सोमवार, 9 जनवरी 2012

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और अधिक लेख

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 संवेदना बिना पत्रकारिता नहीं हो सकती
 वर्तमान समय की पत्रकारिता सामाजिक सरोकार व मानवीय संवेदनाओं से मुख मोड़कर तेजी से व्यवसायिकता की ओर बढ़ रही है। आज पेड न्यूज का चलन अपना सिर उठा रहा है जो कि भयावह है यदि असत्य को सत्य दिखाने की परंपरा को नहीं रोका गया तो आने वाले समय में पत्रकारिता कलुषित हो जायेगी।
 ये विचार वरिष्ठ पत्रकार, [अधिक पढ़े] 

 प्रेस की आजादी लोकतंत्रीय समाज की आधारभूत जरूरत     :   वाशिंगटन। दुनिया भर में 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। इस दिन वाशिंगटन तथा न्यूयार्क में विशेष कार्यक्रम आयोजित किये गये। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर यूनेस्को की महानिदेशक इरिना बोकोवा ने विश्व के सभी देशों की सरकारों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा प्रेस की आजादी से बहाल करने तथा उसका संरक्षण करने की अपील की है। उन्होंने कहा यह लोकतंत्रीय समाज की आधारभूत जरूरत है। उन्होंने मध्यपूर्व तथा उत्तर अफ्रीका की सरकारों से लोगों की आकांक्षाओं को दबाने से परहेज करने तथा प्रेस की आजादी को बहाल करने का विशेष उल्लेख किया है। [अधिक पढ़े]  

मीडिया सनसनी से परहेज कर कमजोर तबकों की आवाज बने::  सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने एक संगोष्ठी में विचार व्यक्त करते हुए मीडिया से अपील की है कि वह सनसनी फैलाने वाली खबरों तथा कार्यक्रमों से परहेज करे। सोनी ने कहा कि मीडिया को समाज के वंचित और कमजोर तबकों की आवाज बन कर उनके सशक्तिकरण में अहम भूमिका निभानी चाहिये। भारतीय प्रेस परिषद की ओर से मानवाधिकार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुये सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा कि लोकतंत्र के लिए [अधिक पढ़े]

मीडिया में पत्रकार पर तकनीक हावी हो रही है:  :  प्रभाष न्यास ट्रस्ट ने खास तौर पर पत्रकारों के लिए पत्रकारिता की विधा से परिचित करने के लिए एक नया और नेक काम शुरू किया है। इसके तहत वह हर महीने किसी भी रविवार को एक संगोष्टी का आयोजन कर रहा है जिसके तहत पत्रकारिता के मानदंडों, उसकी सच्चाई, उसकी नेकनीयती और वह किस रूप में आगे बढ़ रही है यानी भविष्य की पत्रकारिता की तरफ भी ध्यान बढ़ाने का काम कर रहा है। इसी के तहत हाल ही दरियागंज में प्रज्ञा संस्थान में रामबहादुर राय की अगुवाई में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। इस संगोष्टी में मुख्यवक्ता इलेक्ट्रानिक मीडिया के वरिष्ठ  [अधिक पढ़े]

पुराने मीडिया की विदाई के दिन: नये मीडिया की आवाज मुख्यधारा के व्यक्ति की आवाज है. वह कोई कमरे में बैठा आभिजात्य सम्पादक नहीं है जिसके मापदंड लोगों की सोच या चाहत से मेल खाने या ना खाने के बावजूद भी झेलने पड़ते हैं। नये माध्यम में अभिव्यक्ति आजाद है, क्योंकि उसे किसी सम्पादक ने कैद नहीं कर रखा उसमें कच्चापन है लेकिन सीधी मार है. नये मीडिया की अभिव्यक्ति में कैसी भी मिलावट नहीं है. सबसे बड़ी बात-नये मीडिया की अभिव्यक्ति में चरित्र है, क्योंकि किसी मीडिया संस्थान की तरह उसे निरपेक्ष या निर्विकार होने का ढोंग नहीं करना पड़ता। [अधिक पढ़े]

