सोमवार, 9 जनवरी 2012

जो भी हूं भारत के कारण हूं’-सर विलियम मार्क टली,

सर विलियम मार्क टली, (जन्म 1936, कोलकाता, भारत) बीबीसी के नयी दिल्ली स्थित ब्यूरो के पूर्व प्रमुख हैं. जुलाई 1994 में इस्तीफ़े से पूर्व उन्होंने 30 वर्ष की अवधि तक बीबीसी के लिए कार्य किया. 1994 के बाद वे नयी दिल्ली से एक स्वतंत्र पत्रकार और प्रसारक के रूप में कार्य कर रहे हैं. वर्तमान में वे बीबीसी रेडियो 4 के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘समथिंग अंडरस्टुड’ के नियमित प्रस्तुतकर्ता हैं.
उनके पिता संपन्न इंग्लिश एकाउंटेंट थे. अपने बचपन के शुरुआती दस साल इन्होंने भारत में ही बिताये, लेकिन उन्हें भारतीय लोगों के साथ मिलने-जुलने की आजादी नहीं थी. उसके बाद वे अपनी स्कूली शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गये. वहां उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया. पढ़ाई के बाद उन्होंने इंग्लैंड के चर्च में एक पादरी बनने के बारे में सोचा, लेकिन बाद में इस विचार को त्याग दिया.
मार्क टली बीबीसी से 1964 में जुड़े और एक भारतीय संवाददाता के रूप में कार्य करने के लिए 1965 में भारत आ गये. इनको 1992 में पद्मश्री और 2002 में नाईट की उपाधि और 2005 में पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया. टली ने भारत पर आधारित कई पुस्तकें लिखीं जिनमें शामिल हैं - ‘इंडिया इन स्लो मोशन’, ‘नो फ़ुल स्टॉप्स इन इंडिया’ आदि.
भारत में बीबीसी संवाददाता के तौर पर लंबी पारी खेलने वाले मार्क टली भारत को अपना दूसरा घर मानते हैं. अगर यह कहा जाये कि वे अपने पहले घर से ज्यादा इस दूसरे घर को जानते हैं, तो यह गलत नहीं होगा. भारत को जितनी संवेदनशीलता के साथ टली ने देखा है, वह किसी भारतीय पत्रकार के लिए भी दुर्लभ है. मार्क टली से भारत पर उनकी नयी किताब ‘नॉन स्टॉप इंडिया’ और कई समकालीन मुद्दों पर बातचीत की नरेंद्रपाल सिंह ने. प्रस्तुत है मुख्य अंश..
सवाल : पत्रकार से एक लेखक की यात्रा का आपका अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : मैं हमेशा कहता रहा हूं कि मेरा पहला प्यार रेडियो, दूसरा अखबारों के लिए लेखन और तीसरा है किताब. लेकिन इन सभी में किताब लिखना मेरे लिए सबसे मुश्किल काम है. जब भी कोई किताब लिखता हूं तो कई बार मेरी हिम्मत बीच में ही जवाब दे जाती है. लेकिन इस मामले में मैं अपनी दोस्त जिलियन का शुक्रगुजार हूं जो मेरी हिम्मत बढ़ाती है. साथ ही अपने संपादकों का जो मेरा उत्साह बनाए रखते हैं. मैं यह भी मानता हूं कि मैं एक सहज लेखक नहीं हूं.
मेरी पहली किताब थी अमृतसर. उसके लिए मैं अपने साथी सतीश जैकब का शुक्रगुजार हूं. इसके लिए उन्होंने काफ़ी रिसर्च किया था. इस किताब को लिखने के लिए मैंने बीबीसी से छुट्टी ली और लंदन वापस लौट गया. वहां पर मैंने एक नयी दिनचर्या बनायी. शाम को पांच बचे तक लिखता, क्योंकि मुङो लगता था कि इसके बाद अगर मैं कुछ लिखूंगा तो वह बस कूड़ा ही होगा. फ़िर मैं शाम का बुलेटिन सुनता और रात होते ही पब में जाकर बैठ जाता. पब में एक दिन मुङो मेरा एक दोस्त मिला बातचीत के दौरान उसने किताब के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि किताब लिखना बड़ा ही मुश्किल हो रहा है, क्योंकि लंबा लिखने की मेरी आदत नहीं है.
मैं जब भी लिखने बैठता हूं तो हर दो-ढाई सौ शब्दों के बाद लिख देता हूं मार्क टली, बीबीसी दिल्ली. मेरे दोस्त ने एक सलाह दी कि आप जब भी लिखने बैठो, तो यह ध्यान में रखो की मुङो दस हजार-पंद्रह हजार शब्द लिखने हैं. धीरे-धीरे यह आदत बन जायेगी. वास्तव में लिखना शब्द सुनते ही मेरे दिमाग में एक हॉरर इमेज बनती है. कई बार मेरे साथी जब मुझसे कहते कि मुङो इस पर कुछ लिखना है, तो मैं उस मामले को लेकर चुप हो जाता था.
सवाल : आपने जब पहली किताब ‘नो फ़ुलस्टॉप इन इंडिया’ लिखी तो बहुत सारे लोगों के विचार और उनकी आवाज को जगह दी. इसकी वजह क्या आपका रेडियो बैकग्राउंड से होना था, जहां आवाजें ही अहमियत रखती हैं.
उत्तर : बिल्कुल! रेडियो का मतलब ही होता है वॉयसेज. न सिर्फ़ मेरी आवाज बल्कि लोगों की आवाज भी. इसके अलावा रेडियो की खूबसूरती है कि आप जिन लोगों से बात करते हैं, उनकी कहानियां बताते हैं. जब भी मैं कहीं मीडिया स्कूल में जाता हूं तो छात्रों को यही बताता हूं कि आप पत्रकारिता में अपनी कहानी नहीं कहते, बल्कि लोगों की कहानी सुनाते हैं.
सावल : इसीलिए अभी तक आप रेडियो से जुड़े हैं. आपका प्रोग्राम ‘समथिंग अंडरस्टुड’ अभी तक जारी है.
उत्तर : मैं आज भी रेडियो से जुड़ा हूं और मुङो यह प्रोग्राम करना बेहद पसंद है. पिछले पंद्रह सालों से इंग्लैंड में यह एक चर्चित प्रोग्राम बना हुआ है. एक बार इंग्लैंड में मैं कुछ लोगों से मिला. जो लोग मेरा प्रोग्राम सुनते थे. मैंने उनसे कहा न तो मैं कोई पादरी हूं, न ही कोई शिक्षाविद् और न ही कोई बड़ा आदमी, फ़िर आपको यह मेरा प्रोग्राम क्यों अच्छा लगता है? उनमें से एक महिला ने कहा कि बाकी लोगों को तो मैं नहीं जानती, लेकिन अपने बारे में कहूं तो मैं आपको इसलिए सुनती हूं क्योंकि आप मेरे दोस्त हैं. रेडियो की यही खूबी है कि वह आपके श्रोताओं से आपको व्यक्ति‍गत तौर पर जोड़ देता है.

This Article Posted on: November 13th, 2011 in :
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