रविवार, 15 जनवरी 2012

और मैं पत्रकार नहीं


 
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जीरो आवर | जीरो आवर
Written by पुण्य प्रसून बाजपेयी on Sunday, 21 February 2010 10:40   
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कलाकारों के वक्त के लिहाज से नेताओ को अपना वक्त निकालना पड़ता लेकिन आम जनता के लिये नेताओ के पास वक्त ही नहीं रहता। मुश्किल तो यह हुई कि इस दौर की राजनीति को इसमें कोई खामी भी दिख रही। 26-11 के बाद ताज होटल का निरीक्षण करने निकले तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का फिल्मकार रामगोपाल वर्मा को अपने साथ ले जाना इसका एक उम्दा उदाहरण है। जब देशमुख पर आरोप लगे तो उन्होने मासूमियत से कहा-इसमें गलती क्या है। सत्ताधारी राजनीतिक दलों से जुड़े होने का लाभ नौकरशाही ने भी कलाकारों को खूब दिया। सुविधा,टैक्स माफ और राष्ट्रीय पुरस्कार दिखायी देने वाला सच है। और ना दिखायी देने वाली हकीकत यही रही कि राजनीति भी सिनेमायी तर्ज पर खुद को देखने-समझने लगी।
दरअसल, यह पूरा दौर आर्थिक सुधार का है, जिसमें सबसे ताकतवर बाजार हुआ और हर हालत में मुनाफे की सोच ने सामूहिकता के बोध खत्म कर दिया। इस दौर में कल्याणकारी राज्य यानी जनता के प्रति जवाबदेही होने की समझ भी राजनीतिक सत्ता से काफूर हो गयी। सबकुछ प्रतिस्पर्धा बताकर मुनाफे पर टिकाने का अद्भुत खेल शुरु हुआ। इस राजनीतिक शून्यता ने समाज में एक संदेश तो साफ दिया कि संसदीय राजनीति का लोकतंत्र भी अब मुनाफे की बोली ही समझता है। इन परिस्थितियों को समझते हुये समझाने की जरुरत चौथे खम्भे यानी पत्रकारिता की थी । लेकिन पत्रकारिता ने भी आर्थिक सुधार के इस दौर में बाजार और मुनाफे का पाठ ही पढ़ना शुरु किया। जिस राजनीतिक सत्ता पर उसे निगरानी रखनी थी, उसी सत्ता की चाटुकारिता उसके मुनाफे का सबब बनी। और पत्रकारिता झटके में मीडिया में तब्दील होकर धंधे और मुनाफे का सच टटोलने लगी। धंधा बगैर सत्ता की सुविधा के हो नहीं सकता और राजनीति बगैर मीडिया के चल नहीं सकती। इस जरुरत ने बाजारवादी धंधे में मीडिया और राजनीति को साझीदार भी बनाया और करीब भी पहुंचाया।
पत्रकार भी इटंरप्नयूर बनने लगा। जो पत्रकारिता शिखर पर पहुंचकर राजनीति का दमन थामती थी और पत्रकार संसद में नजर आते उसमें नयी समझ कारपोरेट मालिक बनने की हुई। क्योंकि राजनीति बाजार के आगे नतमस्तक तो बाजार में मीडियाकर्मी की पैठ उसे राजनीति से करीबी से कहीं ज्यादा बड़ा कद देती। किसी मीडिया संस्थान में बतौर पत्रकार काम करने से बेहतर खुद का संस्थान बनाने और धंधे में सीधे शिरकत करने वाले को ही सफल मीडियाकर्मी माना जाने लगा। लेकिन चौथे खम्भे का संकट इसके बाद से शुरु हुआ जब वोट बैंक की राजनीति में सिनेमायी समझ घुसी और विकास का खांचा भी सिनेमायी तर्ज पर बनना शुरु हुआ। मीडिया सत्ता के उसी विकास को असल भारत मानने लगी जिसका खांचा राजनीति ने सिनेमा की चकाचौंध में बनाया। मीडिया ने भी इसका दोहरा दोहन किया। धंधे और मुनाफे के लिये राजनीतिक सत्ता की विकास की लकीर को ही असल इंडिया और किसी ने नहीं मीडिया ने ही बताया।