कॉरपोरेट ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कम किया:  संपादक कभी खत्म नहीं हो सकता। आज भी लोग मालिक को नहीं पढ़ते, संपादक को पढ़ते हैं। अखबार में जो कुछ छपता उसे एडिटोरियल के लोग ही तो लिखते हैं। इस इंस्टीट्यूशन को खत्म करके पत्रकारिता नहीं की जा सकती। पत्रकारिता से जुड़े मुद्दों पर पी 7 न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सतीश जैकब से बातचीत।
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पत्रकारिता में मूल्यों की लड़ाई : पत्रकारिता में मूल्यों की लड़ाई ज्यादातर सत्ता के साथ या समर्थों के साथ होती है और वही परीक्षा तथा कसौटी होती है पत्रकार और पत्रकारिता की। अरविन्द शुक्ला की यह कथा इसी परंपरागत चले आ रहे द्वंद्व का एक उदाहरण है। [अधिक पढ़े]

 पत्रकारिता को गहराई से समझने की जरूरत: सामाजिक सरोकार हाशिएपर जा रहे हैं। देश में हर तरफ उपभोक्तावाद हावी होता जा रहा है। अपने-अपने हितों को साधने के चक्कर में ज्यादातर लोग सामाजिक निर्माण में ईमानदारी से काम नहीं कर पा रहे हैं। इन परिस्थितियों में संपूर्ण मीडिया क्षेत्र में सामाजिक सरोकार और सामाजिक चेतना के लिये संवेदन के साथ काम करने की जरूरत है। [अधिक पढ़े] 

 अध्यात्म के सहयोग से अपने को श्रेष्ठ बनाएं - भिलाई/अंबिकापुर। आधुनिकता की दौड़ में मानवीय मूल्यों के साथ-साथ मीडिया में भी सकारात्मक दृष्टिकोण का हृास हुआ है। बाजारवाद की दौड़ में मीडिया की भूमिका लगातार नकारात्मक हो रही है और इसमें अध्यात्म के माध्यम से सकारात्मक परिवर्तन कर मीडियाकर्मी बेहतर सोच के साथ बेहतर समाज का निर्माण कर सकते है। [अधिक पढ़े]      

असम्बद्ध नहीं है अध्यात्म से पत्रकारिता - पत्रकारिता और अध्यात्म का क्या कोई सार्थक रिश्ता हो सकता है, इसकी चर्चा करते ही ज्यादातर लोग तो इसे अमौलिक या जड़ मानते हुए खारिज करेंगे। ऐसे लोगों की सामान्य धारणा है कि अध्यात्म सामाजिक सरोकारों और व्यक्ति की सर्जनात्मक प्रतिभा के लिए अनावश्यक है। वे यह भी मानते हैं कि अध्यात्म के सहारे भले ही समसामयिक समस्याओं से पलायन करते हुए शांति का अनुभव किया जाता हो पर वह समाज को आगे बढ़ाने में नाकामयाब ही होता है।  [अधिक पढ़े]      

मूल्य सिर्फ शब्द नहीं है कि बोले और आ गये  [संपादकीय] 
मीडिया और मीडियाकर्मियों में सकारात्म· तथा मानवीय मूल्यों के कम हो जाने के संबंध में अब कोइ ज्यादा बहस नहीं है। यह मान रहे हैं कि मूल्य कम हुए हैं और सकारात्मक विकास के सरोकार ·मतर होते जा रहे हैं। इसके कारण और निवारण पर ही अब ज्यादा बहस हो रही है। इसमें विविधता भी है और वायवीयता भी है। मसलन सुरक्षा और सुविधाओं की बात करते हुए हम प्राय: भूल जाते हैं कि जिन वर्गों को यह सब उपलब्ध है, उनमें भ्रष्टाचार बढऩे के साथ अन्य मानवीय मूल्य क्यों कम हुए हैं। कानून और नियम की पैरवी करने वाले अपने आसपास कानून और नियमों को सेमल की रूई की तरह बिखरता [अधिक पढ़े]      
 

