रविवार, 15 जनवरी 2012

खबरिया चैनलों का सही चेहरा


अजय नाथ झा
अजय नाथ झा
मैने अंग्रेजी पत्रकारिता में सन 1983 में कदम रखा जब जेएनयू में पीएचडी कर रहा था। वहीं से अखबारों तथा ‘मेन स्ट्रीम’ तथा ‘इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल’ वीकली में लिखना शुरू किया और आगे का रास्ता आसान होना शुरू होता गया। तब से लेकर मैं अंग्रेजी की पत्रकारिता में लिप्त होता गया और उसी भाषा में हंसने रोने से लेकर रेंकने-भोंकने तक की बारीकियां सीखने लगा। मगर वहां अपने एक साथी डॉ कुमार नरेंद्र सिंह की बात हमेशा सालती रही ‘अंग्रेजी के आसमान में चाहे जितना उड़ो मगर हिन्दी की जमीन कभी मत छोड़ना’। सन 2007 की फरवरी में पहली बार एक वाक्या ने मेरी संजीदगी की रीढ़ पर वज्र प्रहार किया और मैं हिंदी के हिंडोले में आ गिरा। हंस नामक नामचीन पत्रिका में जनवरी 2007 में एक विशेषांक छपा जो अचानक कहीं से हाथ लगा और उसको पढ़ने के बाद फौरन उसकी समीक्षा करने की ललक जाग उठी। सोचा, शायद इसी बहाने हिंदी में लिखने की आदत लग जाए। मैंने उस पत्रिका में छपे लेखों के संकलन पर एक समीक्षा लिख मारी। और उसकी एक प्रति हंस पत्रिका के संपादक के दफ्तर में छोड़ आया। कई वरिष्ठ पत्रकारों के मुंह से सुन रखा था कि हंस के संपादक सही मायने में सरस्वती पुत्र हैं और वो सच छापने से कभी नहीं डरते। मगर मैं सच का इंतजार करता ही रहा....
खैर, एक दो और नामचीन अखबरों के संपादकों को भी मैंने इसकी प्रति प्रकाशन के लिए भेजी। कुछ का जवाब नहीं आया, पर एक दो संपादकों ने वापस फोन कर के कहा, ‘बन्धुवर आपकी समीक्षा कमाल की है पर छपने योग्य नहीं। मैं इसे छापकर उन लोगों से बैर मोल नहीं ले सकता। आखिर उनके चैनलों में भी तो जाना पड़ता है’।
मैं हैरान था कि इस समीक्षा के अंदर कौन सा बम या विस्फोटक था जो इतना खतरनाक हो गया। मेरे विचार में या सोचने के तरीके में मतभेद हो सकता है मगर पत्रकार विरादरी में किसी से कोई झगड़ा या दुश्मनी तो है ही नहीं। फिर क्या बात हो गई? क्या समीक्षा लिखना इतना बड़ा संगीन अपराध हो गया?
फिर एनडीटीवी में ही एक साथी ने राय दी कि ये जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी जी को भेज दो। मगर एक हफ्ते के बाद उनका फोन आया- ‘महराज ये क्या किया है आपने? इसे पढ़कर आगे आपको नौकरी कौन देगा? अपने पांव पर क्यों कुल्हाड़ी मार रहे हो भाई?’ फिर मन खराब हो गया और मैंने ठान लिया कि हिंदी में दोबारा कुछ नहीं लिखूंगा। दो दिन पहले अचानक उसकी पांडुलिपी कमरे में पड़े कागज के ढेर में नज़र आई।
फिर मैंने सोचा कि इसके पहले ये किसी कबाड़ी के यहां या किसी परचून की दूकान पर ‘ढोंगा’ के तौर पर अपनी इज्जत नीलाम करे, इसको अपने ब्लॉग पर ‘जस की तस’ डाल देना ही श्रेयकर है। कम से कम पत्रकारों की इस पीढ़ी में तो इस पर निगाह डालेगा और इसे ‘हस्ताक्षर’ नहीं तो ‘हाशिय़े’ का एक कोना तो मानेगा। वो समीक्षा यूं है...

एक अप्रकाशित समीक्षा- खबरिया चैनलों की कहानी

-हंस पत्रिका का जनवरी-2007 का अंक पढने में अच्छा लगा। राजेंद्र यादव बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसे विषय पर खट्टी-मीठी, तीखी-फीकी-हर किस्म के व्यंजन एक साथ परोसने की हिम्मत जुटाई।
-इसमें कोई दो राय नहीं कि श्री यादव ने अपने संपादकीय के माध्यम से कई ज्वलंत प्रश्न अपने पाठकों के समक्ष रखें हैं, मगर उनकी लेखनी में कहीं न कहीं प्रसार भारती से निकाल दिए जाने का दर्द और नौकरशाही के साथ धींगामुश्ती में बहुत कुछ न कर पाने की टीस भी साफ दिखाई दे जाती है।
-श्री यादव और उनकी संपादकीय टीम ने बहुत ही सशक्त ढंग से विभिन्न चैनलों द्वारा कितना बडा चमत्कार या चुतियापा` परोसने के रिवाज पर बज्र प्रहार तो किया, लेकिन वह समाजिक शिक्षा व जागरुकता के लिए कोई प्रभावशाली औजार या विकल्प परिभाषित नहीं कर पाए। अगर उनके जैसा अनुभवी और प्रखर साहित्यकार इस दिशा में संजीदगी से सोचने में डरता है, तो शायद यह हिन्दी पत्रकारिता के लिए बुरे दिनों का आगाज है।
-ऐसा कहा जाता है कि जब घर के बडे-बुजुर्ग चले जाएं, तो घर की मिठास कम हो जाती है। अगर आज के टीवी चैनलों को मानव जीवन के प्रति क्रूरता की अद्भुत प्रयोगशालाएं बना दिया गया है... अगर आजकल के बहुतेक पत्रकार आडंबर और दिमागी दिवालियापन के चलते-फिरते इस्तहार या फिर...पत्र के आडे-तिरछे आकार बनकर रह गए हैं, तो इस अधोपतन के लिए श्री यादव जैसे महामहिम भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं क्योंकि वह अगर नई पीढी का सही मार्गदर्शन कर पाते तो षायद आज के अखबारों व टीवी चैनलों में प्रयोग किए जा रहे है शब्द समूहों के साथ हिन्दी भाषा का सामूहिक बलात्कार देखने की त्रासदी नहीं झेलनी पड़ती।
-सनसनी जैसी खबरें `हर कीमत पर` जैसे तकियाकलाम ने भाषा तथा शब्दों एवं मुहावरों के प्रयोग ने हिन्दी भाषा... हमारी सुरुचि, संस्कार तथा सोच...इन सभी पर कुठाराघात किया है और वह आज भी बदस्तूर जारी है।
-इस संदर्भ में इस पत्रिका के तकियाकलाम ` खबरिया चैनलों की कहानियां` पर भी प्रश्नचिह्न लगाने के लिए मजबूर होना पडता है। अमूमन खबरिया शब्द नकारात्मक दिशा की ओर संकेत करता है। मानो एक खबरिया `कोई मुखबिर हो और किसी साम्राज्य के बारे में किसी अनिष्ठ की आशंका की तरफ इशारा कर रहा हो`। खबरें हमेशा नकारात्मक व अफसोसनाक नहीं होती हैं।... खबरें हमेशा अनारा गुप्ता का बलात्कार या बुढिया की गुडिया ही नहीं...वह सानिया मिर्जा की शानदार जीत और प्रीति जिंटा का पुरस्कार भी हो सकती हैं।
-कहानी संग्रह में विजय विद्रोही की `प्रेत पत्रकारिता` उनकी आपबीती जैसी ही लगी। उनके जैसे दबंग पत्रकार का शब्दों के माध्यम से यह गुहार शायद आने वाली पीढी के लिए एक चेतावनी साबित हो। मगर प्रेत पत्रकारिता की परिपाटी को बढावा देने की बजाए एक स्वाभिमानी पत्रकार को उसे लात मारकर बाहर आने का हौसला रखना चाहिए।
-राणा यशवंत की `ब्रेकिंग न्यूज` हर न्यूज चैनल की धमनियों में बहते हुए खून की गरमी का बैरोमीटर है। साथ ही अपने आप को मान-मंडित करने की नई तरकीब भी है।
-राकेश कायस्थ नई पीढी के खबरिया पत्रकारिता के आयामों को चित्रित करने की कोशिश में न्यूज रूम की नौंटकी में खो जाते हैं। वैसे जो बात वह कहना चाहते हैं, वह काफी कडवी है, मगर शायद वह अंततः यह नहीं तय कर पाते कि पहले मुर्गी का जिक्र करें या अंडे का।
-संगीता तिवारी का `खेल` न्यूज रूम के ठेकेदारों द्वारा उठाना-गिराना और नए-नए बॉस की करतूतों का पर्दाफाश करती है। साथ ही एक लडकी की त्रासदियों का सजीव और मर्मस्पर्षी चित्रण भी है।
-रवीश कुमार का अंदाजेबयां कुछ और ही है। कई महिला पत्रकारों के बारे में उनके मर्द साथियों द्वारा दिमागी मैथून की प्रवृति पर करारी चोट की है दीवार फांदते स्पाइडरमैन ने। ‘मिस टकटक’ का किरदार प्रायः कुकुरमुत्ते की तरह हर चैनल में पाया जाता है। यह अलग बात है कि कई बार ‘मिस टकटक’ न्यूज रूम की चौपड में द्रौपदी की तरह बिछ या बिछा दी जाती हैं तो कई बार वह अपने बॉस के प्रकोष्ठ से सत्ता के गलियारे तक शोले की धन्नो की तरह हिनहिनाते दिखाई दे जाती हैं।
-क़मर वहीद नकवी अपने लेख में पत्रकार की नहीं, बल्कि एक उद्योगपति की भाषा बोलते दिखाई देते हैं। `बकवास दिखाना उनकी मजबूरी है` और यही उनके चैनल का सरमाया है।मगर सच्चाई यह भी है कि आज का दर्शक किसी चैनल को पांच मिनट या दस मिनट से ज्यादा नहीं झेल पाता है। अगर नकवी साहब यह समझते हैं कि उनका चैनल ही समाज का सही और सच्चा आइना है तो उनको यह भी याद रखना चाहिए कि आइने में भी बाल उगने में देर नहीं लगती।
-राजदीप सरदसाई का लेख `हम पागल हो गए हैं` शायद बहुत हद तक सच है। बहुत कम पत्रकार ही अपनी मूर्खता पर हंसने की हिम्मत करते हैं। यह सच है कि `कैमरा अब हजारों लोगों की आवाज व चेहरा बनता जा रहा है`। मगर पहले कैमरे के पीछे `एजेंडा के साथ खडे लोगों की नीयत का क्या करें?` कालिख लगे हाथों में दस्ताने पहनकर पत्रकारिता की शालीनता और मानवाधिकारों का मापदंड तय करने की बात Bवैचारिक दीवालियापन ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक बड़ बोलापन निशानी है।
-उदय शंकर अपनी बात हमेशा `ओशो-रजनीश-` के अंदाज में ही करते हैं और `आमने-सामने` में भी उन्होंने यही रुख बरकरार रखा है। क्रियटिविटी के दोमुंहेपन से उन्हें गुरेज़ है और वह इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा? आजकल के दौर में ` कुछ ही समय के लिए क्यों न हो, मगर ऐसी सोच काम कर जाती है।
-इन सब के बीच दिवांग ने अपने लेख में शब्दों की शालीनता बरकरार रखी है और उनका रामबाण हमेशा `दर्शकों का भरोसा है।` उनके अनुसार टीवी चैनलों की अंगडाई अब तक अपने शबाब पर नहीं आ पाई है और आने वाले दिनों में अपनी हद खुद ढूंढ लेगी`। यह एक आदर्शवादी और रोमानी सोच है। मगर पत्रकारिता की नंगी हकीकत अक्सर बदनुमा और भयानक दिखाई देती रही है।
-शाजीजमां ने अपने लेख में `फास्ट फारवर्ड` में चलती जिंदगी के कुछ खुरदुरे तथा संकरे पहलुओं को बेबाकी से छुआ है तो प्रियदर्शन ने टीवी चैनलों में एंकर की सोच तथा ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा से लवरेज न्यूज रूम में सफलता की कुंजी और ताला खोजने और खोलने के महामंत्र पर अच्छा व्यंग्य किया है। प्रियदर्शन की लेखनी में ओज है।
-`बम विस्फोट` नामक लेख में संजीव पालीवाल ने शायद अपने कार्यस्थल की नंगी सच्चाई का बखान कर डाला है। मगर किसी भी पाठक को उनकी भाषा पर ऐतराज हो सकता है। पता नहीं, आज से कुछ साल बाद इस लेख को पढकर लोग किसका ज्यादा आंकलन कर पाएंगे-घटना विशेष का या फिर लेखक का? क्योंकि कोई भी छपा दस्तावेज कभी-कभार बम से ज्यादा विस्फोटकारी हो जाता है।
-दीपक चौबे ने `काटो काटो काटो` नामक लेख में बडे ही इंकलाबी अंदाज में न्यूज रूम में `काटना` शब्द की महत्ता और उपयोगिता का पर्दाफाश किया है। काटना न्यूज रूम के कामकाज का एक अहम हिस्सा है, जिसमें बात काटने से लेकर एक-दूसरे की जड काटने तक की कवायद शामिल होती है। चैनल के एसाइनमेंट डेस्क में हरकारा `नागर` एक ऐसा किरदार है जो अपने ध्रुतराष्ट्र के लिए घटोत्कच से लेकर भीम तक भी भूमिका निभाने का स्वांग रचने में शुक्राचार्य को भी मात दे सकता है।
पत्रकार यानी...दोधारी तलवार...चौतरफा वार...एक तीर-तेरह शिकार...। चौबे ने पत्रकारों की ऐसी नई परिभाषा देकर जैसे अपनी बिरादरी का सरेआम पोल खोल दिया।
दूसरी तरफ उन्होंने चोली और दामन का साथ यह कहते हुए निरस्त कर दिया ` चोली कसती है, तंग होती है, भीगती है, उतरती है, कुछ छुपाती है तो कुछ दिखाती है। दामन तो सिर्फ पकडा या छोडा जा सकता है। चोलियां मांगी जाती है, दी जाती हैं, डिजाइनर होती हैं और धरती की तरह रंगीन भी, जबकि दामन में सिर्फ आसमान सा नीलापन व सूनापन है।
चोली-दामन के बीच का फासला सिक्योरिटी की कसौटी पर समझाते हुए दीपक चौबे का तर्क है कि ` फैशन के तूफान में दामन-दुपट्टे उडते जा रहे हैं, पर चोली कम होगी तो टॉप बनेगी और क्या...यही न कि साइज की गारंटी नहीं, मगर टॉपलेस होने तक फ्यूचर तो सेफ है।...
चौबे का अंदाजेबयां कि `काटना सबके बस की बात नहीं...चाहे राखी सावंत लाइव ही क्यों न मिल रही हो।` न्यूज रूम का सबसे बडा और अकाट्य सत्य है। इतने ज्वलंत तथा मर्मस्पर्शी चित्रण के लिए वह बधाई के पात्र हैं।
...अगर `स्याह-सफेद` में शालिनी जोशी ने बडी ही शालीनता से टेलीविजन पत्रकारिता से जुडी महिलाओं की मानसिक स्थिति, डर तथा सामाजिक शंकाओं का चित्रण किया है तो अलका सक्सेना `आधी जमीन` महिला पत्रकारों का अब तक नहीं दिए जाने से परेशान और हैरान हैं। उनकी राय में महिलाओं को भी उनकी सही उपयोगिता को आंकने तथा उनकी भूमिका के सही चयन के पहले पत्रकारिता के कुछ सालों तक उबड-खाबड रास्तों की खाक छानकर तपने का सुझाव तो बडा ही अच्छा और आदर्शवादी है। मगर सच्चाई यह है कि नई उमर की नई फसल सब कुछ चुटकी बजाकर ही पा लेना चाहती है और ऐसे में वरिष्ठ पत्रकारों का गुरुमंत्र बीच सडक पर पडे गोबर का ढेर बनकर रह जाता है।
...`तमाशा मेरे आगे` स्तंभ में वर्तिका नंदा से लेकर श्वेता सिंह, ऋचा अनिरुद्व, शाजिया इल्मी तथा रुपाली तिवारी ने अपने काबिलियत की कील ठोंकने की भरपूर कोशिश की है। वर्तिका जहां `औरतें करती हैं मर्दें का शोशण` की बात करती है, वहीं औरतों के लिए मर्द बॉस का हमेशा दोधारी तलवार घुमाने की आदत ऋचा अनिरुद्व के लिए आलोचना व खीज का सबब है।
खासकर शाजिया इल्मी द्वारा `शक्ल और अक्ल के बीच` छिडी जंग में इल्म की दुहाई पढने में भले ही अच्छा लगे, मगर वह भी जानती हैं कि धुआं वहीं उठता है, जहां आग जलती है। वैसे भी ...
...उम्र की अक्ल से निस्बत हो, ये जरुरी नहीं
इतने घने बाल तो धूप में भी पक सकते हैं।
...अजीत अंजुम फ्राइडे नामक लेख में शब्दों के चयन तथा मुहावरों के इस्तेमाल में शालीनता बरतने के आदी कहीं से भी दिखाई नहीं देते। चैनल के बॉस को नर-पिशाच के रंग में रंगने तथा टीआरपी को इस सदी की सबसे बडी `संयोगिता` की संज्ञा देने से लेकर अपने-आप का मानमंडित करने और बौद्विक आतंकवाद फैलाने के प्रयास में वह खुद ही `मूतो कम-मगर चीखो और हिलाओ ज्यादा` परंपरा और संस्कृति के ध्वजवाहक बने दिखाई देते हैं।
ग्यारह पेज लंबी उनकी कहानी का सरमाया यह है कि `तुम एक ऐसे ढोल की तरह हो, जिस पर हर समय बॉस की थाप पडती रहेगी। बजना तुम्हारी मजबूरी है और बजाना उसकी...`
खबरों को पकाना, सेकना, तानना और बेचना...यह जैसे कई टेलीविजन पत्रकारिता के कीचक से लेकर कर्ण तक के महारथियों की पहचान है। वह भी इसी संस्थान की देन है। जहां का महामंत्र `सबसे तेज` होना है, चाहे वह `अश्त्थामा हतः-नरो वा कुजरो वा...क्यों न हो।
और वैसे भी बबूल के पेड से आम की अपेक्षा बेवकूफ ही कर सकता है।
...राजेश बादल का `उसका लौटना` उनकी अपनी कहानी जैसी दिखाई देती है। किसी चैनल में लंबा समय बिताने के बाद जब वह आदमी मुडकर पीछे देखता है और जब उसके साथ किए गए विश्वासघात का उसे बोध होता है तो वह स्थिति बडी अजीबोगरीब होती है। बादल द्वारा मारुति का चित्रण जिंदगी के किसी मोड पर लगभग हर पत्रकार के सामने आता है और वह सोचने के लिए मजबूर हो जाता है कि एक अदद नौकरी के लिए उसने क्या-क्या खोया।
घटिया पत्रकारिता, ओछी राजनीति तथा थोथी दलीलों के साथ मूल्य, सिद्वांत और नैतिकता की लडाई लडता हुआ हर संवेदनशील पत्रकार अपने आप को कभी-कभार अकेला भले ही महसूस करने लगे, मगर अंततः जीत सच की होती है। राजेश बादल का लेख दिल को छू जाता है और इसी बात को इंगित करता है कि-
मनसब तो हमें मिल सकते थे, लेकिन शर्त हुजूरी थी।
यह शर्त हमें मंजूर नहीं, बस इतनी ही मजबूरी थी।।
...मुकेश कुमार की कहानी भी कुछ हद तक उनकी अपनी जिंदगी की किताब के पन्ने की तरह दिख जाती है। `मिशन से प्रोफेशन से कमीशन तक` पत्रकारिता के नए युग में अक्सर ही विवेकशील संपादक ही `टारगेट` बनते हैं और उसमें कई प्रबंध रिपोर्टरों का भी बडा रोल होता है।
राजेश बादल तथा मुकेश कुमार की कहानियों के किरदार न्यूज चैनल के मालिकों की सामंती सोच और आतताई व्यवहार के खिलाफ कुनमुनाते इंकलाब को रेखांकित तो करते हैं, मगर उससे लडने का सही विकल्प नहीं तलाश पाते।... यह इंकलाब जाडे की सुबह नंगी पीठ पर खिंचती बेंत की तरह तल्ख है, जो शाम होते-होते दाल-रोटी के जुगाड में अपनी पीडा भूलकर पेट की दहकती आग की ज्वाला में दफन हो जाती है।...इस इंकलाब की गुहार उस गडरिए की बीन की तरह है, जो अपनी तान से भेडों को एक साथ इकट्ठा तो कर लेती है, मगर चारागाहों की मल्कियत का बदलने का लावा नहीं खोल पाती है।
...प्रमिला दीक्षित ने `एक-दूजे के लिए` के माध्यम से टीवी चैनल द्वारा जिंदगी और मौत के खेल को भी नाटकीय ढंग से एक खबर की तरह इस्तेमाल करने के रिवाज पर चोट किया है।
...अविनाश दास की `गुरुदेव` न्यूज रुम के उस विशेष किरदार का चित्रण है जो मोहल्ले की मिट्टी के महानगर तक पहुंचते हुए कई हकीकतों का साक्षात्कार करता हैं और आखिर में सांप-छछूंदर के बीच कुछ और ही बनकर रह जाता है। हैरानी यह है कि इतिहास में जीने के आदी और खबरों के महासागर के बीच में थोथे आदर्श तथा चोचलों के दर्शन की पतवार पकड कर सब की नैय्या पार करने का सपना देखने वाले ऐसे कृपाचार्यों की पूंछ आज भी घटी नहीं है। गुरुदेव जैसे किरदार चोंचलिस्ट प्रथा की सबसे ऊंची कूद लगाने वाले मेढक हैं जो पलक झपकते ही सांमती कोट की जेब में कूद कर पहुंच जाते हैं और वहीं से पूरी दुनिया की चौहद्दी मांपने लगते हैं।
...अमिताभ ने `होता है शबे-रोज तमाशा मेरे आगे` शीर्षक कहानी के जरिए अपने कार्यस्थली के कर्णधारों और धुंधरों की भिनभिनाती सोच का भांडाफोड किया है। जो खबर जैसी चीज को `खेल` तथा संजीदगी व सच्चाई को बाजीचा-ए-अत्फाल और करोडों का कारोबार समझते हैं। अमिताभ का अंदाजेबयां कि `दोस्ती नहीं, स्ट्रेटजिक पार्टनर ढूंढते हैं लोग। मर्द हो या औरत, तफरी भी इसी स्ट्रेटजी के तहत होती है।` न्यूज रूम व चैनलों की संस्कृति का असली चेहरा है। यह कितना कटु क्यों न हो, परंतु बहुत हद तक सच है।
...`चालाक और हमलावर मीडिया` में रामशरण जोशी के संकेत को संजीदगी से लेने की आवश्यकता है। बाजारवाद मीडिया पर पहले ही हावी हो चुका है और अगर कहीं मीडिया की मादकता और स्वतंत्रता की हद तय नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं, जब मीडिया खुद ही भस्मासुर का रुप अख्तियार कर ले।
...आनंद प्रधान का आलेख `मीडिया की वर्तमान छवि` न्यास तथा नए प्रयोगों का सारगर्भित दस्तावेज है।
...पंचायतनामा स्तंभ में समाज व बाजार के बीच समाचार शीर्षक लेख में पुष्पेद्र पाल सिंह ने आशुतोष के दृष्टिकोण से परिचय कराया है जिसे कई नवोदित पत्रकार सफलता का मूल मंत्र मानने लगे हैं। `हम करे तो सरकारी और तुम करो तो गद्दारी` जैसी बीमारी से ग्रसित कई के पत्रकारों की सोच व्यक्तिगत व्यवहार की नैतिकता और व्यवसाय की विभीषिका के बीच `मृगमारिचिका` बनकर रह जाती है।
अर्वाचीन पीढी को पुर्न मूषिको भवः की शिक्षा देने वाले तथा अपने आप को इस विधा में अरस्तु मानने वाले पत्रकारों की विडंबना यह है कि न तो वह कौवा बन पाते हैं और न ही हंस। खोजी पत्रकारिता का दंष उन्हें लोकप्रियता की यमुना में एक हद तक प्रवाहित तो कर देता है मगर उसके बाद भ्रमक ग्रथियों के महाकुंभ में समाह्ति भी हो जाते हैं।
...कितने मरे शीर्षक कहानी में विनोद कापडी ने न्यूज से जुडे एक महत्वपूर्ण- मगर टीवी पर्दें पर कभी नहीं दिखने वाला ओबी ड्राइवर भगवान सिंह के किरदार को बखूबी जिया है। खबरखोरी की होड में भगवानसिंह जैसे किरदार अक्सर मारे जाते हैं और उसके बाद उसके नाम पर `शीतल` जैसे चहेते फनकार एक सेकेंड तक खर्च करना भी गंवारा नहीं समझते...। चैनल के लिए अपनी जान पर खेल कर रातदिन ओबी भगाने वाले भगवान सिंह की मौके पर मौत होने के बाद भी...यह खबर भी दूसरी खबरों की तरह एक कान से जाकर दूसरे कान से बाहर निकल आती है।
हैरानी की बात यह है कि भगवान सिंह की मौत को चैनल में दस सेकेंड के लिए भी स्क्राल तक में भी जगह नहीं मिल पाती। खबरों के खेल की यही सबसे बडी विडंबना है कि जब तक जिन्दा रहे...कोल्हू के बैल की तरह चलते रहे और जब मौत हो गई...तो उस पर रोने वाला एक कुत्ता भी नहीं...क्योंकि घर की मुरगी हमेशा दाल बराबर ही रह जाती है। मानवीय संवेदना के भौंडेपन की यह सबसे भद्दी मिसाल है।
...वीरेंद्र मिश्र प्रसार भारती की हयां से बेहयाई तक के सफर का आइनादार रहे हैं। डीडी न्यूज की रामकहानी में उन्होंने मंडी हाउस की महाभारत के महारथियों के चेहरे से नकाब हटाने का प्रयास तो किया है, मगर बीच में जाकर उन्होंने दरवाजे का एक किवाड जैसे बंद कर दिया है। लिहाजा पाठक आधे-अधूरे वाक्यातों और दस्तावेजों से ही रूबरू हो पाता है। मगर जितना भी उन्होंने लिखा, वह इस बात का संकेत है कि समाज या देश का आइना दिखाने वालों के लिए उसी आइने में अपनी शक्ल खुद देखने का वक्त आ गया है। प्रसार भारती शायद अपनी पुरानी पहचान इस लिए कायम नहीं कर सकेगा क्योंकि-
साहिल पर जो आब गजीदा थे सबके सब
दरिया का रुख बदला तो तैराक हो गए ।
...ट्रैक शॉट में संजय नंदन तथा सिंडीकेट में प्रभात शुंगलू ने उन्ही किरदारों और उनकी खास अदाओं का जिक्र किया है, जिनके बिना न्यूज रुम की रामायण अक्सर अधूरी लगती है। लल्लोचपो की लंका में सुरसा तथा लंकिनी जैसे किरदार रिपोर्टिंग व एंकरिंग की चकाचौध में कुछ समय के लिए भले ही रंभा और मोहिनी की तरह जी लें, मगर उसके बाद उनकी स्थिति किसी विधवा की मांग की तरह सीधी व सफेद हो जाती है, जिसका कोई वजूद नहीं बचा रह पाता है।
...नीरेंद्र नागर, रवि पराशर, पम्मी बर्धवाल, रवींद्र त्रिपाठी, गोविंद पंत राजू तथा देवप्रकाश ने अपनी दुनिया से जुडी कुछ किरदारों की कारस्तानी को लफ्जों का लबादा ओढाकर उन्हें जीवंत करने की कोशिश की है। मगर सुधीर सुधाकर की विस्फोटक, पंकज श्रीवास्तव की दिव्या मेरी जान और इकबाल रिजवी के मैनेजर जावेद हसन में जिक्र किए गए किरदारों को खुली आंखों से देखा और समझा भी जा सकता है। ऐसे पात्र अक्सर चैनल के दफ्तर के किनारे पर चाय वाले की दुकान के सामने दोपहर से शाम तक, `आकांक्षा से मीमांसा` तक का फासला मिनटों में तय करते दिखाई दे जाते हैं।
...पूरी पत्रिका पढ जाने के बाद दिल में खुशी नहीं होती, बल्कि उसका स्थान क्षोभ ले लेता है और इस पेशे के बारे में आत्म-विवेचना पर मजबूर हो जाता है।
हादसा, हत्या, बलात्कार, विभीषका जैसी खबरों पर अट्टाहास कर खेलने वाले समाज के इन ठेकेदारों की विकृत सोच तथा हमलावर की मानसिकता पर सवालिया निशान लगना अभी से शुरु हो गया है। वह दिन दूर नहीं जब माइक्रोफोन और कैमरा लिए समाचार के सिपहसालारों की हर गली-नुक्कड पर पिटाई होने लगे क्योंकि उनके लिए यह जानना महत्वपूर्ण नहीं होगा कि एक जवान लडकी के साथ सामूहिक बलात्कार किए जाने के बाद उसके बाप की मानसिक स्थिति क्या होगी, बल्कि वह यह जानना और रिकार्ड करना चाहेंगे कि उसके बाप की `बॉडी लैग्वेंज` क्या है।
...वाह रे खबरिया चैनलों की न्यूज रूम की महाभारत,...वाह रे सामाजिक संवेदना और मानव मूल्यों के परिसीमनकर्ताओं की फौज...एक तो चोरी, उस पर से सीनाजोरी...न्यूज चैनलों की महाभारत के महापात्रों की दलील निहायत बेहूदी और बचकानी है कि हम वही दिखाते है जो जनता देखना चाहती है... अगर ऐसा होता तो फिल्म तथा समाचार में कोई फर्क ही नहीं रह जाता और लोग नौंटकियों को ही जिंदगी की नंगी सच्चाई समझकर संतोष कर लेते।
सच्चाई यह है कि टीआरपी का हौआ खडा करने वाले और `जनता जो चाहे उसे दिखाने वाले` न्यूज चैनल के अधिकारियों की सकारात्मक सोच लगभग मरती जा रही है। वह अपना दायित्व ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन भी खोते जा रहे हैं। तभी तो प्राइम टाइम में `सांप से शादी, एक और झांसी की रानी तथा काल कपाल महाकाल जैसी उलजलूल क्रार्यक्रमों को क्विंटल भर नमक-मिर्च के साथ दिखाया जा रहा है।
न्यूज रुम की महाभारत के यह पात्र शायद इस बात का अहसास नहीं कर पा रहे कि जनता के साथ वह कितना बडा विश्वासघात कर रहे हैं। अगर यह तर्क है कि जनता वही देखना चाहती है जो हम दिखाना चाहते हैं तो फिर जेसिका, प्रियदर्शिनी मट्टू, मधुमिता शुक्ला, जाहिरा शेख सहित कई अन्य विषयों पर टीआरपी आसमान क्यों छूने लगता है?
मध्यमवर्गीय परिवार बिन ड्राइवर की गाडी जैसे कार्यक्रम देखने के लिए मजबूर इसलिए होता है क्योंकि उसके समक्ष विकल्प ही नहीं होते। अब देखना यह है कि कैस लागू होने के बाद चैनल प्रमुख और संपादकों की फौज ढोल पीटना बंद करेगा या ढोल की तरह खुद पिटेगा?
वातानुकूलित कमरों में बैठे हुए यह सरस्वतीपुत्र किस आधार कह सकते हैं कि आज की जनता जागरुक नहीं है और सच नहीं देखना चाहती। अगर ऐसा होता तो बीबीसी देखना कबका बंद कर दिए होते या लोग हिन्दू अखबार का प्रयोग चूल्हा जलाने के लिए करते। सच्चाई यह है कि मौलिकता और खबरों की संजीदगी की दुनिया में यह दो उदाहरण आज भी ध्रुवतारा के समान हैं। गुजरात दंगों को देखने के बाद भी नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में नहीं होती। संजय जोशी की सीडी ने उनका राजनीतिक भविष्य समाप्त कर दिया होता, जो नहीं हुआ। इस कडी में निठारी कांड का सच सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
टेलीविजन न्यूज के ठेकेदार और सरमाएदार शायद खून, हत्या, बलात्कार दिखाकर अपनी पीठ जरुर थपथपाते हैं, मगर वह यह नहीं जानते कि इस खेल का शिकार उनकी अपनी औलाद भी हो सकती है। क्या पता कल वह दिन भी आ सकता है, जब किसी टेलीविजन न्यूज संपादक या रिपोर्टर का बच्चा अपने स्कूल बस्ते में कलम-किताब की बजाए चाकू-छूरी ले जाता हुआ दिखाई दे और उन्हीं घटनाओं की पुनरावृत्ति करता पाया जाए जो उसने अपने बाप के टेलीविजन चैनल में देखा और सीखा था।
शायद यही वजह है कि आज भी छोटे कस्बों में रहने वाले दर्शक डीडी न्यूज पर `जायका, मेरे देश की धरती और अहसास` जैसे कार्यक्रम देखना पसंद करते हैं। इन कार्यक्रमों का प्रोडक्शन स्तर भले ही कितना खराब क्यों न हो, मगर कार्यक्रम पेश करने वाले की नीयत पर तो शक नहीं किया जा सकता।
एक और बात...वह यह है कि टीआरपी का खेल खेलने वाले वह कौन से बुद्विमान प्राणी हैं, जिनको यह भ्रम होने लगा कि भारत -इंडिया नहीं- की 107 करोड जनता की पसंद-नापसंद चंद हजार डिब्बों -दर्शक कोष्ठ- में कैद है? सच्चाई तो यह है कि टीआरपी का खेल चंद नगरों में साप्ताहिक सट्टे की तरह खेला जाता है और कई मीडिया समीक्षक `कुं के मेढक` की तरह उसे ही `शाश्वत सत्य` मान लेते हैं।
इस तरह के भ्रामक और नीम-हकीम खतरे जान वाली सोच से लवरेज बुद्वि के महारथियों के साथ दर्शक क्या सलूक करेंगे, यह तो आने वाला कल ही बताएगा, फिलहाल इतना तो सच है कि इस पीढी की आबादी का एक बडा हिस्सा खबरों के पीछे खबरों का खेल समझने लगा है। इसीलिए कई ऐसे चैनलों की गिनती आदर से नहीं, बल्कि मजाक के तौर पर की जाती है।
विडंबना यह है कि आज पत्रकार उसी को माना जाता है जो लिखता है या फिर दिखता है। लिखने वालों की फौज में अभी भी कुछ ऐसे लोग है, जिनकी लेखनी सामयिक विषयों पर द्रवित और उद्वेलित करती है। मगर खबरिया न्यूज चैनलों में अक्सर दिल व दिमाग के बीच पैदल चलने वालों का हुजूम दिखाई देता है। किसी बडे विषय को सबसे कम शब्दों में समझाना बहुत बड़ी कला है, लेकिन न्यूज रुम के महारथी अक्सर देश-विदेश की सबसे बडी और संजीदा खबरों के साथ कुछ ही सेकेंड में ऐसा सलूक करते हैं, जिसे देख-सुनकर मोहज्जब लोगों की रूह फना हो जाए। रोना यह है कि किसी भी विषय के साथ न्याय करने के बदले यह सरस्वतीपुत्र उसकी ऐसी-तैसी करना अपना जन्मसिद्व अधिकार समझते हैं। नुक्ताचीनों के इस फौज को इस बात का अहसास नहीं कि सिर्फ नुक्ता के उपर-नीचे होने से ही खुदा, जुदा हो जाता है और अमानत `ख्यानत` बन जाती है।
पूरे 256 पेज के भारी-भरकम विशेषांक का लब्बोलुआब यह है कि हंस पत्रिका के माध्यम से टेलीविजन की तिलस्मी दुनिया के नामचीन से लेकर नुक्ताचीनी पत्रकारों की टोली ने न्यूजरूम के चंडूखाने में पक रही खिचडी का ऐसा लोमहर्षक वर्णन किया है, मानो मई महीने की दोपहर में चिलचिलाती धूप में मल्लिका शेहरावत को किसी चौराहे पर खडा कर दिया हो...
`न्यूजरूम की मंडी` में नंगी हकीकत दिखाने की होड में जैसे कई लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार खुद नंगे दिखाई दे रहे हों...
ऐसे में जनता-...उनके दर्शक और पाठक उनपे ताने या सीटी नहीं मारेंगे?...उनकी च्यूटीं नहीं काटेंगे?...तो क्या उनकी पूजाकर `आशीर्वाद` मांगेंगे?...
अफसोस तो इस बात का है कि-
क्या नहीं होता इस तरक्की के जमाने में
अफसोस मगर आदमी, इंसान नहीं होता।
आखिर में...जब खबर खेल बनना शुरू हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि प्रजातंत्र की चूलें हिलने में अब ज्यादा देर नहीं।
यह सही है कि मुझे हमेशा अंग्रेजी पत्रकार के रुप में ही जाना गया और दिल्ली में पत्रकारों के गोल व गिरोहों से भी मेरा कोई वास्ता नहीं रहा, मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं अपनी घर की भाषा में अपनी बात न कर पाउं। इसलिए हिन्दी में लिखने की यह मेरी पहली कोशिश है।
अजय नाथ झा 1980 के दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्होने हिंदुस्तान टाइम्स के सहायक संपादक के तौर पर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा। उसके बाद आज तक, बीबीसी, दूरदर्शन और एनडीटीवी में भी काम किया. फिलहाल लोकसभा टीवी में बतौर कंसल्टेंट कार्यरत हैं।
Comments
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बहुत ही सच
हरिओम गर्ग 2010-05-12 23:42:05

बहुत ही सच बात कही है आपने .
हरिओम गर्ग


to-ajay ji
amit kumar upadhyay 2010-05-13 00:16:14

apko bahot bahot bhadhai ho.media ka sach dikhane ke liye.


bahut khob
seema 2010-05-13 01:48:22

sir, zaban per apki command aur lekhni me sachi dil ko chuti hai.....lekin afsos aap jaise patrkaro ki kadar nahi hote hai.....channel ke head bane bathe patrkaro me himmat bahut kam hoti hai.....keep writing....best of luck


Sach likhne vale bahut hai magar chhapne vale kam
sushil Gangwar 2010-05-13 07:28:33

Sach likhne vale bahut hai magar chaap nevale kam hai . Hame dar nahi lagta hai ki hamara future kya hoga . bah log dar kar hamari rachnaye nahi chhapte hai ki hame naukri kaise milegi. Es liye media sach se koso dur hai.
www.sakshatkar.com


sidharath 2010-05-13 15:59:05

bahot badiya sir


बधाई
अनहद 2010-05-14 12:47:47

साहस, साफगोई से लिखी गयी , निष्पक्ष , निर्गुट एवं स्वस्थ ,सार्थक समीक्षा के लिए बहुत बहुत बधाई


beware of " FENKU" N. JHA
anil pande 2010-05-16 01:56:26

अजय एन. झा ने जो कूड़ा लिखा है, उसे हिन्दी प्रिंट वालों ने नही छापकर अच्छा ही किया.
झा जी जब JNU मे पढ़ते थे, अपने बाप को कई बार मार चुके थे. बदले मे साथी उन्हे सहानुभूति के रूप मे पैसे दे दिया करते थे.
Mainstream, Economic and Political weekly मे दूसरों के research paper मारकर छपवा लेते थे.
उनका यह चौर्यकर्म पत्रकारिता के काम आया.
झा जी ने बीबीसी मे कभी काम नही किया है.
बीबीसी मे दो-चार बार उनसे किसी ने खबर ले ली थी, जब श्रीमान जी बंगलूरू मे थे.
अजय एन. झा HT मे Assitt. Editor "Trainee " प्रेम शंकर झा की कृपा से बने . एच.के. दुआ ने उन्हे कैसे निकाला.
और जहाँ-जहाँ काम किया, कैसे निकाले गये, अभी जहाँ सुझाव देने वाला जो काम कर रहे हैं, मीरा कुमार के पुत्र की अनुकंपा से कैसे मिला, लंबी कहानी है.
अजय एन. झा लंबी-लंबी फेकते हैं.
इसलिए उन्हे सुनने और पढ़ने से पहले, कृपया नई पीढ़ी के पत्रकार tubelight का इस्तेमाल कर लिया करे.


sawa nikal gai !!
shaishwa kumar 2010-05-17 17:19:08

Anil Pandyeji aapne to puri hawa nikal di Ajay Nath Jhaji ki. Bhai! humne toh bade chao aur tanmayata se poora article padh dala, soncha ki baat dil khol kar likha hai Ajay Nath Jhaji ne! Lekin aapke comment se behad nirash ho gaya! Man aatur hai janne ko ki sach kya hai?


azad news ka haal
azad news 2010-05-25 13:51:46

आज़ाद न्यूज़ का पूरा न्यूज़ रूम आग उगल रहा है. दिल्ली में प्रचंड गर्मी पड़ रही है. पारा 45 डिग्री तक पहुँच गया है. एंकर पसीने में तर-बतर होकर एंकरिंग कर रहे हैं. डेस्क के लोग परेशान हैं. शीशे के कैदखाने में पड़े तड़फड़ा रहे हैं. आज़ाद न्यूज़ के अंदर आजकल ऐसा ही आलम है. पत्रकार बेहोश हो रहे हैं. एंकर उल्टियाँ कर रहे हैं. लोग अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं. यानी कुल - मिलाकर अफरा - तफरी का आलम है. काम करने वाले सभी लोग गर्मी से बुरी तरह बेहाल हैं. न्यूज़ से ज्यादा गर्मी से निजात पाने की और उनका ध्यान रहता है. न्यूज़ रूम उन्हें किसी भयानक सपने से कम नहीं लग रहा है. यह हालात पिछ्ले कुछ समय से है.


सूत्रों के हवाले से हमें जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक अबतक गर्मी के कारण सात लोग बीमार हो चुके हैं. इनमें से आज़ाद न्यूज़ के न्यूज़ डायरेक्टर अम्बिकानंद सहाय भी हैं. आप यकीन करें या न करें, लेकिन यह सच है कि चैनल के न्यूज़ डायरेक्टर के कमरे में भी एसी काम नहीं कर रहा है. इसी वजह से उनकी तबीयत ख़राब हो गयी है. इस मामले में आज़ाद न्यूज़ में पूरा प्रजातंत्र है.


अम्बिकानंद सहाय के अलावा दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख प्रखर मिश्र, शिफ्ट इंचार्ज तारा सैनी, इंटरटेनमेंट की मिष्टी और सूरज भारद्वाज, सौरभ श्रीवास्तव और एंकर सरफराज सैफ़ी गर्मी के कारण अस्वस्थ्य हो चुके हैं. यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में और भी पत्रकारों की तबीयत बिगड़ सकती है. लेकिन चैनल के कर्ता-धर्ता आँखें मूंदें बैठे हैं. पत्रकार जल-भून कर मुश्किल परिस्थितियों में काम कर रहे हैं. मालिक लोग चैन की बंसी बजा रहे हैं.


अभी हाल ही में चैनल के बार - बार ब्लैक आउट होने की वजह से चैनल की खूब बदनामी हुई थी. लेकिन लगता नहीं है की चैनल के संचालकों ने इससे कोई सीख ली है. ढ़ाक की तीन पात वाली कहावत पर वे अब भी चल रहे हैं. यानी कुछ भी हो जाए हम कोई सुधार नहीं करेगे.


एक तरफ यह समस्या है तो दूसरी तरफ चैनल के अंदर गुटबाजी भी पूरे जोरों पर हैं. चैनल दो गुटों में बँटा हुआ है जो बारी - बारी से दूसरे गुट को मात देने की जुगत भिड़ाता रहता है. स्टूडियो आजकल षड्यंत्र का अखाड़ा बन गया है. यह वही स्टूडियो है जो न्यूज़ पढने के काम तो नहीं आता लेकिन आजकल आज़ाद न्यूज़ के सभी पत्रकारों का पसंदीदा जगह बन गया है. क्योंकि यही एक जगह है जहाँ का एसी काम कर रहा है.


पता नहीं आगे क्या - क्या इस चैनल के बारे में देखने - सुनने को मिलेगा. लेकिन एक बात तय है कि यहाँ काम करने वाले लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है. अगली कुछ और रिपोर्ट में हम इसका खुलासा करेंगे. फिलहाल के लिए इतना ही


KAUN SUNEGA DARD......
ALOK 2010-05-31 12:05:05

KAUN SUNEGA DARD .....
ANDHE ,GUNGE ,BAHERO...KI DUNIYA HAI...
PHIR BHI SACH KAHTA HOON.....KAHTA RAHUNGA....
KOE TO SUNO MERE BHAI.....
ye sare news channel wale shoshan aur atyachar ke khilaaf awaz uthane ki bari bari baate karte firte hai par haqikat me ye news channel reporter aur strnger ka jo shoshan karte aa rahe hai wo aazad hindustan ke pahle bhi logo ke saath nahi hota hoga...stringer ko kya dete hai ye log sibay bebkuf banane ke ...grass root par channel me exclusive khabar aur harek area ki khabar sabse pahle dikhane ke liye stinger ki aisi taisi karnewale stringer ke saath jo atyachaar karte hai wo dard ac room me bathne wale channel head ya state beauro kaha se samjh payenge ya yu kaha jaye samjhna hi nahi chahte hai....enhe to bas stringers se muft me khabar chahiye hota hai channel ki trp badhane me...bahot afsos hota hai aise dumuhe logo par jo khud to moti rakam uthate hai aur stringer ko paise paise ke liye tarsate hai.....bahot jaruri hai media ke khilaf awaz uthane ki aur ac room me bathe aise samaj ke chintako ko sadak par ghasitne ki....enlogo ka asli chehra logo ke samne lana bahot jaruri hai barna kya hoga samaj ka jo ess satambh par bharosa karta hai....ye bahot bara dhoka aur dhabba hai media par aur uske thikedaro par.....jara sochiye.....


alok


bahot khub
somnath kothule 2010-06-16 19:42:16

sir. apke samiksha khub prashasniya hai. padh kar acha lagga ayr bhot sari jankari bhi mli


Anonymous 2010-07-16 15:50:26

;) ;)) :0 :angry: :( :love: :D :angry: :angry-red: :evil: :idea: :x :no-comments: :ooo: :pirate: :?: :( :sleep: :)


Reply to anil pandey
Ajay N Jha 2010-07-16 16:23:01

Shri Anil Pandey jee,
aap ke comments par dhayan abhi gaya.JNU mein log likha padha karte the. Magar wahan bhi aap jaise "ratna" honge, yeh pata nahi tha. suna tha ki gadhe kabul mein"bhi" hote hai.. ab laga ki woh kabul mein"bhi hote hain".
Aapki basha aur apse dwara di gayi galiya shayad aapki fitrat ka bakhoobi bayan karti hain. Main unka to jawab dekar aapki satah par nahi aa skta.. haan, aap ki soch par taras zaroor aati hai..
Bhagwan se aapke subudhi ke liya dua hi karoonga...



Anonymous 2010-07-20 04:09:17

"राम जाने सच क्या होता है ! मैंने देखा ही नहीं !!




आज की पत्रकारिता और लेखनी- दोनों ही सच के साथ न्याय करने से घबराती है.......सो लगा कि कुछ सच-सच हो जाये!
क्या आपसे इतनी छोटी उम्मीद भी नहीं कर सकते !
प्रकुठा
9811224623


Soch Theek Nahi
Durgesh Kumar 2010-08-31 20:18:26

खबरिया चैनलों का असली चेहरा आप और आप का विश्लेषण क्या दिखायेगा ...अंग्रेजी में मालिक की पार्टी के हिसाब से खबर लिखने वाले सुड़ो सेकुलर मानसिकता,हिंदुस्तान का सिर्फ गरीब परेशान विपन्न चेहरा.. आंकड़ो पर खबर खबरों के आंकड़े.. अंग्रेजी स्टेटस की हाई प्रोफाइल लोगो की खबरे...आप को सदियों से भूत नाग नागिन से डरते भारतीय समाज को जगाने से क्या यही तमाशा तो अंग्रेजी का मसाला था .... चैनलों ने भूत की पोल खोल दी कुछ देर जिस डर से लोग सदियों से डरे हुए थे| उसे दिखाया गया लेकिन अंत में साफ़ कर दिया वहां भूत आत्मा जैसा कुछ नहीं था | मैंने खुद बाराबंकी यू पी की दरगाह पर भूतो की अदालत की स्टोरी की थी | लेकिन उस स्टोरी में हमने मौके पर तीन दिन भूत जिन्नाद का इन्तजार किया | सारे तमाशे को दिखाते हुए हमने सच का खुअलासा किया की जो भी लोग इलाज के लिया आते है | ज्यादातर मानसिक रोगों से त्रस्त थे | जहाँ तक चैनल के शोषण द्रौपदी ..और धन्नो की बात है | आप को अपने गिरेबान में पहले झाँक लेना चाहिए | कम से कम यहाँ चैनलों की जो भी है दीखता तो है | आप खुद बताओ .. आप के जैसे अखबारी संस्थाओ में सीताओ का क्या हुआ | बस कुछ दिन ...फिर धकेल दी गयी गुमनामी के अँधेरे में | और सुनिए मान्यवर ..बलात्कार की कविता आप भी खूब लिखते हैं लेकिन चैनल आप से २४ घंटे पहले दबाने छुपाने और पैसा लेकर मामला ख़त्म करने पर आमादा सरकारी तंत्र पर खबर दिखाकर कार्यवाई करवाता | अपने से ज्यादा दूसरो पर नजर रखना गुलामी की भाषा के हे सरस्वती पुत्र तुन्मे हिंदी में लिखा भी और पढ़ा भी तो इतना वीभत्स | क्या और कुछ बेहतर हिंदी में नहीं दिखा |दुनिया में किसी भी चीज में सबकुछ बुरा नहीं होता | प्रिंट के आने के पहले भी कुछ समाचार माध्यम रहे होंगे उनकी भी प्रिंट के प्रति ऐसी ही सोच रही होगी | अब प्रिंट के बाद चैनल और चैनल के बाद इन्टरनेट और एस एम एस जैसे सेवाए जिन्दगी कभी रुकेगी नहीं.... कभी लौटेगी नहीं ..आप का कम्मेंट भड़ास पर न होता तो आप की इतनी मेहनत किसे दिखती धन्य है बदलाव.. धन्य है प्रगति आप खुद सोचो की इसे जो भडास ब्लॉग ने जो छाप दिया अपने अंग्रेजी में छाप सकते थे क्या नहीं न नहीं तो छाप दिया होता | गुलामी से बाहर निकलो भाई दुनिया महान लोकतंत्र के रंग देखो खुद भी मुट्ठी भर लेकर मुह में लगा लो| गारंटी है काला नहीं होगा |और कुछ दिन किसी चैनल में रिपोर्टर बन कर देख लो फिर लगेगा... फ़ोन और आंकड़ो और प्रेस नोट से खबर फोटोग्राफर की फोटो से इतर खबरों की जिन्दगी और आत्मा यहाँ कितनी लाइव है....वही दीखता है जो होता है | सच ................


sab TRP ka chakkar ha g
alok 2010-09-02 10:47:06

hello sir AApne sach likha h.sir mai bhi lagbhag sabhi news channel dekhata hu.mujhe sabse bura esh bat ka lagta jab koe patrakar kisi Inshan se jo us time dukha m hota h ye puchhta h apko kaisa lga rha h.mai puchha chahta hu jb us ptrakar ke sath wo ghatna ho jye to use kaisa lgega.jaise kal bihar ma Naksaliyo ne 4 policwalo ke pakda tha to unke wife or girl se puchha ja rha tha.

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