गुरुवार, 12 जनवरी 2012

काले अध्याय पर सभ्यता की जीत

 

मार्क टली, वरिष्ठ पत्रकार
:05-12-11 09:17 PM
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भारतीय इतिहास में 6 दिसंबर, 1992 एक काले अध्याय के तौर पर याद किया जाएगा। इस दिन मैं अयोध्या में था, बीबीसी के लिए मुझे इस आंदोलन को कवर करना था। मैंने इससे एक दिन पहले ही लाल कृष्ण आडवाणीजी से बात की थी, उन्होंने मुझे कहा कि संघ के कार्यकर्ता बेहद अनुशासित हैं, लिहाजा कोई उपद्रव नहीं होगा। भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी संगठनों ने सरकार और अदालत को भरोसा दिलाया था कि राम मंदिर का निर्माण-कार्य सांकेतिक तौर पर होगा, जिसमें एक धार्मिक अनुष्ठान जैसा आयोजन होगा और मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा। वहां पुलिस बल की भारी मौजूदगी भी थी। एक ऐसे मकान की छत पर हम पहुंचने में कामयाब रहे, जहां से बाबरी मस्जिद साफ-साफ दिखाई दे रही थी। वहां करीब डेढ़ लाख लोग जमा थे। भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद के नेता भाषण दे रहे थे, अचानक माथे पर भगवा कपड़ा लपेटे एक युवा ने बैरियर तोड़ दिया। पुलिस चुपचाप देखती रही। कुछ युवाओं ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन वहां पर हलचल काफी बढ़ गई थी। मस्जिद के बाहर लगा पुलिस का घेरा भी टूट गया।
मैंने देखा कि पुलिस की दिलचस्पी इन युवाओं को रोकने की नहीं है, तो मुझे आशंका हुई। मैंने मान लिया कि अब मस्जिद को ये लोग गिरा देंगे, मैं इस खबर को सबसे पहले दुनिया तक पहुंचाना चाहता था। उस दिन अयोध्या में टेलीफोन लाइन काम नहीं कर रही थी, लिहाजा मुझे फैजाबाद जाना पड़ा और हमने सबसे पहले दुनिया को बताया कि बाबरी मस्जिद पर हमला हो चुका है। खबर भेजने के बाद हमने अपनी गाड़ी अयोध्या की ओर मोड़ ली, पर हर जगह पुलिस का घेरा दिखा, जो हमें अंदर जाने नहीं दे रहा था। हमारे साथ एक स्थानीय पत्रकार थे, जिन्हें गलियों वाले रास्ते पता थे, लिहाजा हम एक बार फिर अयोध्या में थे। वहां गाड़ी से बाहर निकलते ही, लोगों ने मुझे घेर लिया। भद्दी गालियां देते हुए वे मुझे मारने पर उतारू थे, लेकिन हमारे साथ जो स्थानीय पत्रकार थे, उनकी वजह से मेरे ऊपर हमला नहीं हुआ। मुझे पास के एक मंदिर के रेस्ट हाउस में नजरबंद कर दिया गया। मानसिक तौर पर मैं परेशान हो रहा था, जान का खतरा था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि भारत सरकार इन लोगों को रोक नहीं पा रही है। बहरहाल, स्थानीय पत्रकार व साथियों की कोशिशों के चलते और अयोध्या के सबसे पुराने मंदिर के मुख्य पुजारी की मदद से मैं कुछ घंटों बाद बाहर निकल पाया। तब तक बाबरी मस्जिद ध्वस्त हो चुकी थी। इसके बाद जो हुआ, वह सब जगह दर्ज है। उस वक्त हर कोई यह आशंका जता रहा था कि देश में सांप्रदायिक हिंसा अब थमेगी नहीं। भारत शायद फलीस्तीन बन जाएगा और सांप्रदायिक तनाव हमेशा के लिए बना रहेगा। मुंबई के दंगे और बाद में गोधरा कांड के दौरान ऐसी आशंकाओं को बल मिला। लेकिन दूसरी ओर भारत की 2000 साल पुरानी संस्कृति भी थी, जिसमें सभी धर्मों के लोग सदियों से एक-दूसरे से मिल-जुलकर रहते आए हैं। मुझे लगता था कि वक्त ही इन तनावों पर मरहम लगाएगा, क्योंकि भारतीय समाज में आग जितनी जल्दी लगती है, उतनी ही जल्दी बुझ भी जाती है। बुनियादी तौर पर भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान आपसी तनावों को भुलाकर साथ चलने वाले समाज की है। मैं दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में रहता हूं, जो ऐतिहासिक तौर पर मुस्लिम धरोहरों वाला इलाका है। मैंने यहां सालों-साल से देखा है कि हिंदू-मुस्लिम और यहां तक कि ईसाई भी बड़े प्रेम भाव से मिल-जुलकर रहते हैं। यह कोई एक इलाके का सच नहीं है, बल्कि पूरा भारत इसी तरह से रहता आया है। धार्मिक रहन-सहन के हिसाब से इतने जीवंत और विविधरंगी समाज का दूसरा उदाहरण दुनिया भर में नहीं मिलता है। लिहाजा, 20 साल के अंदर ही बाबरी मस्जिद से जुड़ा तनाव समाज से गायब हो गया है। वैसे भी यह पूरा मसला धर्म से जुड़ा हुआ भी नहीं था, बल्कि राजनीति से प्रेरित था। उस दौर में भारतीय जनता पार्टी को इसका फायदा भी हुआ। मैंने बीजेपी के एक बड़े नेता से अयोध्या का जिक्र करते हुए कहा था कि आपको अहसास नहीं होगा कि आपके समर्थक किस तरह से सांप्रदायकि सद्भाव बिगाड़ रहे थे। अफसोस कि बात यह है कि उन्होंने इसके लिए कोई माफी नहीं मांगी। लेकिन आज क्या हुआ? हिंदुत्व विचारधारा की बदौलत पार्टी का जनाधार बढ़ने की बजाय सिमट रहा है। राम मंदिर आंदोलन के नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मानते है कि महज हिंदुत्व की विचारधारा से पार्टी का कोई भला नहीं होने वाला है। ऐसी सोच वाले नेताओं की संख्या पार्टी के अंदर बढ़ रही है। पार्टी के अंदर एक वर्ग हिंदुत्व से जुड़ी पहचान को बदलना चाहता है। इन लोगों को भी इस बात का अहसास हो चुका है कि धर्म के नाम पर उनकी राजनीतिक दुकानदारी नहीं चल सकती। इसी तरह ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भी हिंदू-सिख तनाव को कवर करने का मौका मिला। तब की सरकार ने जब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर हमला किया, तो सिखों में काफी नाराजगी उभर आई थी। यह नाराजगी इस कदर थी कि इंदिराजी के अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी। इसके बाद सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए। इसमें सरकार और प्रशासन वैसे ही चुप रह गई, जैसा नजारा बाद में मैंने अयोध्या में भी देखा था। इस बात को बीते 27 साल होने को आए। आम हिंदू-सिख उसी भाईचारे से रहने लगे हैं। हालांकि यह भाव आज भी समाज में मौजूद है कि 1984 के दंगों में अन्याय हुआ। तीन दशक के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाया है, लेकिन उनकी यह नाराजगी प्रशासन से ज्यादा है, आम हिंदुओं से नहीं। भारत इस दौर में कई बदलावों से गुजर रहा है। वह आर्थिक ताकत के तौर पर उभरा है और समाज भी अपने तरीके से मैच्योर हो रहा है। लोग अपनी धार्मिकता के साथ परिपक्व हो रहे हैं। आम लोग एक दूसरे के धर्म में दखलदांजी देने की बजाय अपनी आजीविका और काम धंधे पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि आस-पड़ोस के लोग-बाग ही उसके सुख-दुख के साथी होंगे। चाहे वे किसी धर्म, किसी समाज के हों। यह भारतीय समाज के लिए कोई नई बात नहीं है। इस देश के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से ऐसे ही प्रेम भाव से रहते आए हैं। प्रस्तुति: प्रदीप कुमार
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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