गुरुवार, 12 जनवरी 2012

हिन्दी अखबारों का अंग्रेजी-प्रेम



  • Article
  • Comments


पंकज पाठक , 02-Jan-2012 12:00:00 AM
Font Size: Increase Font Size Decrease Font Size
Keywords: अखबारों की भाषा, अंग्रेजी-प्रेम, *English in Hindi newspapers: Market kaa effect? अखबारों की भाषा | अंग्रेजी-प्रेम | *English in Hindi newspapers: Market kaa effect? |
हिन्दी अखबारों का अंग्रेजी-प्रेम
अखबारों की भाषा कैसी हो और किस प्रकार की हिन्दी का प्रयोग होना चाहिए - इस पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। रविवार को भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्प सी सुदर्शन ने राजधानी के पत्रकारों से यह अपेक्षा की कि वे अपने अखबारों की भाषा सुधारें। इसमें अंग्रेजी के शब्दों का चलन बढ़ता ही जा रहा है। उनका यह तर्क था कि जब अंग्रेजी में प्राय: हिन्दी के शब्दों को स्वीकार नहीं किया जाता है, तो हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों की भरमार किसलिए? उनका यह भी कहना है कि रेल और स्टेशन जैसे शब्दों को हिन्दी में स्वीकार कर लिया गया है, लेकिन लेपटाप के लिए संगणक और अपार्टमेंट के लिए संकुल का प्रयोग किया जाना चाहिए।
सुदर्शन और पत्रकारों के बीच इस विषय पर काफी देर बहस हुई और अधिकांश पत्रकार उनसे असहमत दिखाई दिए। इस संवाद के माध्यम बने थे दैनिक स्वदेश के प्रधान संपादक राजेंद्र शर्मा। उन्होंने अपने निवास पर इसके लिए पत्रकारों और संपादकों को न्योता दिया था। कुछ पत्रकारों को ऐसा लगा, मानो सुदर्शन मार्गदर्शन दे रहे हैं, सुझाव नहीं। पत्रकारों के एक बड़े वर्ग का कहना था कि अखबार आम आदमी पढ़ता है, इसलिए अखबारों की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की होनी चाहिए। समाचारों के शीर्षकों को बनाने में संपादकों को कॉलम के सीमित आकार में ही शब्दों को जमाना पड़ता है, इसलिए जरूरत पडऩे पर भविष्य निधि शब्द लिखना हो तो उसके स्थान पर पीएफ लिखा जाता है। लेकिन सुदर्शन का तर्क था कि भोपाल के एक बड़े अखबार में स्टूडेंट्स, एग्जाम और मीटिंग शब्द का प्रयोग हो रहा है। इसके स्थान पर छात्र, परीक्षा और बैठक का इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता?
कुल मिलाकर सुदर्शन हिन्दी की शुद्धता को लेकर समझौते के खिलाफ हैं और पत्रकार भाषाई अनुशासन के विरुद्ध हैं। हिन्दी के पक्षधर और मीडिया के बीच दृष्टिकोण का यह अंतर नया नहीं है।  यह टकराव लंबे समय से है। वास्तव में यह विषय अनावश्यक विवाद, तर्क-वितर्क और अहम की टकराहट का नहीं है, बल्कि हिन्दी-प्रेम और हिन्दी के विकास से जुड़ा हुआ है। हिन्दी का विस्तार, उसे लोकप्रिय बनाना, उसके प्रति सम्मान का भाव होना और हिन्दी में बातचीत को प्रोत्साहित करना - इस सबके प्रति हर हिंदी भाषी को सोचना चाहिए और अपने-अपने स्तर पर प्रयास करना चाहिए। हिन्दी में दूसरी भाषाओं के शब्द आते रहे हैं। इससे हिन्दी का विकास हुआ है और इससे उसने अपनी सीमाओं का विस्तार भी किया है।
देश के गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों और विदेश में भी हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है। हिन्दी फिल्में, हिन्दी गीतों और हिन्दी के टीवी रियलिटी शो भी हमारी भाषा को लोकप्रिय बना रहे हैं। पाकिस्तान में तो हमारी फिल्मों की लोकप्रियता का परिणाम यह है कि उर्दू भाषियों की जुबान पर हिन्दी के शब्द आम बोलचाल में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। हिन्दी में प्राय: अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत के शब्द बहुतायत में सुनाई देते हैं। हिन्दी के पंडितों को संस्कृत के शब्दों पर स्वाभाविक रूप से एतराज नहीं है, उर्दू को लेकर भी अधिक परहेज नहीं है, पर अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते चलन पर वे आपत्ति उठा रहे हैं।