जाहिर है नौ फीसदी खेती योग्य जमीन इसी दौर में औधोगिक विकास के नाम पर स्वाहा की गयी । देशभर में छह फीसद जंगल खत्म किये गये। शहरों में 22 फीसदी तक की हरियाली खत्म हुई और कंक्रीट का जंगल 19 फीसद जमीन पर तेजी के साथ पनपा। उसी दौर में तीस हजार से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की और करीब छह लाख से ज्यादा लोगों का वैसा रोजगार खत्म हुआ जो उत्पादन से जुड़ा था। पैसा लगाने और पैसा बनाने के इस सट्टा बाजार अर्थव्यवस्था के खेल ही राजनीतिक सत्ता की नीति बन गयी। मीडिया के लिये यह कोई मुद्दा नहीं बना और राजनीति ने कभी उस भारत को देश के विकास से जोड़ने की नहीं सोची जो इस चकाचौंघ की वजह से कहीं ज्यादा अंधेरे में समाता जा रहा था। राजनेताओ की सभा में राजू श्रीवास्तव सरीखे चुटकुले होने लगे और न्यूज चैनलों ने भी राजू की हंसी ठिठोली में अपने धंधे को आगे बढ़ते देखा। लोकतंत्र के चौथा खम्भा होने का भ्रम टीआरपी से निकले विज्ञापन ने कुछ यूं तोडा कि खबरों की परिभाषा भी बदली गयी और राजनीतिक सत्ता ने नयी परिभाषा को यह कह कर मान्यता दी कि मीडिया चलाने के लिये पूंजी तो चाहिये ही। यानी मीडिया की विश्वसनीयता का नया आधार पूंजी और उससे बनने वाले मुनाफे के दायरे में घुस गया। सरकार ने बाजार आगे घुटने टेक कर अनकही नीतियों के आसरे मीडिया को अपनी सिनेमायी सोच में ढाला भी और निर्भर भी बना दिया। विश्वसनीय न्यूज चैनलों में सिल्वर स्क्रीन के कलाकारों के प्रोग्राम तो छोटी बात हुई। कलाकारो से एंकरिंग करा कर पत्रकारिता के नये मापदंड बनाये गये।
ऐसा भी नहीं है कि यह सब नयी पीढी ने किया जिसने पत्रकारिता के संघर्ष को ना देखा-समझा हो। बल्कि प्रिंट पत्रकारिता से न्यूज चैनलों में आये वह पत्रकार ही इंटरप्यूनर की तर्ज पर उबरे और अपने सामने ध्वस्त होती राजनीति या कहें सिनेमायी राजनीति का उदाहरण रख नतमस्तक हो गये। जिस तरह सिनेमायी धंधे के लिये देश भर में महंगे सिनेमाघर बने और इन सिनेमाघरो में टिकट कटा कर सिनेमा देखने वालो की मानसिकता की तर्ज पर ही फिल्म निर्माण हो रहा है तो राजनीतिक सत्ता ने भी वैसी ही नीतियों को अपनाया, जिससे पैसे की उगाही बाजार से की जा सके। यानी मलटीप्लैक्स ने सिनेमा के धंधे का नया कारपोरेट-करण किया तो विकास नीति ने पूंजी उगाही और कमीशन को ही अर्थव्यवस्था का मापदंड बना दिया। और मीडिया ने सिल्वक स्क्रीन की आंखो से ही देश की हालत का बखान शुरु किया। खुदकुशी करते किसानो की रिपोर्टिंग फिल्म दो बीघा जमीन से लेकर मदर इंडिया के सीन में सिमटी। 2020 के इंडिया को दुबई की सबसे ऊंची इमारत दिखाकर सपने बेचे गये। नीतियों पर निगरानी की जगह मीडिया की भागेदारी ने सरकार को यही सिखाया कि लोग यही चाहते हैं, यह ठीक उसी प्रकार है जैसे टीआरपी के लिये न्यूज चैनल सिनेमायी फूहडता दिखाकर कहते है कि दर्शक तो यही देखना चाहते हैं।
