हितों के लिए स‌ही समझते हैं। जनता के स्वाभाविक मसले को उठाना समय या जगह की बर्बादी माना जाता है और ये सब होता है जनता की पसंद के नाम पर। जो भी परोसा जाता है उसके बारे में कहा जाता है कि लोग उसे पसंद करते हैं इसलिए वे उसे प्रकाशित या प्रसारित कर रहे हैं, जबकि विषयों के चयन में सही मायने में जनता की कोई भागीदारी होती ही नहीं है। इसलिए जनता जिस मसले पर व्यवस्था की आलोचना करना चाहती है वह मीडिया से दूर रह जाता है।
समिति ने पत्रकारिता के अनिवार्य तत्व के तौर पर कहा है कि पत्रकार को इस दिशा में प्रयत्नशील रहना चाहिए कि खबर को सार्थक, रोचक और प्रासंगिक बनाया जा सके। इस आधार पर तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि खबर को रोचक और प्रासंगिक बनाने की कोशिश तो यहां की पत्रकारिता में दिखती है, लेकिन उसे सार्थक बनाने की दिशा में पहल करते कम से कम मुख्यधारा के मीडिया घराने तो नहीं दिखते। जो संस्थान सार्थक पत्रकारिता कर भी रहे हैं, उनके पास विज्ञापनों का अभाव रहता है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि अगर पत्रकारिता सार्थक होने लगेगी तो बाजार के लिए अपना हित साधना आसान नहीं रह जाएगा।
सुझाव है कि समाचार को विस्तृत और आनुपातिक होना चाहिए। इस नजरिए से देखा जाए तो इसी बात में खबरों के लिए आवश्यक संतुलन का तत्व भी शामिल है। विस्तार के मामले में अभी जो हालात हैं उन्हें देखते हुए यह तो कहा जा सकता है कि स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन बहुत बुरी भी नहीं है। जहां तक संतुलन का सवाल है तो इस मामले में व्यापक सुधार की जरूरत दिखती है।
आखिर में पत्रकारिता के लिए एक अहम तत्व के तौर पर इस बात को शामिल किया गया है कि पत्रकारों को अपना विवेक इस्तेमाल करने की आजादी हर हाल में होनी ही चाहिए। इस कसौटी की बाबत तो बस इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि सही मायने में पत्रकारों के पास अपना विवेक इस्तेमाल करने की आजादी होती तो जिन समस्याओं की बात आज की जा रही है, उन पर बात करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
लेखक धीरज जर्नलिस्ट व ब्‍लागर हैं और इन दिनों जर्नलिस्टों के वेलफेयर के लिए संगठित रूप से काम कर रहे हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग धीरज रखें से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.
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