रविवार, 8 जनवरी 2012

- मार्क टली की नयी पुस्तक - नॉन स्टॉप इंडिया, नॉन स्टॉप टली



।। नरेंद्रपाल सिंह ।।
- मार्क टली की नयी पुस्तक -
22 वर्षो तक भारत में बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख रहे मार्क टली की नयी किताब ‘नॉन स्टॉप इंडिया’ भारत से जुड़े कई अहम सवालों को गहरी आत्मीयता और पत्रकारीय बेबाकी के साथ देखती है.
अकसर किसी किताब को पूरा करते-करते आप एक नतीजे के साथ उठ खड़े होते हैं. वह नतीजा या उससे उभरी सोच आप पर और आपकी सहजता पर हावी हो जाती है. लेकिन यहीं कई बार किताब आपको नतीजा या फ़ैसला नहीं सुनाती, वह उससे कहीं आगे आपको एक विमर्श के बीच ला खड़ा करती है.
70 के दशक की किसी बेहतर आर्ट फ़िल्म की तरह, जहां सवाल एक सहज जवाब पर खत्म नहीं होते, कड़वी जमीनी सच्चाइयों के साथ चलते-चलते आपको मथने लगते हैं. आप लगातार उनसे जूझते हैं. नयी दिल्ली में 22 वर्षो तक बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख रहे मार्क टली की करीब ढाई सौ पन्नों की नयी किताब ‘ नॉन स्टॉप इंडिया’ भी भारत के बारे में ऐसे ही दस्तावेज की शक्ल में हमसे रूबरू होती है. खुली अर्थव्यवस्था के दौर में हमारे आसपास बिखरे सवालों पर इतनी सहजता से हाथ रखती चली जाती है कि आप उन सवालों से खुद मुठभेड़ करना चाहते हैं.
आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर आज के भारत में टली के उठाये सवालों का यह सिलसिला नक्सलवाद की समस्या से शुरू होकर जातीय और वोट बैंक की राजनीति से गुजरता हुआ कृषि, कॉरपोरेट, भाषा, रामायण और पर्यावरण तक दस अध्यायों में विस्तार ले लेता है.यहां खूबसूरती यह है कि मार्क टली खुद बहुत कुछ नहीं कहते. वे मुद्दे से जुड़े लोगों के बीच पहुंचते हैं, उनकी आवाज को तथ्यों में पिरोते हैं, माहौल को शब्दों में बुनते हैं और आपके सामने एक ताजा सूरत-ए-हाल बयां कर देते हैं. कुछ ऐसा ही काम उन्होंने खुली अर्थव्यवस्था में दाखिल होते भारत पर लिखी अपनी किताब ‘नो फ़ुल स्टॉप इन इंडिया’ में किया था. तब उन्होंने सती प्रथा से लेकर जाति जैसे नाजुक और संवेदनशील मुद्दों को छुआ था.
उनका कहना है, ‘मैं जानता था कि एक विदेशी होने के नाते मैं बहुत बारीकी से उसमें दाखिल नहीं हो पाऊंगा, उसके हर पहलू को शायद समझा नहीं पाऊंगा. अपनी सीमाओं से उबरने के लिए मैंने जहां तक मुमकिन हो सका उसमें अलग-अलग आवाजों को, लोगों की बात को जगह दी.’ दो दशक के बाद लिखी अपनी नयी किताब में भी वे फ़िर अलग-अलग आवाजों को लेकर लौटे हैं. बस इस फ़र्क के साथ कि इस बार ये आवाजें उन लोगों की भी हैं, जिनसे अपनी सामान्य जिंदगी में एक आम भारतीय पाठक रूबरू नहीं हो पाता. यहां वे उद्योग घरानों के प्रमुखों, छोटे-बड़े किसानों, राजनीति और दलितों के नेताओं, धर्मगुरुओं और शिक्षाविदों से भी विस्तार से गुफ्तगू करते हैं.
इसी कड़ी में जब वे लोहरदगा में कोल इंडिया के रिटायर जनरल मैनेजर विश्वेश्वर मिश्र से पूछते हैं कि इस नक्सल इलाके में आप काम कैसे करते थे, तो उनका जवाब होता है- हमें उन्हें पैसा देना पड़ता था. नक्सली कहा करते थे, ‘आप पैसा बना रहे हैं हमें भी पैसा दो.’ टली सवाल करते हैं, ‘आप पैसा बना रहे हैं’ इसका क्या मतलब? मिश्र कहते हैं- ‘हम जब अपने सीनियर से पूछते थे कि इन नक्सली से कैसे निबटें, तो वे कहते- आपको थोड़ी सूझबूझ से काम लेना होगा.’ लेकिन इस सूझबूझ के लिए पैसा कहां से आयेगा, तो वे कहते, ‘यह आप को मैनेज करना है. एक बार आप नक्सली के लिए मैनेज करने लगे, तो आप अपने लिए भी मैनेज करने लगेंगे.’ यहीं से शुरुआत होती है भ्रष्टाचार की. नक्सली जानते हैं कि हमारे मैनेजर पैसा बनाते हैं. और इसीलिए वे कहते हैं कि आप पैसा बना रहे हैं.
