सोमवार, 16 जनवरी 2012

समाचारपत्रों मेंगन्दगी :/ ले. महादेव देसाई


हम अपने देश में अपनी अदूरदृष्टि के झगड़ों से उबरे नहीं हैं । कई साप्ताहिकों ने  खास कर मराठी दैनिकों ने निन्दा और कीचड़ उछालने को अपनी पूँजी माना है , महसभावादियों ( हिन्दू महासभावादी ) को भरोसा है कि लोग अदालत में नहीं जायेंगे , अथवा गए तब भी गँवाने लायक उनके पास माल-मत्ता न होने के कारण , अच्छे भले नेताओं और संस्थाओं की बदनामी करने में उन्हें शरम नहीं आती ,सीधी बातों को उलटा कर देना वे गौरव मानते हैं , महाराष्ट्र को सुलभ पौराणिक ज्ञान की भोंडी उपमा तथा रूपक का  उपयोग वे करते हैं । मैं इसके उदाहरण नहीं दूँगा ।मात्र सीधी बात को उलटने का एक ताजा नमूना किसी मराठी पाठक ने भेजा है , वह दे रहा हूँ । उस समाचरपत्र ने खबर ‘हरिजन’ से ली है , परन्तु ‘हरिजन’ की एक – एक बात को उलट दिया है । मैंने लिखा था : “सेगाँव वर्धा से साढ़े पाँच मील है, मतलब आने-जाने में ग्यारह मील की कसरत हो जाती है । ” इस पर उस अखबार ने लिखा : ” खुद (गांधी) गाँव में निश्चिन्त हो मजा ले रहे हैं ; और दूसरों को वहाँ तक चलाने में उन्हें शर्म नहीं आती ।” मैंने लिखा था : ” ग्रामसेवा विद्यालय विद्यालय के विद्यार्थी गांधीजी के पास गए तब बुवा ने भजन गा कर उन्हें रिझाया । बुवा का तार्रुफ़ देते हुए विद्यार्थियों से गांधीजी ने कहा, ‘ वे मेरी तरह भाषण नहीं देते । वे बस भजन करते हैं । मेरी तो बोली से ही प्रचार मुमकिन है, चूँकि मैं गा नहीं सकता और न ही भजन बना सकता हूँ । “  उस मराठी पत्र ने लिखा : ” गांधी गाँव में गए हैं सेवा करने , किन्तु वहाँ बैठ कर बुवा से भजन सुन रहे हैं । बुवा की बाबत गांधी बोले ,’ वे मेरी तरह भाषण नहीं करते , भजन करते हैं । ” यह बुवा पर कटाक्ष था उनकी स्तुति ? और खुद गाना भी नहीं आता ,क्या कर महात्मा बन बैठे हैं ? “
महाराष्ट्र के अखबारों का ही दोष क्यों निकालूँ ? गुजरात में भी ऐसे अखबार है जो उनसे सवाये हैं ।अन्तर सिर्फ यह है कि महाराष्ट्र वालों में बुद्धि है ,जबकि यहाँ के इन पत्रों में दुष्ट बुद्धि के अलावा अन्य बुद्धि नदारद है । उनके उदाहरण लिखने का मतलब कागज को अंकित नहीं कलंकित करना होगा । महाकष्ट से जिन्हें छापा जा सकता है ऐसे एक-दो कुटिलता के नमूने देना पर्याप्त होगा : “मन्दिरों को चकलाघर कहने वाले गांधीजी का सत्याग्रहाश्रम खुद चकलाघर है । सहशिक्षण के प्रभाव में लड़के -लड़कियों का भोगविलास हुआ , परिणामस्वरूप गांधीजी ने उपवास किए ।आखिरकार , आश्रमवासियों के रणसंग्राम से बुज़दिली से हटने के कारण सत्याग्रहाश्रम सरकार को सौंपने का कदम उठाया । ……. अब तो आश्रम में चमार रहते हैं ,और चमड़ा सुधार कर जूते बनाते हैं । ” ” गांधी को हिन्दू धर्म पर बहुत खुन्नस-जलन है । कहा जाता है कि दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने जो लड़ाई चलायी थी उसमें मुख्यतौर पर मुसलमानों का समर्थन था , विचारशील हिन्दुओं का समर्थन कम ही था , इसलिए यह जलन वे हिन्दू जाति पर निकाल रहे हैं ।यह बात सही है अथवा गलत यह प्रभु जाने, परन्तु हिन्दू धर्म की जड़ खोदने के जो प्रयास गांधीजी ने किए हैं,वैसे पेट में घुस कर धोखा देने के प्रयास मुसलमानों ने भी नहीं किए हैं । “
किशोरलाल भाई ने ‘सहशिक्षण’ पर सर्वांगीण चर्चा करते हुए लेख लिखा था । गुजरात में कई लोगों को वह पसन्द आया था । वे अत्यन्त मर्यादावादी हैं,यह सुविदित है । उस लेख में स्त्री-पुरुष संबंधों से उपजे दोषों के कारणों की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा था :
” सामाजिक तत्त्वज्ञान में आजकल निम्न प्रकार के विचार फैल रहे हैं :
(४) बाप – बेटी , माँ – बेटे या भाई – बहन को मर्यादा में बरतना चाहिए ऐसा कहने वालों में विकृत लिंग चेतना की पराकाष्ठा हुई है । ….. जो बाप या भाई , बेटी या माँ का हाथ पकड़ता है , अथवा उसके साथ अकेला बैठता, या उसके कन्धे पर हाथ रखता है अथवा प्रेम से चुंबन करते वक्त अथवा उसे वस्त्रहीन दशा में देख चिन्ता में पड़ता हो तब वह बहुत छिछला व्यक्ति होना चाहिए ।….
” विद्यालयों में या समाज में धार्मिक तत्त्वज्ञान के नाम पर या सामाजिक तत्त्वज्ञान के नाम पर ऊपर वर्णित विचार फैल रहे हैं जो आज के ब्रह्मचर्य संबंधी दोषों का एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं । “
इस लेखक ने इसमें से शुरुआत के और आख़ीर के फिकरे उड़ा दिए और बीच का फिकरा किशोरलाल भाई के मत्थे मढ़ दिया !! ऊपर से यह टीका जड़ दी : ” गांधी के दुलरुआ किशोरलाल मशरूवाला दिनप्रतिदिन कैसी अधम दशा में पतित हो रहे हैं , उसका वर्णन ऊपर दिए लेख से मिलता है । “
मुझे यह बता देना चाहिए कि सनातन धर्म को लजाने वाला यह पत्र सौभाग्य से मासिक है , इसलिए पैसा खर्च कर उसका विष पीने वाले बहुत कम लोग होंगे ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें