रविवार, 15 जनवरी 2012

जयशंकर प्रसाद के जीवन-युग पर आधारित उपन्‍यास 'कंथा / श्‍यामबिहारी श्‍यामल

-  श्‍यामबिहारी श्‍यामल ji  with sorrrrryyyyy next  nooooo

 

 

07-2011


जयशंकर प्रसाद के जीवन-युग पर आधारित उपन्‍यास 'कंथा' का ' नवनीत ' (मई 2011) में ज़ारी 12 वां अंश



                                         श्‍यामबिहारी श्‍यामल


         मुकुन्दीलाल गुप्त तीन दिनों से आकर काशी में पड़े हैं। वे जब भी बुलाये जाने का प्रयोजन पूछ रहे, प्रसाद मुस्कुराकर टाल दे रहे हैं, ‘‘ बताऊंगा... बताऊंगा... इतने व्यग्र क्यों हो रहे हो... कलकत्ते में तो तुम्हें दम मारने की फुर्सत मिलती नहीं... इसलिए यहां आ गये हो तो कुछ आराम कर लो... चाहो तो घाटों की ओर हो आओ... घूम-घाम करो! ’’
         शाम में मुकुन्दीलाल घाट की ओर से घूम-घामकर लौटे तो प्रसाद ने बैठकखाने में बुला लिया, ‘‘ ऐसा है, शिव शिव जी कहीं बाहर निकल गये थे इसलिए तुम्हें प्रयोजन नहीं बता पा रहा था अब वे काशी लौट आये हैं और थोड़ी ही देर में आने वाले हैं... तुम बैठो... कुछ आवश्‍यक चर्चा करेंगे हमलोग... ’’
शिव शिव ने उसी समय बैठकखाने में प्रवेश किया। अभिवादन के बाद बैठे। प्रसाद ने दोनों के साथ चर्चा शुरू की, ‘‘...ऐसा है मुकुन्दीलाल, सुंघनी-सुर्ती का धंधा तो पुश्‍तैनी थाती है इसे अपने जीते जी छोड़ने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता किंतु मैं अब यह सोच रहा हूं कि क्यों नहीं हमलोग पुस्तक प्रकाशन का कारोबार भी शुरू करें...’’
         ‘‘...भैया, सर्वोत्तम विचार है और यह सबसे प्रतिष्‍ठापूर्ण व्यवसाय भी... ’’
         ‘‘...असल में हिन्दी में अभी तक प्रकाशन के व्यवसाय का समुचित आकार उभर नहीं पाया है... इस दिशा में ऐसे लोगों की सक्रियता अपेक्षित है जो स्वयं साहित्य, समाज और देश-दुनिया से सीधा रिश्‍ता रखते हों... पुस्तक-बेचवा किस्म के लोगों ने इस व्यवसाय को आटा-तेल का धंधा बनाने प्रयास शुरू कर दिया है, यह चिंताजनक है... ’’
         ‘‘...सचमुच यह विडम्बना ही है कि जो व्यक्ति स्वयं जयशंकर प्रसाद है वह सुंघनी और जर्दा-सुर्ती का धंधा करने को विवश है जबकि जो लोग निर्ममतापूर्वक कुछ भी बेच देने को बेताब रहने वाले जीव, उन्हीं के हाथों में पुस्तक प्रकाशन का बौद्धिक व्यवसाय आ गया है... ’’
प्रसाद हंसने लगे, ‘‘ अरे, नहीं! ऐसा पूर्णतः नहीं, अभी अंशतः ही है... किंतु यह खतरा अवश्‍य मंडराता दिख रहा है कि इस ओर ध्यान न दिया गया तो आने वाले समय में यह व्यवसाय पूरी तरह मुनाफाखोरों के कब्जे में जा सकता है! ...वैसे फिलहाल तो भारती भंडार, जो हिन्दी का एक्र प्रमुख प्रकाशन-गृह है यह मेरे रचनाकार-सखा रायकृष्‍ण दास का ही निजी संस्थान है... तुम तो उन्हें जानते ही हो, वे स्वयं कला के गहरे मर्मज्ञ और संवेदन- सजग सृजनधर्मी हैं... उन्होंने हिन्दी में गद्य-गीतों का आविष्‍कार किया है... भविष्‍य में जब कोई योग्य विद्वान इसका मूल्यांकन करेगा तो उनके योगदान का मूल्य गहराई से स्वीकार किया जायेगा... ’’
         ‘‘...मामा जी, सखा का नाम आते ही आप विषयांतर हो गये! ...आप फिलहाल प्रकाशन व्यवसाय पर...’’
         ‘‘...विषयांतर नहीं, कवि होने के नाते भाव-भूमि में चला गया था! ...खैर, तो उसी तरह मैथिलीशरण जी ‘साहित्य सदन’ चला ही रहे हैं... यहीं काशी में मुंशी प्रेमचन्द सरस्वती प्रेस का संचालन कर रहे हैं... उधर रामनरेश त्रिपाठी एक प्रकाशन चलाते हैं... शब्दशास्त्री  रामचंद्र वर्मा का भी प्रकाशन-उपक्रम ‘साहित्य रत्न माला’ है ही... इधर विनोदशंकर व्यास का ‘पुस्तक मंदिर’ भी अच्छी किताबें निकाल रहा है... ’’ मुकुन्दीलाल ध्यान से सुनते रहे। प्रसाद आगे बोले, ‘‘...लेकिन यही है कि हमारे ऐसे ज्यादातर प्रकाशन-संस्थान जो पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं वे साज-सज्जा या गेटअप आदि के मामले में बांग्ला की पुस्तकों की टक्कर की अभी नहीं हो पा रहीं... ले-देकर मुंशी प्रेमचन्द के प्रेस में इन दिनों एक सहयोगी आये हैं- प्रवासीलाल वर्मा, वही एक ऐसे व्यक्ति हैं जो इस दृष्टि से थोड़े जानकार लग रहे हैं... इसलिए सरस्वती प्रेस की किताबों को वे बांग्ला आदि की पुस्तकों के स्तर का आकार-प्रकार देने का भरसक प्रयास अवश्‍य कर रहे हैं... बाकी प्रकाशकों में बम्बई वाले नाथूराम प्रेमी भी थोड़े सलीकेदार कहे जा सकते हैं ...अन्यथा ज्यादातर तो बस किसी तरह कागज काला कर दे रहे हैं... ’’
         ‘‘...मैंने तो मैथिलीशरण जी की एक कोई पुस्तक देखी थी, उसका प्रोडक्‍शन बहुत बढ़िया था... वह तो उनके अपने ही प्रकाशन से छपी होगी न ? ’’
         प्रसाद ने तीखी मुस्कान के साथ ताका, ‘‘...मैथिलीशरण जी ने ही तो अपने ‘साहित्य सदन’ से मेरी कविता-पुस्तक ‘आंसू’ भी छापी थी... ओफ्फ, कैसा सिनेमा के गानों की किताब जैसा प्रोडक्‍शन दिया था... मेरा तो मन खिन्न होकर रह गया... जबकि उसी के साथ-साथ उन्होंने अपनी जो किताब प्रकाशित की उसे खूब सज-धज के साथ छापा! ...यही तो एक विडम्बना भी है कि जो साहित्यकार स्वयं प्रकाषन शुरू करते हैं वे जब अपनी कृति को छापते हैं तो उसके प्रोडक्षन में जान उड़ेल देते हैं जबकि किसी अन्य रचनाकार की पुस्तक में इतनी सुस्ती या चालबाजी दिखा देते हैं कि बेचारा लेखक तो अपनी ही छाती पर मुक्का मार कर गिर सकता है! ’’
         ‘‘...खैर, तो बतायें! ...आपने जो योजना बनायी है, इसका क्या स्वरूप है ? ’’
         ‘‘...पहले तो यह स्पष्‍ट कर दूं कि मुझे इस बात का अंदाजा है कि तुम्हारे लिए कलकत्ता छोड़ना मुश्कि़ल ही नहीं बल्कि असम्भव भी है, इसके बावजूद इसमें मैं तुम्हारी सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा रखता हूं... ’’
         ‘‘...हां भैया, यह तो है कि मेरे लिए कलकत्ता छोड़ना बहुत कठिन है किंतु आप जो जिम्मेवारी सौंपना चाहते हैं, बतायें... मैं यदि इसे स्वीकार कर सका तो इसमें शत-प्रतिशत परिणाम आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा... ’’
         भीतर से लखरानी ने हांक लगायी, ‘‘...ऐ बच्चा, अमिका आयल हउवन काऽ ? ’’
         प्रसंग-भंग का क्लेश प्रसाद के उत्तर-स्वर में हल्के ऐंठा, ‘‘ हंऽ!... ’’
         ‘‘...उनके भीतर भेजाऽ... कुछ बात करे के हौ... ’’
         ‘‘...इहौं तऽ बाते हो रहल हौ... इहां जादे आवश्‍यक चर्चा होत हौ... ’’
         ‘‘...आवश्‍यक बात कुछ मिनिट तुहें दुनो कराऽ ... उनके भेज दाऽ... ’’
प्रसाद ने मुस्कुराकर अम्बिकाप्रसाद गुप्त की ओर ताका। वे शिव शिव करते उठे। भीतर चले गये। मुकुंदीलाल हंसे, ‘‘...कुछ मिनट इनके लौटने का इंतजार कर लीजिये... एक साथ बातें होना अच्छा रहेगा! ’’
         जल्दी ही अम्बिका प्रसाद भीतर से आये। हाथ में मक्दल से भरी तस्तरी और छलकती ठंढई का बड़ा पात्र उठाये हुए। संतू परात में नमकीन की चार तस्तरियां और खाली गिलास लेकर आ गया। गिलास भर गये। सभी खाने-पीने लगे।
         प्रसाद ने प्रसंग की टूटी लड़ियां फिर सहेजनी शुरू की, ‘‘...हां, तो योजना यही है कि हमलोग अपना प्रकाषन शुरू करेंगे... मुद्रणालय यहीं परिसर में स्थापित किया जायेगा... योजना है कि मेरी तमाम पुस्तकों के प्रकाशन का काम यहीं से संचालित हो... ‘इन्दु’ का पुनर्प्रकाशन होगा और एक पाक्षिक पत्र भी शुरू किया जायेगा... मासिक ‘इन्दु’ में साहित्य, संस्कृति और इतिहास से संदर्भित बहुआयामी सामग्री होगी जबकि पाक्षिक पत्र में समसामयिक विचारपरक सामग्री दी जायेगी...’’ बोलते हुए उन्होंने मुकुंदीलाल के कंधे पर हाथ रखा, ‘‘... कार्य-विभाजन का जो खाका मैंने सोचा है, उसके अनुसार अर्थ-पक्ष और प्रबन्धन तुम्हारे अधीन होगा, मुद्रण-प्रकाशन अम्बिकाप्रसाद के अधीन और संचालन-संपादन का कार्य मैं सम्भालूंगा... ’’
‘‘ वाह, यह तो बहुत अच्छी योजना तैयार की है आपने... ’’
‘‘ इस व्यवसाय में पूंजी तुम्हारी भी लगेगी और मेरी भी... पूंजी के अनुपात के प्रश्‍न पर हमलोग आपस में सबकुछ तय कर लेंगे... वैसे मैं चाहता हूं कि इस व्यवसाय में हमारी-तुम्हारी आधे-आधे की हिस्सेदारी रहे...’’