 समाज ने जो अवसर दिया है, पत्रकार उसका सदुपयोग करें- विकास संवाद द्वारा बुंदेलखंड के छतरपुर स्थित गांधी आश्रम में ‘सूखे में समाज और मीडिया’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में देशभर से करीब 60 पत्रकार जब एक साथ सारस के झुंड की तरह पहुंचे तो लगा कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी प्रतिबद्धता भारतीय ग्रामीण समाज के प्रति बनाए हुए है। [अधिक पढ़े]

  मीडिया में पत्रकार पर तकनीक हावी हो रही है:  :  प्रभाष न्यास ट्रस्ट ने खास तौर पर पत्रकारों के लिए पत्रकारिता की विधा से परिचित करने के लिए एक नया और नेक काम शुरू किया है। इसके तहत वह हर महीने किसी भी रविवार को एक संगोष्टी का आयोजन कर रहा है जिसके तहत पत्रकारिता के मानदंडों, उसकी सच्चाई, उसकी नेकनीयती और वह किस रूप में आगे बढ़ रही है यानी भविष्य की पत्रकारिता की तरफ भी ध्यान बढ़ाने का काम कर रहा है। इसी के तहत हाल ही दरियागंज में प्रज्ञा संस्थान में रामबहादुर राय की अगुवाई में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। इस संगोष्टी में मुख्यवक्ता इलेक्ट्रानिक मीडिया के वरिष्ठ  [अधिक पढ़े]

पुराने मीडिया की विदाई के दिन: नये मीडिया की आवाज मुख्यधारा के व्यक्ति की आवाज है. वह कोई कमरे में बैठा आभिजात्य सम्पादक नहीं है जिसके मापदंड लोगों की सोच या चाहत से मेल खाने या ना खाने के बावजूद भी झेलने पड़ते हैं। नये माध्यम में अभिव्यक्ति आजाद है, क्योंकि उसे किसी सम्पादक ने कैद नहीं कर रखा उसमें कच्चापन है लेकिन सीधी मार है. नये मीडिया की अभिव्यक्ति में कैसी भी मिलावट नहीं है. सबसे बड़ी बात-नये मीडिया की अभिव्यक्ति में चरित्र है, क्योंकि किसी मीडिया संस्थान की तरह उसे निरपेक्ष या निर्विकार होने का ढोंग नहीं करना पड़ता। [अधिक पढ़े]

कॉरपोरेट ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कम किया:  संपादक कभी खत्म नहीं हो सकता। आज भी लोग मालिक को नहीं पढ़ते, संपादक को पढ़ते हैं। अखबार में जो कुछ छपता उसे एडिटोरियल के लोग ही तो लिखते हैं। इस इंस्टीट्यूशन को खत्म करके पत्रकारिता नहीं की जा सकती। पत्रकारिता से जुड़े मुद्दों पर पी 7 न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सतीश जैकब से बातचीत।
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पत्रकारिता में मूल्यों की लड़ाई : पत्रकारिता में मूल्यों की लड़ाई ज्यादातर सत्ता के साथ या समर्थों के साथ होती है और वही परीक्षा तथा कसौटी होती है पत्रकार और पत्रकारिता की। अरविन्द शुक्ला की यह कथा इसी परंपरागत चले आ रहे द्वंद्व का एक उदाहरण है। [अधिक पढ़े]

 पत्रकारिता को गहराई से समझने की जरूरत: सामाजिक सरोकार हाशिएपर जा रहे हैं। देश में हर तरफ उपभोक्तावाद हावी होता जा रहा है। अपने-अपने हितों को साधने के चक्कर में ज्यादातर लोग सामाजिक निर्माण में ईमानदारी से काम नहीं कर पा रहे हैं। इन परिस्थितियों में संपूर्ण मीडिया क्षेत्र में सामाजिक सरोकार और सामाजिक चेतना के लिये संवेदन के साथ काम करने की जरूरत है। [अधिक पढ़े] 
 

सोशल नेटवर्किंग साइट पर बिगड़ते रिश्ते !]  


[प्रसारण की इंडस्ट्री अभी काफी छोटी है ]   


[मीडिया के मौजूदा सरोकार ‘बड़ों’ के साथ]       


[पढ़ाने वालों को मीडिया में कम करने का अनुभव भी हो केईपन]

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