हिन्दी मीडिया के अंग्रेजी-दाँ पत्रकार यह जानते हैं कि अंग्रेजी सिर्फ इंग्लैंड, अमेरिका और आस्ट्रेलिया की भाषा है। इन्हें छोडक़र दुनिया के अन्य किसी भी देश में अंग्रेजी का वर्चस्व नहीं है। अलबत्ता यह कनाडा, आयरलैंड और न्यूजीलैंड में भी थोड़ी-बहुत चलन में है। वहीं हिन्दी को विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरा स्थान प्राप्त है। पहले क्रम पर मंदारिन यानी चीनी है और दूसरे पर अंग्रेजी है। विश्व भाषाओं में भारतीय भाषाओं - बंगाली, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मराठी, कन्नड़, गुजराती, मलयालम, उडिय़ा, सिंधी और असमिया का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अंतरराष्ट्रीय भाषाविदों ने 2796 भाषाओं को सूचीबद्ध किया है, जिनमें 1200 से अधिक अमेरिका-भारत में बोली जाती हैं। इनमें ज्यादातर ऐसी हैं, जिनके बोलने वाले एक हजार से ज्यादा नहीं हैं। विश्व की इन भाषाओं में, जो 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती हैं, ऐसी भाषाओं की संख्या 160 के आसपास है। इस प्रकार 85 प्रतिशत भाषाएँ दुनिया के छोटे-छोटे जातीय समूहों द्वारा बोली जाती हैं और विश्व की प्रमुख भाषाएँ बोलने वालों की संख्या मात्र 15 प्रतिशत है।
इस तरह से भाषाओं के क्षेत्रीय आधार और वर्चस्व को समझा जा सकता है। पिछले वर्षों में जो नए शोध सामने आए हैं, उससे तो हिन्दी की स्थिति विश्व में शीर्ष पर पहुँच गई है। अब यह माना जा रहा है कि हिन्दी-भाषियों की संख्या अंग्रेजी बोलने वालों से आगे निकल गई है और उसने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। यानी जो हिंदी एक समय वैश्विक भाषाओं में पांचवें  स्थान पर भी नहीं थी, वह आज पहले स्थान पर है। यहां मुद्दा अंग्रेजी की आलोचना का नहीं है, बल्कि हिन्दी के बढ़ते विकास और बढ़ती लोकप्रियता का है।
हिंदी एक देश की नहीं, वैश्विक भाषा है। लेकिन समस्या यह है कि जो सम्मान उसे दुनिया में प्राप्त है, वह उसे भारत में नहीं मिल पा रहा है। श्रेष्ठि वर्ग हिन्दी में बात करना अपनी शान के खिलाफ समझता है। यूरोप, अफ्रीका, एशिया और मध्य तथा दक्षिण अमरिका के देशों में वहां की स्थानीय भाषाएं चलन में हैं। अंग्रेजी यहां कहीं भी आवश्यकता या अनिवार्यता नहीं है। पर हमारे देश में ठीक इसके उलट है।
आज वास्तविकता यह है कि अखबारों में हिन्दी जानने और समझने वालों का अकाल है। हिंदी की शुद्धता और वर्तनी का आज के संपादकों को भी ज्ञान नहीं है। पहले अखबारों के संपादक हिन्दी के विद्वान होते थे, पर आज के संपादक अंग्रेजी के विद्वान भी नहीं हैं। हिन्दी की पत्रकारिता भाषाई स्तर पर अधकचरे-पन के दौर से गुजर रही है। पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों से ‘प्रशिक्षण’ लेकर निकलने वाले छात्र-छात्राएं या तो पब्लिक स्कूल के होते हैं, इसलिए अंग्रेजी शब्दों का बेरोकटोक प्रयोग करते हैं- या फिर वे छात्र-छात्राएं होते हैं, जिन्हें न तो अंग्रेजी आती है, न हिंदी। वे बजाय हिन्दी का ज्ञान प्राप्त करने के अंग्रेजी के कामचलाऊ शब्दों को अपनी खबरों में भरने लगते हैं।
भाषाविद् अजित वडनेरकर ने अपनी पुस्तक- शब्दों का सफर में ठीक ही लिखा है - ‘अखबारों में अब के हिन्दी-कर्मी शब्दों की वर्तनी, उनकी अर्थगर्भिता जानने की जरूरत से ऊपर उठ चुके हैं। भाषा के सागर में अब सिर्फ किनारे बैठकर सब संतुष्ट हैं। न पार जाने की चाह है, न गहराई नापने की। जिसका नतीजा अभयारण्य आप्रवासी, सौहार्द, किश्त जैसे शब्दों में नजर आता है। शब्दों का इस्तेमाल निर्जीव वस्तु की तरह किया जाता है।’ शब्द-व्युत्पत्ति पर अजित वडनेरकर कई वर्षों से मध्यप्रदेश के एक बड़े अखबार में एक कॉलम लिख रहे हैं, पर विसंगति यह है कि इस अखबार की भाषा में औसतन हर पंक्ति में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ही मिलेगी।  
हिंदी की पहचान बनाए रखने का काम अखबारों का भी है, लेकिन वही इसे बिगाडऩे पर तुले हैं। एक जमाना था जब मध्यप्रदेश का एक बड़ा अखबार बच्चों को इसलिए पढ़वाया जाता था, ताकि उनकी हिन्दी में सुधार हो। पर आज स्थिति यह है कि अब कोई भी इस अखबार को इस दृष्टि से नहीं पढ़ता। अखबारों का अपने यहां हिन्दी सुधारने की तरफ ध्यान भी नहीं जाता है। सच है, जहां किसी को अच्छी हिन्दी बोलना और लिखना नहीं आती, वहां सिखाने का काम कौन करेगा?
मीडिया सुदर्शन के सुझाव को अहम का मुद्दा बनाने के बजाय आत्मावलोकन करे। वह अहम् ब्रह्मास्मि का भाव त्याग दे और यह मान ले कि वह सर्वगुणसम्पन्न नहीं है। बल्कि उसे हिन्दी की गरिमा और गौरव को पुनस्र्थापित करने के लिए खुद आगे आना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें