सोमवार, 16 जनवरी 2012

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई


मेरे पास ‘ मेंचेस्टर गार्डियन ‘ का एक अंक पड़ा है , उसमें लिबरल ‘समर स्कूल ‘ की व्याख्यानमाला के पाँच सात धुरंधर व्याख्याताओं के चार – पाँच दिनों के व्याख्यानों का उत्तम सार एक पृष्ट के चार कॉलम में दिया गया है । अनेक व्यवसायों के आज के युग में भाषणों के अक्षरश: विवरण लेने की सुविधा हो फिर भी उसका पालन किया जाए यह जरूरी नहीं है , कई लोगों की इतना पढ़ने की फुरसत नहीं होती । फिर यह भी जरूरी है कि वक्ता के साथ तनिक भी अन्याय न हो ऐसा सार संक्षेप प्रस्तुत करने की कला विकसित करना बहुत जरूरी है । कई बार वक्ता आवेश में आ जाता है , गफ़लत में या बेवजह न कहने वाली बातें भी कह देता है , इन बातों को सम्भाल कर ग्रहण करना चाहिए , उसके उद्गारों को हलका करने का नाज़ुक काम भी कुशल रिपोर्टर का हो जाता है ।
परन्तु यहाँ पुन: सत्यनिष्ठा का प्रश्न उठ खड़ा होता है , न्यायबुद्धि का प्रश्न आ खड़ा होता है । एक ताजा दृष्टान्त दे रहा हूँ । लंडन में ‘हिन्दुस्तान में नवयुग की गतिविधियाँ’ शुरु करने के मकसद से एक सभा आयोजित हुई । केटर्बरी के आर्चबिशप ने सदारत की । इनके भाषण की दो रपटें देखें , तथा दोनों का कितना भिन्न भिन्न असर होता है इस पर भी गौर करें । यह है , रॉईटर की रिपोर्ट :
” लंडन में ‘हिन्दुस्तान में नवयुग की गतिविधियाँ ‘ आरम्भ करने के लिए इसी विषय पर केटर्बरी के आर्चबिशप की सदारत में एक सभा हुई । अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने हिन्दुस्तानी ग्रामवासियों के जीवनस्तर को ऊँचा करने के मि. गाँधी के प्रयत्नों की स्तुति की । यह सभा हिन्दुस्तान में काम करने वाले अनेक मिशनरी मंडलों ने आयोजित की थी । वक्ताओं में लखनऊ के बिशप पिकेट भी थे ।
” केटर्बरी के आर्चबिशप ने इस बात पर खास जोर दिया कि अस्पृश्य-उद्धार की हलचल का राजनैतिक लाभ के लिए यदि दुरुपयोग हुआ तो उसको वे कत्तई समर्थन नहीं देंगे ।”
अब देखिए , उसी दिन के ‘हिन्दू’ के लंडन संवाददाता की रपट :
” वेस्टमिनिस्टर के सेन्ट्रल हॉल में बीती रात एक बड़ी सभा हुई । वहाँ अस्पृश्यों को ख्रिस्ती धर्म में लेने के लिए इसाई मिशनरी मंडलों की योजनाओं के बारे में सुना गया तथा फलस्वरूप हिन्दुस्तान के अस्पृश्यों के भविष्य की बाबत रस-विशेष जागृत हुआ ।
” केटर्बरी के आर्चबिशप ने मि. गाँधी के कार्य की भारी स्तुति की और साफ़ साफ़ यह कहा कि राजनैतिक टीकाकार भले ही गाँधी की बाबत जो भी कहें या सोचें ,मि. गाँधी ने जो नैतिक छाप डाली है उसके बारे में मुझे या मिशनरियों कोई सन्देह नहीं है । आर्चबिशप ने कहा कि हिन्दुस्तानी लोकमत के नेताओं को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि अस्पृश्यों के बीच काम करने वाले मंडल किसी भी राजनैतिक हलचल का इसाई धर्म के प्रचार के लिए कभी दुरुपयोग नहीं करेंगे तथा हिन्दुस्तान की जनता में से किसी तबके की भावनाओं को भुनाने का कोई भी राजनैतिक दल प्रयास करेगा तो उसमें भगीदार नहीं बनेंगे । इसाई धर्म में शामिल होने की जिनकी इच्छा होगी वैसे लोग इसाई धर्म और उसके कर्तव्य भली भाँति समझ चुके हों तब ही उन्हें स्वीकार किया जा सकता है । “
रॉईटर की रिपोर्ट सच्ची है अथवा ‘हिन्दू’ की ? रॉइटर की रिपोर्ट में ‘ इसाई धर्म के प्रचार के लिए ‘ इन शब्दों को उड़ा कर पूरे भाषण को अलग ही ध्वनि दे दी गयी है ,उस रपट में गाँधीजी के अस्पृश्यता निवारण के काम की बजाए ग्राम सेवा कार्य की स्तुतिकी गई- यह बताया गया है ।
इस प्रकार एक भाषण के संक्षिप्त सारांश से कई बार अर्थ का भारी अनर्थ हो जाता है । गाँधीजी के हिन्दुस्तान में प्रसारित कुछ लेखों के संक्षिप्त सारांश से दक्षिण अफ़्रीका में उनकी जान जा सकती थी । वे लेख जब वहाँ पूरे चपे तब अफ़्रीकावासियों को उन पर हमले करने के लिए पश्चाताप हुआ ।
[ जारी, अगला : तिलक का 'केसरी' ]

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