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         कलकत्ता लौटकर यथाशीघ्र टाइप और प्रिण्टिंग मशीन आदि की खरीद से सम्बन्धित कार्रवाई पूरी करनी है मुकुन्दीलाल को। उन्होंने दूसरे ही दिन ट्रेन पकड़ ली। इधर काम तेज गति से आगे बढ़ने लगा। कई बार के सामूहिक मुआयना और विमर्श के बाद बैठकखाने में कार्यालय और दालान में प्रिण्टिंग मशीन बिठाने का स्थान तय हुआ। बीच के स्थान को घेरकर भण्डार का रूप। कई दिनों से कागज के नमूने आकर रखे रहे। प्रसाद ने ज्योंही अपनी पसन्द की मुहर लगायी, अम्बिका प्रसाद ने तुरंत आदेश जारी किया। कुछ ही घण्टों में ठेलों पर लदे कागज के टीले आकर दरवाजे पर खड़े हो गये। देखते ही देखते दालान का आधा हिस्सा कागज से भर गया। ताजगी से भरी कागजी सोंधाई हवा पर तैरने लगी। अम्बिकाप्रसाद टाइप-रेक बनवाने के काम में जुट गये। दालान में नियत स्थान के माप पर इसका निर्माण-कार्य होने लगा। मुकुन्दीलाल के निर्देशानुसार अम्बिकाप्रसाद ने दो ट्रेडिल और ‘पेनडासन’ की एक मशीन मंगाने के लिए कम्पनी के नाम विधिवत् आदेश-पत्र तैयार किया। प्रसाद ने इसका अवलोकन किया, तत्पश्‍चात यह प्रेषित कर दिया गया।
         मुकुन्दीलाल टाइप-मशीन आदि की खरीद के प्रोफोर्मा-बिल आदि के साथ लौटे कलकत्‍ते से। सुबह के नाश्‍ते के बाद उन्होंने यह सब सामने रखा। प्रसाद ने हाथ लगाये बगैर समझाया, ‘‘...ऐसा है, मैंने बहुत सोच-समझकर इधर यह निर्णय लिया है कि इस योजना में मैं कुछ बौद्धिक योगदान ही दूंगा, यथा सम्पादन-संशोधन, पुस्तकों के लिए होने वाले कला-पक्ष के कार्यों में कुछ परामर्श आदि बस... क्योंकि मेरा मन साहित्य को तिजारत से जोड़ने का साहस नहीं जुटा पा रहा... यह अत्यंत अनैतिक लग रहा है... दूसरी ओर घर के लोग व्यावसायिक हित की रक्षा की दृष्टि से अम्बिकाप्रसाद को अधिक विश्‍वसनीय मान रहे हैं, अब इसकी गहराई में मैं अभी नहीं जाना चाहता... तुम मेरे कहने पर इस योजना से जुड़े हो इसलिए मैं तो यही चाहूंगा कि ठीक से निभता चले... अब चूंकि इसी काम में अम्बिका भी जुटे हैं और तुम भी, इसलिए तुम दोनों के बीच आपस में एकदम पारदर्शी व्यवहार रहना चाहिए... आपसी व्यवहार के बारे में तुम दोनों आपस में परस्पर सहमति बनाकर एक अनुबन्ध तैयार कर लो, तो अच्छा रहेगा... ’’
         मुकुन्दीलाल अचकचा गये, ‘‘...इसमें मुझे अम्बिकाप्रसाद से निभाना होगा! ’’
‘‘...अब तो जो पूरी स्थिति है, वह मैंने तुम्हारे सामने रख दी... सोचो न, मैंने जिन रचनाओं को जन्म दिया है उनकी मैं तिजारत भला कैसे कर सकता हूं!...’’
         मुकुन्दीलाल चुप। प्रसाद ने आगे समझाया, ‘‘...अपना निर्णय मैंने कल ही अम्बिकाप्रसाद को बताया है... इन बदली हुई परिस्थितियों में अम्बिकाप्रसाद भी चाह रहे हैं कि तुम्हारे साथ लिखित शर्त्त-समझौतों पर ही काम आगे बढ़े... तुम तो जानते ही हो कि ‘इन्दु’ पत्रिका भी उन्हीं के जिम्मे रही है, जिसका पुनर्प्रकाशन प्रस्तावित है, इस नाते भी उनकी अहमियत है... अब यह भी तय है कि दूसरे पक्ष से इस कारोबार में अंततः सारा काम वही सम्भालेंगे... चाहते न चाहते इस समूचे कार्य-व्यवहार में तुम्हारा मतलब तो उन्हीं से अधिक रहेगा... इसलिए मेरी दृष्टि में ऐसा कुछ कर लेना ज्यादा अच्छा रहेगा... ’’ प्रसाद ने समझाया।
       
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         मुकुन्दीलाल थोड़ी देर में बैठकखाने में लौटे। चेहरा तमतमाया हुआ-सा! यहां प्रसाद के सामने कुर्सियों पर चार आगंतुक बैठे हैं। इनमें एक की पोशाक राजसी। हाव-भाव व पहनावे से शेष तीन लोग उनके राजकर्मी सरीखे। वह एक कुर्सी पर जाकर बैठ गये। प्रसाद ने परिचय कराया, ‘‘...यह हैं मुकुन्दीलाल गुप्त ! मेरे मौसेरे भाई... कलकत्ते में रहते हैं... वहीं इनका व्यवसाय...’’
        लाल लोहे जैसा तपता मुकुन्दीलाल का चेहरा जैसे छन्न् से कर गया। ताप गतिपूर्वक विसर्जित होने लगा। उन्होंने समक्ष आकर दोनों हाथ जोड़ लिए। आगंतुक ने तत्क्षण खड़ा होकर दुगुनी विनम्रता से हाथ जोड़ सिर झुका लिया, ‘‘...और मैं एक अदना नाचीज... प्रसाद जी की कविताओं का एक दीवाना... इससे अधिक कुछ नहीं... ’’
       संतू आ-आकर तस्तरियों में अलग-अलग प्रकार के मिष्‍ठान्न सजाता रहा। आगन्तुक अब प्रसाद की ओर मुखातिब,  ‘‘...कविवर, मैं आपका अंध प्रशंसक हूं ’’
       ‘‘...बंधुवर, मैं कवि हूं इसलिए यह पूरे विश्‍वास से कह सकता हूं कि  कविता तो जनम-जनम की बन्द आंखें खोलती है... अत: मेरा प्रशंसक तो अंध हो ही नहीं सकता... ’’ प्रसाद ने अत्यंत सहज ही कहा किंतु इस पर वह इतने चमत्कृत और आह्लादित हुए कि उछलकर खड़े हो गये। लपककर उनका दाहिना हाथ पकड़ लिया। बहुत सम्मान दिखाते हुए वे हथेली को ललाट, पलकों और होंठों से चूमने लगे। प्रसाद संकोच से भर गये। सकुचाकर सिमट-से गये।
         आगंतुक सहज होने पर यथास्थान लौटे। प्रसाद ने सामने रखे मिष्‍ठान्न के पात्रों की ओर संकेत कर हाथ जोड़े। उन्होंने उदारतापूर्वक एक साथ कई पात्रों से तीन-चार मिठाइयां उठा ली। धीरे-धीरे मुंह में डालकर खाने लगे। उनके संकेत पर अन्य ने भी ग्रहण करना शुरू कर दिया। मिष्‍ठान्न खाते हुए उन्होंने मीठे अंदाज में अर्ज किया, ‘‘...कविवर, मैंने आपका ‘प्रेम पथिक’ पढ़ा तो इतना प्रभावित हुआ कि इसे अपना लेने की इच्छा बलवती हो उठी, तभी निश्‍चय किया कि काशी जाकर आपसे निवेदन करूंगा... अगर आप स्वीकार कर लें तो मेरा तो जन्म ही सार्थक हो जाये... ’’
         प्रसाद ने अचकचाकर ताका। कुछ बोले नहीं, सोचते रहे। आगंतुक ने इस जिज्ञासा को ताड़ते हुए स्वयं ही अपनी बात को खोलना शुरू किया, ‘‘ ...मैं चाहता हूं कि यह कृति आप मुझे समर्पित कर दें ...आपके समर्पण की सहमति पर मैं इसे कोमल-कलात्मक कागज पर नये सिरे से मुद्रित कराकर सर्वत्र सुगंध की तरह उड़ाकर फैला दूंगा... ’’
         मुंह खोले प्रसाद हक्का-बक्का ताकते रहे। आगंतुक ने आगे जोड़ा, ‘‘...इसके एवज में आप मुझे जो आदेश करें मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत करने को तैयार हूं... ’’
         जैसे वज्रपात हो गया हो। प्रसाद की आंखें फैल गयीं और पुतलियों से जैसे चिनगारी छूटने लगी। तमतमाकर वे उठ खड़े हुए किंतु दूसरे ही क्षण उन्होंने स्वयं को संयत कर लिया, ‘‘...आप अतिथि हैं और मेरे काव्य के गहरे प्रशंसक, मेरे लिए आपकी कोई बात को पूरा न करना कितना कष्‍टकारी है, यह मैं व्यक्त नहीं कर पा रहा किंतु आपने जो इच्छा अभी व्यक्त की, इसे सुनकर मेरा मन आहत हो गया है... ’’
         आगंतुक हड़बड़ाकर उठे। दोनों हाथ जोड़कर बोले, ‘‘...आप अन्यथा न लें...’’
         ‘‘...सुनिये, मेरी बात तो सुनिये! आपलोग राजे-रजवाड़े हैं... आपके पास अपार सम्पत्ति है, आप जो चाहें कर सकते हैं, खरीद सकते हैं... लेकिन आपसे प्राप्त करने की क्षमता भी तो होनी चाहिए... आप तो जानते हैं कि मैं व्यवसाय सुर्ती और जर्दे का करता हूं... कविता मेरा व्यवसाय नहीं, प्रेम है... साधना है... आपके पास पैसा है तो आप हमसे अच्छा से अच्छा जर्दा, इतर, खुश्‍ाबू मांग सकते हैं, यह मेरे व्यवसाय के अंतर्गत आता है... मैं सहर्ष आपको प्रस्तुत कर सकता हूं... भला कोई अपना प्रेम या अपनी साधना को कैसे बेच सकता है ? ’’ रोष से शुरू तपता स्वर अंत तक आते-आते करुणा से सिक्त हो चला है।
         प्रसाद की आंखों को उमड़ते देख आगंतुक स्याह! घबराकर उठा। उनके दोनों हाथों को पकड़ हथेलियों को अपने माथे लगाने लगा, ‘‘...मैं बहुत लज्जित हूं... कृप्या आप मुझे क्षमा-दान दें... असल में यह भूल आपके अंध-प्रशंसक की ही है... इस इच्छा को अनुचित समझते हुए भी आवेग में आकर इसे मैंने आपके सामने रख दिया, क्षमा! ’’
         प्रसाद ने उन्हें साग्रह बिठाया। पास ही स्वयं भी बैठ गये। आगंतुक ने फिर हाथ जोड़ लिये, ‘‘ ...अब मैं यहां से जाने की अनुमति चाहूंगा किंतु एक आग्रह के साथ... ’’ प्रसाद के मुंह जिज्ञासा से खुल गये हैं। उन्होंने अपनी बात रखी, ‘‘...आप कम से कम एक यह अनुमति तो मुझे दे ही दें कि मैं आपकी एक पंक्ति लेकर अपने दरबार में टांग दूं... यह मुझे बहुत प्रिय है..’’
         आगंतुक के चुप हो लेने के बाद भी उसके जैसे नेत्र धाराप्रवाह बोलते जा रहे हों। प्रसाद ने मुड़कर उनके दोनों हाथों पर सस्नेह-स्पर्श रखा, ‘‘ यह तो आपका अधिकार है... लेकिन यह कौन-सी पंक्ति है जो आपको इतनी प्रिय है...? ’’
‘‘ ...इस पथ का उद्देश्‍य नहीं है श्रान्त भवन में टिक रहना...
      किंतु पहुंचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं ’’


     वे लोग जाने लगे तो प्रसाद विदा करने दूर तक बाहर आये।


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         प्रकाशन-मुद्रण प्रभाग ने बैठक से लेकर आंगन और भीतरी कमरों तक काफी स्थान घेर लिया है। विशेषकर लेखन-अध्ययन कार्य के लिए नया स्थान तय करने की आवश्‍यकता महसूस होने लगी। प्रसाद ने भाभी के आगे बात रखी। उन्होंने सहमति दी, ‘‘ गृह के तऽ विस्तार करल जरुरिये हौ लेकिन एक बात पर अधिका ध्यान देवे के हौ...’’
प्रसाद ने जिज्ञासा से ताका। वह समझाने लगीं, ‘‘...बगलिया के ई जे तिकोन भूखण्ड हौ, येके पहिले ठीक करावाऽ... ई शुभ ना हौ... देखाऽ.. विन्ध्वासिनी बीमार पड़ल हईन... यही सब देखके बुझात हौ कि ई घर में अब तक बहुत लापरवाही भैल हौ... ई बात पर कब्बो केहु ध्यान ना देलस... जबकि घर में लगातार अनिष्‍ट होवत चलत आवत हौ! एक पर एक घर के लोग शिकार बनत चल गलन लेकिन केउ के ध्यान ना गल! ’’
         ‘‘...हम येकरा पर हां ना करब! शुभ-अशुभ के सब विवाद भ्रामक हौ... अइसन कोई अशुभ ना हौ जेमें शुभ के बीज ना होवे... ओसहीं हर शुभ के भीतरे अशुभ के बीज होले... जन्म में ही मृत्यु के प्रतीक्षा-बीज पड़ल होला... हर मृत्यु के समानांतर कहीं न कहीं नया जीवन के संकेत मिलत रहला... येसे हमके जगहा के तिकोन और चौकोर वाला संदेह या विवाद उचित ना लगत हौ... ’’ उन्होंने निश्‍चयात्मक दृढ़ता से बात रखी।
         लखरानी देवी मुस्कुरायीं, ‘‘...तोहार ज्ञान अपने जगहे रहे तऽ अधिका अच्छा! बढ़िया नकशा के हिसाब से भी तऽ मका़न बनवले में तिकोन जगहा असुविधाजनक होई... जगहा चौकोर होवे तो कमरा सब ठीक से उतरी... तोहरे लिखे-पढ़े वाला स्थान तऽ बनहिं के चाहीं लेकिन सबसे पहले तऽ विंध्यवासिनी के स्वास्थ्य-लाभ के लिए एक हवादार कमरा होवे के चाहीं... जे देखत हौ से इहे कह दत हौ कि ई घर में कीटाणु के वास हो गल हौ... घर बंद-बंद हौ... हवा के प्रवाह बाधित हौ... घर में हवा के आगम और निगम के भरपूर गुंजाइश होवे के चाहीं... ई हिसाब से भी बीच के गली हटाके दुनों भूखण्डन के एक कइल जरुरी हौ...’’
         प्रसाद संजीदा रहे। लखरानी देवी उत्तर की प्रतीक्षा में ताकती रहीं। छोटे से अंतराल के बाद वे बोले, ‘‘ म्युनिस्‍पल बोर्ड से ही ई काम होई... बीच के गली वाला रास्ता हटाके दूनों भूखण्ड के एकीकरण करावे के खातिर भूमि हस्तांतरण-प्रक्रिया शुरू हो गल हौ... जल्दिये ई काम पूरा हो जाई... ’’
         लखरानी देवी को इस सूचना से बहुत राहत पहुंची, ‘‘ हंऽ... हम इहे पूछेके चाहत रहीं... चलाऽ  ठीक हौ...  ई जब हो जाये तब निर्माण-कार्य करावल जाई... ’’
         चेखुरा ने आकर बताया, ‘‘ छोटकी भाभी बोलावत हइन! ’’
        लखरानी देवी गतिपूर्वक उठीं, ‘‘ बातचीत में हम भुला गल रही कि ओके नाश्‍ता देके आल रही... अब दवा देवे के हौ...’’


         प्रसाद भी पीछे-पीछे पहुंचे।
         लखरानी देवी ने गिलास में पानी पकड़ाने के बाद हथेली में रखकर गोली बढ़ा दी। विन्ध्वासिनी देवी ने दवा लेकर मुंह में डाल ली। वह गिलास से पानी पीने लगीं। तभी सामने प्रसाद पर नज़र गयी। पानी पीती हुईं वह मुस्कुरायीं। रोग से आहत कृश काया लताओं की तरह झुरझुरा उठी। तन क्लान्ति को मन की कान्ति ने जैसे झुठला दिया हो। लगा कि सचमुच यह मुस्कान आत्मा से फूटी हो। अंतरतम तक जुड़ा गया। आंखें भर आयीं। वह तुरंत पीछे मुड़ गये। लखरानी देवी ने आवाज लगायी, ‘‘ काहे बच्चाऽ! आवाऽ काहे जाये लगलाऽ ? आवाऽ... आवाऽ... ’’
         विन्ध्वासिनी देवी के मुख-मण्डल पर मुस्कान टिकी रही किंतु आंखों की भाषा सजल हो उठी। प्रसाद लौटे नहीं।


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         भूमि-हस्‍तांतरण प्रक्रिया लम्‍बी खिंचती रही। इसी बीच विन्‍ध्‍यवासिनी चल बसीं। उन्‍हें प्रवहमान वायु और सीधी सूर्य-किरणों वाला कमरा देने की इच्छा अधूरी रह गयी। तराशे हुए पत्थर मुरझा गये। निर्माण-सामग्री पड़ी रही। अंततः उनके निधन के सतासी दिनों बाद उक्त कार्यालयी प्रक्रिया पूरी हुई किंतु तब तक गृह- निर्माण की योजना शिथिल पड़ चुकी थी।


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         मुकुन्‍दीलाल आये। अम्बिकाप्रसाद से अपनी बातचीत की संक्षिप्त चर्चा करते हुए प्रसाद को बताने लगे, ‘‘ भैया, ऐसा है... आपने इस पुस्तक प्रकाशन योजना से क्यों किनारा किया, इसका मर्म मैंने अभी उन आगंतुक के साथ आपकी चर्चा के दौरान समझ लिया है किंतु शिव शिव के साथ मेरी भी निभने वाली नहीं है... ’’
         ‘‘ क्या ? ’’
         ‘‘ हां! मैं सही कह रहा हूं... ’’
         ‘‘ मैं उन्हें अभी यहां बुलवाता हूं... उन्होंने तुम्हें कुछ अप्रिय तो नहीं कहा?’’
         ‘‘ ना... ना! उन्हें न तो यहां बुलवायें न मुझसे यह पूछें कि उनसे मेरी क्या-क्या व कैसे-कैसे बातें हुईं... आप सिर्फ मेरे इस निर्णय पर अनुमति की मुहर लगायें कि मैं इस योजना से अपना हाथ खींचता हूं... ’’
         ‘‘ अरे, कुछ तो संकेत करो कि बात हुई क्या ? ’’
         ‘‘ आप जब पूछ ही लेना चाहते हैं तो मूल बात मैं बता ही दूं... असल में आपने जो आधे-आधे की हिस्सेदारी की बात कह दी है... यह शिव शिव को सर्वथा अस्वीकार है... उन्होंने घूमा-फिराकर इसका ही लगातार तरह-तरह से खण्डन किया और मुझे यह प्रस्ताव दिया है कि इसमें मैं जो रुपये लगाऊं... उसका ब्याज ले लिया करूं... मैं तो यह सुनकर स्तब्ध रह गया... मुझे यदि ब्याज का ही धंधा करना हो तो इसके लिए मैं कलकत्ता के बजाय काशी को क्यों चुनूं! ’’
         प्रसाद चुपचाप मुंह ताकते रहे। मुकुन्दीलाल ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘ मैंने उन्हें अपनी असहमति बता दी है, अब आपसे विधिवत् अनुमति मिल जाये तो इस योजना से स्वयं को मुक्त करूं और कलकत्ता लौट जाऊं! ’’
         ‘‘ तुम्हारा निर्णय गलत नहीं है! इस पचड़े से बचे रहो, यही अच्छा रहेगा! ’’
         मुकुन्दीलाल ने प्रसाद से सहमति लेकर लगे हाथ तार भेज मशीनों का आर्डर कैंसिल करा दिया। कागज जहां से आया था, वापस किया जाने लगा। उसी रात उन्होंने कलकत्ते के लिए प्रस्थान किया।


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         महाशिवरात्रि का दिन। हवा-बयार तक धतूरी। भांग की तेज गंध जैसे सीधे आकाश से ही बरस रही हो! झोंके बौराये हुए बौआ रहे हैं। सब कुछ धसोरते-गिराते हुए। गृह परिसर का शिवाला कुचकुच हरे आम्र-पत्रों और कागज की रंग-बिरंगी झंडियों से सजा है। मंदिर ऐसा प्राणवंत जैसे आकर कोई योगी बैठ गया हो! भूमि पर पाल्थी जमाये, आकाश में शीश उठाये हुए। योग -मुद्रा में ध्यानस्थ। मंदिर के जगमोहन में दरी-चादर बिछ गयी है। लोग जम गये हैं। मोहनसराय से पहुंचे हैं सुकवि मुकुन्दीलाल। मिर्जापुर से शिवदास। काशी के लोगों में बचनू महराज, बोकी सिंह व मोहनलाल रस्तोगी जैसे व्यक्तिगत मित्र और साहित्यिक साथियों में रामचन्द्र शुक्ल, केशव प्रसाद मिश्र, रायकृष्‍ण दास, रामचन्द्र वर्मा आदि भी विराजमान। विनोदशंकर व्यास इंतजाम में जुटे हैं।
         घर से निकलकर मंदिर की ओर लखरानी देवी बढ़ीं तो पीछे-पीछे ठुनकता बालक भी खिंचता आने लगा। उन्होंने उसे लौटा देना चाहा किंतु उसने आंचल का कोर पकड़ लिया है। रो- रोकर साथ चलने की जिद पर अड़ गया। वह खीझकर आगे बढ़ने लगीं। बालक छोटे-छोटे डगों से ही लगभग दौड़ता हुआ उनके कदमों से खुद को जोड़ने लगा।
         बोकी सिंह ने दूर से ही यह सब ध्यान से देखा। उठे और तेज कदमों से सामने से आने लगे। उन्होंने पास पहुंचते हुए बच्चे को संबोधित किया, ‘‘ काहे होऽ... तूं काहे ठुनकत हउवाऽ...? आवाऽ... हम्मरे लग्गे आवाऽ... आपन चच्ची के परेशान मत कराऽ.. आवाऽ....! ’’
         निकट आकर उन्होंने झुककर ज्योंही बच्चे को गोद में लेना चाहा वह उंउं करता हाथ भांजने लगा। झटका खाकर उन्होंने हाथ पीछे खींच लिये। सम्भलते हुए वहीं ठिठक गये। आंखें नचाते हुए सिर को हिलाया, ‘‘ अरे वाह! लगता है, जयशंकर के बेटे को तो अभी से पहलवानी के सारे दांव-पेंच पता हैं! ’’
         बच्चे ने उंउं करते हुए खीझ के साथ तिरछे ताका। लखरानी रुक गयीं। हंसने लगीं। उन्होंने नन्हें आंदोलित हाथों को पकड़ लिया और पुचकारते हुए उसे गोद में उठा लिया, ‘‘ अरे बोकी सिंह! ई हमार बच्चा के नऽ बच्चा हउवन... ई तोरे पकड़ में ना अइहन! झारखंडी के बेटा ई एकदमे महाझारखंडी हउवन.. गोस्सा जाऽलन तऽ... केहु के बात ना सुनऽलन! ’’ गोद में चढ़कर बच्चे ने विजयी भाव से मुंह बनाया और ऐंठकर ताका। कपोलों पर पंक्तिबद्ध आंसू की बून्दों ने भी जैसे विशेष कोणों से चमककर मुंह चिढ़ाया। बोकी ने झटके से हाथ बढ़ाकर बच्चे के कपोलों से कुछ बूंदें पोंछ डाली। उसने प्रतितरोधपूर्वक हाथ चलाया और आंखें फैला होंठों को गोला किया। बोकी ने बच्चे की आंखों में आंखें डाल सिर नचाते हुए प्यार से ठिठोली की ‘‘ इस बच्चे का नाम रत्नशंकर है न! ’’
         दूसरे हाथ से आंचल सम्भालतीं लखरानी ने हंसते हुए सिर हिलाया। हुंकारी भरी।
         वह आगे बोले, ‘‘ ...तभी तो इसकी आंखों से झरी बून्दें रत्न की तरह ही चमक रही हैं!’’
         ‘‘..ई लइका हम्मे एको मिनिट नाऽ छोड़ सकेऽ...'' उसे गोद में उठाये-उठाये लखरानी कदम बढ़ाने लगीं, ''...अउर येकरे बाप आज शिवरात्रि के दिन पूजा-पाठ के सब इंतजाम छोड़ के ना जाने कहां चल गल हउवन! हम तऽ पंडितजी के बोलवले पर मंदिर पर जात हई! कहां गइलन बच्चा, तोरे कुछ पता हौऽ ? ’’
         बोकी ने इनकार में सिर हिलाया, ‘‘ व्यास जी ने तो बताया कि अचानक वे कहीं बाहर की ओर निकल गये हैं... इस बीच यहां उनके कई दोस्त भी आ पहुचे हैं... सभी जमे हुए हैं और उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं... ’’
         जगमोहन के पास लखरानी के पहुंचते ही दरी-चादर पर बैठे सभी उठ खड़े  हुए। सबने अभिवादन किया। उन्होंने सिर का आंचल सम्भालते हुए मुस्कुराकर आशीर्वचन कहे। मंदिर में पहुंचकर बालक से बोलीं, ‘‘ रतनशंकर, जाके देखाऽ तऽ कहां गइलन तोहार बाऊ... केने हउवन बोलावा तऽ बेटाऽ! ’’
         नन्हा बालक आंचल का कोर पकड़े दूसरे हाथ की एक उंगली मुंह में डाले ठुनकता रहा। गर्भगृह में अनुष्‍ठान चल रहा है। शिवलिंग के ऊपर बिल्व-पत्रों का बड़ा-सा ढेर। जैसे कैलास को हरे रंग में देख मुग्ध व उत्साहित होकर कैलासनाथ ने उसे अपने शीश पर ही उठा लिया हो! हवा पर फूलों, बिल्व-पत्रों व धूप-अगरबत्ती की मिली-जुली सुगंध की भीनी-भीनी लहरें।
         आसन पर आसीन पण्डितजी ने दृष्टि उठायी, ‘‘अइसन हौ मलकिन,  साहु जी हमसे कहके गइल हउवन... कौनो जरुरी काम आ गल रहल... ’’
         लखरानी के तेवर कड़े हो गये, ‘‘ अइसन कौन काम आ गल जे हमरा पते ना हौ अउर ऊ शिवरातर के पूजा छोड़ के चलि देलन! अइसन तऽ आज तक ना भल रहल कि शिवरातर के दिन ऊ मंदिर से उतरके कहीं चल गल होवें...’’
        भुनभुनाते हुए लखरानी देवी ने पूजा के प्रबंध की अगली जिम्मेवारियां सम्भाल ली, ‘‘ बच्चा के इहे एक आदत ठीक ना हौऽ... रहऽलन-रहऽलन अचक्के में कुछ अइसन उट-पटांग कर देलन जे से मन उजबुजा जाऽ ले! ’’
        प्रसाद बाहर से परिसर में लौटे। रेशमी पीताम्बर में दमकती पुष्‍ट गौर काया। चमकते चेहरे पर दमकती आंखें, काव्य में व्यंजना की तीव्र कौंध जैसी। ललाट पर त्रिपुण्ड। गले में गौरीशंकर रूद्राक्षों के ग्यारह दानों की माला।
         आचार्य शुक्ल ने टोंका, ‘‘ कहां चले गये थे प्रसाद जी ?... ’’ वेशभूषा पर ध्यान जाते ही आगे बोले, ‘‘ वाह, आज आप तो साक्षात् शिव-रूप ही लग रहे हैं... ’’
         सामने से आते हुए गौड़ मुस्कुराये। दास ने आचार्य शुक्ल की ओर गौर से ताका, ‘‘ शिवरात्रि पर यहां इनका यही रूप तो प्रत्येक वर्ष रहता है... फिर आज अचानक आपको इसमें नया क्या दिख गया आचार्य ? ’’
         गौड़ पास आ पहुंचे, ‘‘ अब यही तो आप अंड-बंड करने लगे न! ’’ दास ने अचकचा गये। दूसरे ही पल इस निषेध-भाव से ताका कि व्यंग्यकार महोदय, कोई तीखे तीर न छोड़ देना!
         प्रसाद गंभीरतापूर्वक कभी गौड़ तो कभी आचार्य शुक्ल की ओर ताके जा रहे हैं। गौड़ ने अपनी बात पूरी की, ‘‘ भई, आचार्य का देखना एक घटना है और न देखना जाहिरन ‘घटना’ का विलोम! ’’
         दास इस कथन का अभिप्राय समझ न सके, यह उनके चेहरे पर उभरकर टिकी गहरी प्रश्‍नवाचक रेखाओं से व्यक्त। गौड़ ने दूसरे ही पल अपनी बात को स्वयं ही कुछ और खोला, ‘‘ घटना यानी घट जाना... इसलिए इसका विलोम हुआ बढ़ना! ’’ सभी चेहरों पर मुस्कान तैर गयी। उन्होंने बिना हंसे-मुस्कुराये अपनी बात जारी रखी, ‘‘ इतिहासकार ने ज्योंही नजर डाल दी, इतिहास से रिश्‍ता शुरू! ...इसका मतलब यही कि अमुक संदर्भ का वर्त्तमान व भविष्‍य से सीधा संबंध सीधे खत्म और ...यानि रिश्‍ते के दो आयाम तत्काल समाप्त ! इसीलिए ऐसे आचार्य का देखना घटना ही तो है जबकि ‘न देखने’ का मतलब यही कि इसके संदर्भ कल, आज और कल अर्थात् तीन तरफ से जुड़े हुए बचे रह गये हैं! इसलिए उनका ‘न देखना’ हुआ बढ़ना! ’’
         दास ने मुस्कुराकर आचार्य शुक्ल की ओर दृष्टि उठायी। वे जैसे अपने भीतर कोई तूफान दबाये बैठे हों। व्यास ने निकट आकर हाथ जोड़े, ‘‘ आप सभी हमारे आदरणीय हैं, मैं एक ही अनुरोध करना चाहूंगा... ’’ प्रसाद ने आश्‍वस्ति के साथ व्यास की ओर ताका। उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ायी, ‘‘ ...आज शिवरात्रि का दिन है, हमलोग यहां सार्थक और सकारात्मक बातें ही करें ताकि किसी भी दशा में माहौल भारी न हो सके... ’’
         गौड़ ने चुहल से आंखें नचायी। बौखलाने का अभिनय करने लगे, ‘‘ अरे वाह भई! अब आप हमें सिखायेंगे कि हमें आज क्या और कैसे बतियाना है! ’’ व्यास सकपका कर रह गये किंतु शेष अन्य लोगों के चेहरों पर मुस्कान का रंग उगने लगा। उन्होंने आवेगपूर्ण स्वर में आगे कहा, ‘‘ शिवरात्रि का दिन है तो यहां शिव के गणों की अपनी हरकतें क्यों नहीं होंगी! ..हमलोग यहां जितने भी उपस्थित हैं, आप कृप्या सबको ध्यान से देख तो लीजिये... इसके बाद आप ही सच-सच बता दीजिये कि क्या यहां कोई ऐसा भी है जो बाबा के ‘गण’ के दर्जे वाली योग्यता से वंचित हो ? शुक्ल जी साक्षात् इतिहासकार हैं, बड़े से बड़ा पिशाच भी इनके सामने क्‍या एक पल भी ठहरेगा? ’’ सभी ठठा पड़े।
         आचार्य शुक्ल का जैसे अचानक मानसिक तापमान बढ़ गया हो। प्रसाद गम्भीरता से ताकते रहे। उन्होंने अपनी विशिष्‍ट मीठी-तीखी शैली में बातें आगे जारी रखी, ‘‘...इधर हमारे दास जी को ही देख लीजिये... इनकी राय तक कृष्‍ण (काली) होती है, ऐसे विचारों वाले व्यक्ति को क्या मानना पड़ेगा, क्या यह भी बताना होगा? इसके बाद तो मुकुन्दीलाल हों, शिवदास हों या बचनू, बोकी, रस्तोगी अथवा हमारी-आपकी ही तरह स्वयं केशव जी ही, हमलोग तो काशी भर में जयशंकर के गण के रूप में चिह्नत हैं ही... ऐसे में आज यहां भला कोई वैष्‍णवी शालीनता का दृष्य कहां से सृजित हो सकेगा ? ’’
        आचार्य शुक्ल की आंखों में तनाव तरल हो चला। वाणी में क्रमश: सहजता भरने लगी, ‘‘...ऐ भई व्यास... काहे व्यर्थ परिश्रम किये जा रहे हो... गौड़ जी को कुछ भी समझाने का प्रयास कर तुम अंततः स्वयं के प्रति ही संदेह भर रहे हो... क्या तुम्हें इतनी-सी बात भी आज तक समझ में नहीं आ सकी कि इन्हें कुछ भी समझाने का प्रयास अपने-आप में गहरी नासमझी का पर्याय है! ’’
         गौड़ ने अतिरिक्त संजीदगी के साथ स्वीकारात्मक संकेत में सिर को तेज-तेज कुछ यों हिलाया कि सभी मुस्कुराने लगे, ‘‘ आचार्य, आपने हमें सही पहचाना... हमें आप नहीं पहचानेंगे तो भला कौन पहचानेगा... हम आपके ही सच्‍चे अनुयायी जो ठहरे! ’’ सभी हंसने लगे।
         कोई दर्जन भर मजदूर गंइता-कुदाल और टोकरी लिए आये तो चर्चा पर विराम लग गया। प्रसाद उन्हें साथ समेटे आगे बढ़ गये।
         घर के पूरबी कोने पर नींव खोदने का कार्य शुरू हो गया।
         प्रसाद खड़े होकर कार्य का अवलोकन कर रहे हैं! पीछे से आती आवाज ने उनका ध्यान खींचा। मुड़कर देखा, मुख्तारेआम मुंशी श्‍यामा प्रसाद दनदनाते चले आ रहे हैं, ‘‘ बाउस्साब! ई काऽ... करत हउवाऽ...? ’’
         प्रसाद मुस्कुराये, ‘‘ जो हो रहा है यह तो आप देख ही रहे हैं... ’’
         ‘‘ देख तो रहे हैं किंतु कुछ समझ नहीं पा रहे... ’’
         ‘‘ समझना क्या है इसमें! यह कोई गणित का उलझा हुआ सूत्र तो है नहीं... ’’
         ‘‘ है... गणित का ही तो सूत्र है... इसकी विधिवत् गणना होनी चाहिए...’’
         ‘‘ मैं कुछ समझा नहीं... ’’
         ‘‘ यह तो अब पता चल ही रहा है कि आपका इस ओर ध्यान नहीं गया है अन्यथा निस्संदेह ऐसी भूल आपसे कदापि नहीं होती... ’’
         ‘‘ भूल! कैसी भूल हमसे कहां हो गयी भई ?  ’’
         ‘‘ मैं इस घराने का सम्पत्ति-व्यवस्थापक हूं... सही बात सही समय पर बता देना मेरा दायित्व भी है.. आपने औचक कार्यारम्भ कैसे करा दिया... किसी से मुहूर्त का विचार कराया है?’’
         ‘‘ मैंने तो ऐसा नहीं किया! ’’
         ‘‘ क्यों ? मैं तो इस परिवार का शुभ चाहता हूं इसलिए मेरा यही कहना है कि आपको मुहूर्त का विचार करा ही लेना चाहिए था... ’’
         ‘‘ निःसंदेह आप मेरे घर-परिवार के शुभचिन्तक हैं किंतु स्वयं मैं भी तो ऐसी ही कामना से भरा हुआ हूं... किंतु मैंने ऐसा आवश्‍यक नहीं समझा... मेरा तो कहना है कि यदि जब कार्यारम्भ की परिस्थिति हमारे सामने तैयार हो सकी इसका ताम्पर्य ही यही कि मुहूर्त सही है... दस वर्ष से यही कार्य कैसे लम्बित रहा, यह तो आपको भी पता है! जिस क्षण-विशेष ने दशक भर से उपेक्षित पड़े तराशे हुए पत्थरों में सर्जनात्मक प्रकम्पन भर दिया, वह साधारण नहीं हो सकता! इसे ही तो शुभ मुहूर्त कहा जाना चाहिए...’’
         ‘‘ यह तो एक भिन्‍न बात है... ’’
         ‘‘ आपको आवश्‍यक लगे तो मुहूर्त का विचार कर लीजिये न! मैंने आपको तो रोका नहीं! यह आपका नैतिक अधिकार भी बनता है... ’’
         ‘‘ अब क्या! कार्यारम्भ जब करा ही लिया आपने तो अब मुहूर्त का विचार कराने से क्या लाभ! पानी पी लेने के बाद जात पूछी जाती है! ’’
         ‘‘ जिसे अशुद्ध हो जाने का खतरा हो, वह पूछता रहे! ’’
         ‘‘ बाउस्साब! आप अन्यथा न लें मैं तो सचमुच अब भी मुहूर्त विचार कराने की ही बात सोच रहा हूं... ’’
         ‘‘ आप अवश्‍य विचार करा लें किंतु मैं इसे क्षीण-संकल्प-बल वाली एक हीनवीर्य-जाति का दिमागी भटकाव भर मानता हूं... आप स्वयं सोचकर देखिये न... अयोध्या में महाराजा दशरथ के महल की नींव क्या बगैर गम्भीर ज्योतिशीय गणना-विचार के ही पड़ी होगी ? किंतु उस महल में क्या-क्या अनिष्‍ट नहीं हुआ! कैसा-कैसा कलह... कैसी-कैसी अप्रिय घटनाएं... स्वयं राजकुमार श्रीराम के वनवास का फैसला वहीं हुआ...  और उसी में महाराज दशरथ का कैसा हृदय-विदारक अंत! ...बाद में श्रीराम के राज्याभिशेक के बाद के प्रसंग भी देख लीजिये... भगवान का तनाव ...और सीता जी का निष्‍कासन! उसी तरह, राजा हिरण्यकशिपु  का महल भी न जाने कितने गम्भीर ज्योतिशीय विमर्श के बाद बना होगा किंतु उसी में... बल्कि उसी के एक स्तम्भ के भीतर से निकले भगवान नरसिंह के हाथों उसे अपने प्राण गंवाने पड़े! इसलिए क्या मुहूर्त-विचार और क्या इसका कोई लाभ! ’’


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         मुंशी श्‍यामाप्रसाद वापस लौटे। सुखद आश्‍चर्य और प्रसन्नता से भरे हुए। कार्य-स्थल पर लखरानी देवी और प्रसाद खड़े बतिया रहे हैं। आते ही बोले, ‘‘ बाउस्साब! आपको तो मैं अब मान गया... आपकी आत्मा अवश्‍य ही असाधारण है! आपने अनजाने में भी जो कार्य किया है, वह मानक है! ’’
         ‘‘ हुआ क्या ? ’’ प्रसाद ने चौंककर ताका।
         ‘‘ मैंने तो जाकर अभी-अभी मुहूर्त का विचार कराया... बहुत चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है... कुछ ऐसा कि सचमुच आश्‍चर्यचकित रह गया हूं! ’’
         शिवाले के जगमोहन से उठकर केशव, दास और व्यास आने लगे। कार्य-स्थल की ओर ही बढ़ते हुए। चल रही वार्ता पर कान टिकाये।
        ‘‘ बात तो पूरी बतायें मुंशी जी! किसने क्या बताया? ’’ केशव प्रसाद मिश्र ने टोंका। प्रसाद गम्भीर हो गये। आचार्य शुक्ल भी लगभग जिज्ञासा-विकल। अन्य भी।
         मुंशी का स्वर मुग्धता से भर गया, ‘‘ आपने जिस समय कार्यारम्भ कराया है यही इस वर्ष का सर्वोत्तम गृहारम्भ-मुहूर्त निकला! ’’
         ‘‘ ऐसा! ...लेकिन मैंने तो सचमुच कार्यारम्भ के पहले मुहूर्त विचार कराया ही नहीं ... फिर ऐसा कैसे हो गया? ’’ प्रसाद चकित।
         ‘‘ महाकवि को देखकर मुहूर्त ने ही अपनी राह संवार ली और क्या! ’’ केशव ने निश्‍छल मुस्कान बिखेरी। सभी हंसने लगे।
         गौड़ ने उपस्थिति दर्ज करायी, ‘‘...ऐसा हो सकता है... महाशिवरात्रि का अवसर है...आज तो स्वयं पुण्य हो या मुहूर्त, सबका एक ही लक्ष्य है... जयशंकर से मिलन! ’’
         प्रसाद ने चुटकी ली, ‘‘ आपलोग कहीं कोई खेल तो नहीं कर रहे! ...ऐसा कुछ न प्रचारित हो जाये कि लोग अपने ग्रह-मुहूर्त सुधरवाने के लिए मेरे ही यहां टूटने लग जायें! ऐसे में तो मेरा सारा कार्य-व्यापार ही लड़खड़ा जायेगा! ’’ ठहाका!


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         चौक पर ‘श्री भण्डार’! चौबीस घन्टे चलने वाली प्रसिद्ध मिठाई दुकान । आठ-आठ घन्टे की पाली में गद्दी सम्भालने वाले तीन भाई। विन्देश्‍वरी साव बड़े, रामेश्‍वर साव मंझले और राजेश्‍वर साव सबसे छोटे। हर छोटी-बड़ी बिक्री का लिखित हिसाब लगातार दर्ज करने का नियम। पाली बदलने पर पूरा विवरण अगली पाली के गद्दीदार को सौंपने की पद्धति। बिक्री के विवरण के आधार पर ही दैनिक पूंजी-निवेश और आमदनी का हिसाब। बिना किसी हिल-हुज्जत के आमदनी-भागों का आपस में वितरण हो जाता है। यह सब वर्षों नियमपूर्वक चला। रात की पाली के गद्दीदार रामेश्‍वर। ज्यादातर मिष्‍ठन्न रात में ही बनाये जाते। सुबह से शाम के बीच पूड़ी-कचौड़ी-सब्जी और जलेबी-इमिरती बनते-बिकते रहने का दौर अबाध। आसपास का पूरा इलाका हमेशा ताजा सोंधाई से भरा हुआ। भुनती सब्जी के गरम-मसाले और हींग की सुगन्ध तो हवा को भी मस्त-मगन किये रहती है। तीनों भाइयों में परस्पर प्रेम-विश्‍वास और सन्मति पूरी हलवाई बिरादरी के बीच एक उदाहरण के रूप में पेश। यह सब वर्षों-वर्षों ठीक-ठाक चलता रहा। बीच में एक घटना घटी।
         रात्रि पालि वाले रामेश्‍वर एक दिन दोपहर में दुकान पर आ गये। गद्दी पर बड़े भाई विन्देश्‍वरी विराजमान। ग्राहकों की अच्छी-खासी भीड़। आधा दर्जन सहयोगी सामान पैक करने और इतने ही कर्मी बेंच-कुर्सियों पर बैठे ग्राहकों को आदेशानुसार खाद्य सामग्री देने-पहुंचाने में व्यस्त। रामेश्‍वर ने आते ही बड़े भाई के सामने टेबुल पर मुक्का पटक दिया। सभी अवाक्। उसकी आंखें लाल। लड़खड़ाती आवाज से शराब का भभका, ‘‘ अभी कइसन ग्राहकन के बाढ़ उमड़त हौ! रात में खाली मुर्दफुंकवा साले आते हैं... मुंह लटकवले अउर जेब उलटले... हम तऽ एकदम उल्लू बन के रह गल हई... हमरे जिम्मे तऽ गधा बनके रात भर खाली खटेके रह गल हौ... सब मिठाई हम बनवाई अउर सबेरे से शाम तक तूं दुनो भाई बइठल माल काटाऽ... ’’
         विन्देश्‍वरी देर तक हक्का-बक्का। किंकत्तर्व्यविमूढ़! खुसुर-पुसुर करती ग्राहकों की भीड़ घेरे खड़ी ताकती रही। बाद में उन्होंने अनुज को रोकने और चुप कराने का प्रयास शुरू किया किंतु विफल। वह एकदम अनियंत्रित! आंधी में मचलते पेड़ की तरह।
         कुछ कर्मी काम छोड़कर पास आ गये। रामेश्‍वर को पकड़कर वहां से अलग ले जाने का प्रयास करने लगे, किंतु वह सब को झटक-झटक कर अलग कर देता रहा। ग्राहकों की खुसुर- पुसुर के तेवर बदलने लगे।
औचक आश्‍चर्य-प्रहार, चिन्ता-आघात और अपमान-दंश से विन्देश्‍वरी का मुंह काला! वाणी तो जैसे गले में ही कहीं लुप्त। पूरी देह सुन्न। देर तक पूरी स्थिति इसी तरह बेकाबू।
         खूब झझक लेने के बाद रामेश्‍वर अब मंद पड़ा। उसने अपने सिर को बायें मोड़ा और कान सटाकर टेबुल पर रख दिया। जैसे मीलों दौड़कर आया हो। सुस्ताने लगा!
         विन्देश्‍वरी सामने से खिसकने लगे तो अचानक उसने सिर उठा लिया। फिर जोर-जोर से झझकने लगा, ‘‘ भागत कहां हउवाऽ ? बड़ भाई हउवाऽ... फैसला करके जाऽ... काल्ह से हम राति में इहां ना अगोरब! ...हम अब सबेरे से इहां बइठब... सबेरवें तऽ इहां कचउड़ी-जिलेबी असली बिकलाऽ... हमहुं अब कमाऽब! राति में तूं या चाहे छोटका कोई आके सम्भालल करे...’’
         वह वहीं रुक गये। मुंह से आवाज नहीं निकली। आंखें डबडब भर रहीं। सिर  सहमति में हिलकर रह गया। वह तलमलाता हुआ दुकान से बाहर चला गया। ग्राहकों में से कुछ परिचितों ने पास आकर अपने-अपने हिसाब से टीका-टिप्पणी शुरू की। एक ने कहा, ‘‘...साव जी, ई तऽ बड़ी खराब बात हौ... तोहरो घरे दारू के परवेश हो गल...’’
         दूसरे ने जोड़ा, ‘‘ ई जे गद्दी हौ, ई महादेव जी के स्थान होला... इहां तऽ अइसन आचार -विचार एकदम खतरनाके हौ...’’
         तीसरे ने सलाह दे डाली, ‘‘ साव ई छेदे के तुरंते बंद कराऽ... ना तऽ ई जहाज के डूबे में समय ना लागी... ’’
         एक अन्य ने मुंह पास लाकर आंखें फैलायी, ‘‘...दारू जहां घुस जाले उहां से बिना नाश कइले ना हटे... तूंलोग दुनो भाई मिलके चुपचाप येके अलग कर दाऽ... कउनो मोह में पड़ल रह जइबा तऽ सबके नाश होके रही! ’’
         विन्देश्‍वरी के सिर पर ऐसी तमाम बातें ओलों की तरह पट्-पट् तड़तड़ाती-गिरती रहीं। सहयोगी-कर्मी अपने-अपने काम में जुट गये। बोलने वाले बोलते-समझाते रहे। वह चुपचाप प्रहार सहते रहे। चाहकर भी किसी को रोक पाना भला कहां सम्भव! कुछ देर तक यह सब चला। धीरे-धीरे नये ग्राहकों के आते जाने से सलाह ठोंक रहे पुराने ग्राहक स्वमेव खिसकते चले गये। भीड़ अपनी गति से पूर्ववत् टूटती रही। दुकान की अपनी दिनचर्या अबाध जारी रही।
         विन्देश्‍वरी का माथा चकराता रहा। ग्राहकों से पैसे लेना-देना मुश्किल होने लगा। उन्होंने तुरंत एक कर्मी को बुला लिया। संक्षेप में समझाकर उसे हिसाब जोड़ने और पैसा लेने- फेरने के काम में लगा दिया।
         उनका माथा खोलता रहा, तेल की भरी कड़ाही की तरह। बगल में दीवार से उठंघकर खड़े वह शून्य-भाव से गल्ला-ग्राहक और भीड़ ताकते रहे।
         दोपहर का ताप कम हो चला है। थोड़ी ही देर में राजेश्‍वर ने आकर धीरे से प्रवेश किया। उसने ज्योंही चरण-स्पर्श किया, विन्देश्‍वरी भावुक हो उठे।
         राजेष्वर ने धीमे स्वर में समझाया, ‘‘ भैया, तूं चिन्ता मत कराऽ... रामेश्‍वर भैया के दिमाग गड़बड़ा गल हौ... राति में कोई घर-समाज के आदमी तऽ देखे वाला इहां होला नाऽ... येकरे चलते उनकर मुंहे दारू लग गल हौ... ’’
         ‘‘ तूं ई सब जानत हउवेऽ?... कबसे?... हमके कब्बो बतउले काहे नाऽ? ’’
         ‘‘ अरे, अबहियें रस्ते में हमरो मिल गइलन... एक दिन पहिलहुं हमरे घरे आ गल रहलन सबेरे-सबेरे... देर तक अनाप-शनाप बकत रह गइलन...  तमाशा खड़ा हो गल रहल! ... हम तोहरे काऽ बताईं! ’’
         सामने से आये अम्बिका प्रसाद ने अभिवादन किया, ‘‘ शिव-शिव! ’’
         दोनों भाइयों को उनके अभिवादन-शब्द से जैसे नयी शक्ति का विद्युतमय संस्पर्ष मिल गया हो। दोनों ने जोड़ते हुए हाथ सिर के ऊपर कर लिये, ‘‘ शिव... शिव! शिव-शिव! ’’
         वह आकर सामने कुर्सी पर बैठ गये। कंधे से लटकता झोला टेबुल पर रख दिया, ‘‘ आज दोनों भाइयों को साथ-साथ बहुत गम्भीर मुद्रा में देख रहा हूं... बात क्या है, भाई ? ’’
         ‘‘ क्यों... क्‍या दो भाइयों को साथ-साथ नहीं होना चाहिए ? ’’
         ‘‘ बिल्कुल साथ-साथ ही होना चाहिए... लेकिन हमारे समाज में ऐसा कहां हो पाता है... पढ़-लिख जाने वालों के यहां और बड़े घरों में तो अब ऐसा एकदम नहीं दिख पा रहा... अब तो अक्सर यही देखने को मिल रहा है कि दो भाइयों में आदर-लिहाज का व्यवहार तक वैसा नहीं रहा जो पहले रहता रहा... आजकल तो आपस में ऐसी खारा बाधा प्रवाहित होने लग जा रही कि आश्‍चर्य होता है! ...किसी संगी-साथी के साथ तो खूब निभने लगती है किंतु अपने भाई से सीधे-सामने बैठकर बात तक नहीं हो पा रही... यह गलत है... आपलोगों को भी मैं तो इस तरह पहली बार बतियाते देख रहा हूं... इसलिए खुशी भी हो रही है और कुछ शुभ जिज्ञासा भी... ’’ बोलते हुए उन्होंने झोले से ‘हलवाई वैश्‍य संरक्षक’ की दो प्रतियां निकाल ली। कलम खोली और पत्रिका पर नाम लिखने लगे।
         राजेश्‍वर सप्रयास मुस्कुराये, ‘‘...शुभ जिज्ञासा ? ’’
         ‘‘...हां! क्यों नहीं... अगर आपलोग श्री भण्डार की कोई नयी शाखा खोलने जैसे प्रयास की दिशा में कुछ सोच-बतिया रहे हों तो इससे अच्छी बात भला दूसरी क्या हो सकती है...’’ उन्होंने पत्रिका की प्रति विन्देश्‍वरी को दी। दूसरी पर फिर नाम लिखने लगे।
         ‘‘...आप नयी शाखा की बात कर रहे हैं, यहां तो पूरे पेड़ का अस्तित्व दांव पर लग गया है... आज अचानक मुझे पता चला है कि इस दरख्त की जड़ में तो दीमकों का भीषण हमला हो चुका है... ऐसे में किसी तरह यही सही-सलामत खड़ा रह जाये तो कम नहीं होगा!...’’ विन्देश्‍वरी की आवाज में पीड़ा छलछला आयी।
         अम्बिका प्रसाद की कलम थम गयी। उन्होंने गति के साथ सिर उठा लिया। साश्‍चर्य मुंह फाड़े आंखें फैला दी, ‘‘...आंय! यह क्या कह रहे हैं... ऐसा मजाक में भी न कहिये... ’’
         ‘‘...मजाक तो हमारे साथ वक्त ने कर दिया है शिव-शिव जी! लगता है भरी दुपहरी में सूरज को लपक लेने पर आमादा हो गया है अस्‍ताचल... ’’ विन्देश्‍वरी डबडबा गये।
         चाहकर भी मामले को बांधे न रख सके राजेश्‍वर। भैया को रोकना मुष्किल ही नहीं, असम्भव भी। विन्देश्‍वरी इतने भावाकुल कि विकट बाढ़ की तरह उनकी भावनाएं तमाम तटबन्ध तोड़ उमड़ती रहीं, ‘‘...पता नहीं किसकी नजर लग गयी हमारे परिवार को... बीच वाला भाई दारूबाज निकल गया! ...पतन जब होना होता है तो सबसे पहले बेहोशी शुरू होती है... मैं भी इतना बेहोश रहा कि भाई जब भयानक पियक्कड़ हो चुका तब आज अचानक मुझे यह सब पता चल सका... वह भी तब जब वह लड़खड़ाता हुआ यहां आ धमका... क्या बतायें! भीड़ हमें चारों ओर से घेरे फुसफुसाती रही और वह सबके सामने देर तक मेरी लानत-मलामत करता रहा... ’’
         मुंह खुला का खुला रह गया अम्बिका प्रसाद का। राजेश्‍वर ने जब देखा कि बात पूरी तरह खुल ही गयी तो बे-मन से ही अपनी ओर से जोड़ दिया, ‘‘ यह भी एक गलत संयोग ही रहा कि रात में वे यहां बैठते-सम्भालते रहे... उन पर न किसी परिजन की दृष्टि-निगरानी रही न समाज के किसी जिम्मेदार शख्‍स की... ऐसे में न जाने कब उनका मार्ग खराब हो गया... शराब मुंह लग गयी... वे बहक गये... और एक बार जो बहके सो बहकते-भटकते चले गये... उन्हें मनमानी की खुली छूट मिलती चली गयी... ऐसे में तो यही हो सकता था जो हुआ है...’’
तीनों आते-जाते ग्राहकों का खयाल करते हुए रुक-रुककर धीरे-धीरे बोलते-बतियाते रहे।
         अम्बिका प्रसाद ने सुझाया, ‘‘ खैर, मुझे लगता है समाज के चौधरी के पास यह मामला लेकर आपलोगों को तुरंत पहुंच जाना चाहिए... ’’
          दोनों भाई बहुत ध्यान से उनका मुंह ताकते रहे। वे बोलते चले गये, ‘‘...यह हमारे समाज के लिए सौभाग्य की बात है कि हमारे चौधरी-पद पर एक ऐसा व्यक्तित्व विराजमान है जो देह -हाथ से भी मजबूत है और दिमाग से भी अनूठा... भई, जयशंकर प्रसाद कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं... ’’
         विन्देश्‍वरी ने एक क्षण में सहमति जता दी, ‘‘ बिल्कुल सही! बिल्कुल सही! मैं तो यही कहूंगा, भाई शिव-शिव जी... कि हो सके तो आप अपनी मौजूदगी में मेरी उनसे आज ही भेंट करा दीजिये... हल-निदान चाहे जब निकले, अपनी चिन्ता तो मैं उनके सिर पर रख ही दूं...’’
         अम्बिका प्रसाद ने समझाया, ‘‘...चिंता न करें! आपकी उनसे भेंट मैं अपनी ही उपस्थिति में करा दूंगा... लेकिन आज अब छोड़िये... यह कार्यक्रम कल पर रखिये... हालांकि अब तक तो वे यहीं नारियल बाजार में आकर जम चुके होंगे किंतु अभी उनके आसपास साहित्यकारों का जमघट होगा... वे लोग अपने ही में मगन रहने वाले प्राणी होते हैं... जातिगत समाज का मामला वहां सबके सामने पेश करना सम्मानजनक भी नहीं होगा... स्वयं उन्हें भी अभी यह सब अच्छा नहीं लगेगा ’’


7 टिप्पणियाँ:

  1. Rangnath SinghJul 15, 2011 11:26 AM
    आपके इस उपन्यास को पहली फुर्सत में पढना है. इस तरह फुटकल चखने से काम नहीं चलेगा. अगले महीने के आखिर तक कुछ अतिरिक्त समय मिलने लगेगा. तब इसे पढ़ना होगा. और कोशिश रहेगी की इस पर कुछ लिखा भी जाए.
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  2. TRIPATHIJIJul 15, 2011 06:52 PM
    humne ise copy kar liya hai padh kar hum apni raye denge
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  3. ‘‘...हम येकरा पर हां ना करब! शुभ-अशुभ के सब विवाद भ्रामक हौ... अइसन कोई अशुभ ना हौ जेमें शुभ के बीज ना होवे... ओसहीं हर शुभ के भीतरे अशुभ के बीज होले... जन्म में ही मृत्यु के प्रतीक्षा-बीज पड़ल होला... हर मृत्यु के समानांतर कहीं न कहीं नया जीवन के संकेत मिलत रहला... येसे हमके जगहा के तिकोन और चौकोर वाला संदेह या विवाद उचित ना लगत हौ..


    बहुत सुंदर..पढकर रेणु की याद आ गयी
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  4. DR NIRANJAN KUMAR SINGHJul 16, 2011 08:45 PM
    apki lekhan shaili saras aur prabhavshali hai.
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  5. lalit shankarDec 16, 2011 06:13 PM
    देर से आपके blog पर आने का अफ़सोस,
    बहुत सुन्दर, पठनीय, रोचक
    प्रत्‍युत्तर दें

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