धंधे पर टिके सिनेमा की तर्ज पर मीडिया और उसी तर्ज पर राजनीतिक सत्ता के ढलने से तीस फिसद इंडिया में ही समूचा भारत देखने की समझ नीतिगत तौर पर उभरी। स्पेशल इकनामी जोन से लेकर टाइगर प्रोजेक्ट के घेरे में ग्रामीण समाज और आदिवासी हाशिये पर चला गया लेकिन ग्लोबल बाजार की पूंजी इन परियोजनाओ से जुड़ती चली गयी और सरकार को फायदा ही हुआ। वहीं मीडिया में विकास का आधार भी सत्ता के अनुकूल हो गया। यानी उपभोक्ता बनाकर बाजार पर निर्भर करने की मानसिकता से जुड़े तमाम खबरें हो या प्रचार विज्ञापन सबकुछ मीडिया ने आंख बंद कर छापा भी और न्यूज चैनलों में दिखाया भी। इतना ही नहीं सरकार की जिन नीतियों ने स्कूलों से खेल मैदान छिने, मोहल्लो से पार्क छिने। रंगमंच खत्म किया । खेल स्टेडियम को फीस और खेल विशेष से जोड़ दिया उसमें समाज के सामने मनोरंजन करना भी जब चुनौती बनने लगा तो सिनेमा और सिनेमायी तर्ज पर न्यूज चैनलों को उसी राजनीतिक सत्ता ने प्रोत्साहित किया, जिसका काम इन तमाम पहलो को रोकना था।
पूंजी पर मीडिया को टिकाकर सत्ता की सिनेमायी सोच ने पत्रकारिता के आयामों को ही बदल दिया। पत्रकारिता खुद ब खुद उस लघु पत्रिका का हिससा बन गयी जो नब्बे के दशक तक मुख्यधारा की पत्रकारिता को भी चुनौती देती थी। लेकिन उस दौर में मुख्यधारा की पत्रकारिता का मतलब कहीं ना कहीं सत्ता को चुनौती देते हुये बहुसंख्य लोगों से जुडे सवालों को उठाना होता था । और लघु पत्रकारिता विकल्प की सोच लिये विचारों का मंच बनाती थी। लेकिन नयी परिस्थितियों ने मुख्यधारा का मतलब सत्ता से करीबी और कारपोरेट पूंजी के तौर तरीकों से मीडिया को व्यवसायिक बनाकर आगे बढ़ाना है। इसमें खबर का मतलब सरकार की नीतिय का प्रचार और कारपोरेट धंधे के नये गठजोड़ होते हैं। और मनोरंजन से जुडी खबरे जो सिनेमायी धंधे को समाज का असल आईना बताती है।
न्यूज चैनल का एंकर किसी नायक-नायिका की तर्ज पर खुद को रखता है और संपादक फिल्म प्रोडूसर की तर्ज पर नजर आता है। राजनेता का मापदंड भी उसके औरे से तय होता है। नेता का ग्लैमर , उसका लोगो से कटकर न्यूज चैनल के पर्दे पर लगातार बोलना ही उसकी महत्ता है। यानी एक तबके बर के लिये सिनेमा, उसी के लिये राजनीतिक सत्ता की नीतियां और उसी के मानसिक मनोरंजन के लिये मीडिया, लोकतंत्र का नया सच कुछ इसी परिभाषा में सिमट गया है। और लोकतंत्र बार बार पारंपरिक खम्भों की दुहाई दे कर एहसास करता है कि देश में सबका हक बराबर का है। हर कोई बराबर का नागरिक है। जिसका मापदंड चुनाव है जिसमें हर कोई वोट डाल सकता है और सभी का मत बराबर का होता है। यह अलग बात है कि वोट बैंक डिगाने के लिये नेता पूरी तरह सिनेमायी नायक-नायिका पर जा टिका है और मीडिया सिलवर स्क्रीन का आईना बन गया है।
कह सकते है पहले समाज का आईना फिल्म होती थी अब फिल्म का आईना समाज माना जाने लगा है । इसलिये सवाल माई नेम इज खान का नहीं है, सवाल यह भी नहीं है कि है मनमोहन सिंह भी कहें, " माई नेम इज मनमोहन और मै पीएम नहीं हूं।" क्योंकि मै सीइओ हूं। लेकिन मीडिया से कौन निकल कर कहेगा कि माई नेम इज गणेश शंकर विद्यार्थी और मैं पत्रकार नहीं हूं।


(पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से साभार)

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