टली सवाल करते हैं, मान लीजिए आप पैसा देने से मना कर दें तब? ‘वे मजदूरों को काम नहीं करने देंगे. मैनेजर सूझबूझ से काम करते हैं. इसीलिए शांति है.’ मिश्र के मुताबिक प्राइवेट सेक्टर में भूमिका बदल जाती है, वहां मैनेजर नहीं, शीर्ष पर बैठे लोग नक्सली को सीधे पैसा पहुंचा देते हैं. पुलिस असहाय है. इस पूरे संवाद में टली अपनी तरफ़ से बहुत कुछ नहीं कहते. यहां वे यह जानने निकले हैं कि बॉक्साइट की खानों के लिए नक्सलियों को लेवी कैसे दी जाती है. लेकिन यहीं टली नक्सलवाद और भ्रष्टाचार के तारों को बेहद सहजता से जोड़ते चले जाते हैं.
दरअसल, टली सवालों का एक ब्लू प्रिंट तैयार करते हैं और एक घुमंतू पत्रकार के अपने एक लंबे अनुभव के साथ जवाब की तलाश में निकल पड़ते हैं. ऐसा ही उनका एक सवाल है कि तेज आर्थिक विकास ने दलितों की जिंदगी को कैसे बदला है. खासतौर से ग्रामीण दलितों की जिंदगी को.
इस कोशिश में वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के शेरपुर गांव में पहुंचते हैं, तो उत्तर भारत में हरियाणा के मिर्चपुर भी जाते हैं. शेरपुर 1975 मे दलितों और भूमिहारों के बीच संघर्ष के चलते सुर्खियों में आया था. मिर्चपुर में कुछ साल पहले ही दलितों के घर जलाने और उनकी संपत्ति लूटने की खबरें राष्ट्रीय मीडिया में छायी थीं. इन दोनों जगह दलितों और उच्च जातियों में कड़वाहट अब भी बनी हुई है, दलितों का उत्पीड़न भी जारी है. लेकिन शेरपुर और मिर्चपुर में एक बड़ा फ़ासला है. शेरपुर में दलितों की आर्थिक स्थिति में कोई बहुत सुधार नहीं आ पाया है, जबकि गांव से कस्बे में तब्दील हो रहे मिर्चपुर में दलित आज जाट समुदाय की बराबरी पर हैं. मिर्चपुर में टली एम फ़िल कर चुके दलित युवक अश्विनी से रूबरू होते हैं.
आधुनिक कपड़े पहने और धूपचश्मा लगाये अंगरेजी बोलने वाले अश्विनी से वे सवाल करते हैं, बीते 20 सालों में दलितों की हालत में क्या सुधार हुआ है? जवाब मिलता है, यहीं से तो समस्या शुरू होती है. अब हर क्षेत्र में आरक्षण है. हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं. हम संस्कृति में, आर्थिक स्तर पर और शिक्षा में सब जगह विकास कर रहे हैं. 20 साल पहले तक हम जाट समुदाय की ओर देख भी नहीं सकते थे. अब हम हर क्षेत्र में उनसे बराबरी कर रहे हैं. उन्हें यह पसंद नहीं है. यहां टली देवीशरण जैसे उन दलितों तक भी पहुंचते हैं, जो बिना किसी आरक्षण के सीमा सुरक्षा बल में जगह बनाने में कामयाब हुए हैं.
इतना ही नहीं, दलितों की स्थिति को समझाने के लिए वे समाजशास्त्री कांचा इल्लिया से लेकर अर्थशास्त्री, प्रशासक एवं लेखक नरेन्द्र जाधव के नजरिये से भी रूबरू कराते हैं.टली इसी तरह मुसलिम वोट बैंक की राजनीति से लेकर पत्रकारिता में घर कर रही पेड न्यूज, अंगरेजी के सामने बेबस होती तमिल से लेकर हिंदी भाषाओं तक की ट्रेजडी की भी थाह लेते हैं. टली बीते दो दशक में दुनियाभर में हासिल भारतीय कॉरपोरेट जगत की कामयाबियों को भी समझने की कोशिश करते हैं. वे उन आरोपों के सच तक पहुंचना चाहते हैं, जिनमें राजनीति और नौकरशाही के भ्रष्टाचार के दलदल में धंसने के लिए कॉरपोरेट पर उंगली उठायी जाती है.
किताब में एक पत्रकार के रूप में अपने अनुभवों को खंगालते हुए टली आज में दाखिल होते हैं. यहां ढलती उम्र के बावजूद उनकी पत्रकारीय जिजीविषा जाहिर होती है. वे पत्रकारीय विधाओं को साथ लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं. उनके लेखन में बात को मजबूती देने वाले इमेजेज दिखते हैं.
वे कभी यमुनानगर की रेलवे क्रासिंग पर धीरे-धीरे आगे बढ़ते ट्रैफ़िक को भारतीय समाज से जोड़ते हैं, तो कभी आज के शेरपुर में पहुंच कर अपनी दो दशक पुरानी कहानी लौटा लाते हैं, कभी जमशेदजी टाटा के होटल बनाने के पीछे की दिलचस्प कहानी सुनाते हुए लेखनी को रोचकता से भर देते हैं. टली रुकना नहीं चाहते. 76 साल की उम्र में भी वे लगातार अपने ‘दूसरे देश’ भारत की खोज में हैं.

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