सोमवार, 16 जनवरी 2012

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता / , ले. महादेव देसाई



 

अख़बारों के प्राण यानी समाचार अथवा ख़बर । खबरें हासिल करना और उन्हें पेश करने की भी कला है , तथा जिसने इस कला को उत्तम ढंग से साधा है , वह लोगों की सेवा तो कर ही रहा है ,खुद की भी सेवा कर रहा है । आज दुनिया दिनबदिन छोटी होती जा रही है , पश्चिम के सुदूर कोने की ख़बर पूर्व के सुदूर कोने में कुछेक घण्टे में ही पहुँच रही है । कई बार एक स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों को वहीं घटित घटना की खबर मिले इसके पहले वहाँ से हजारों मील दूर रहने वालों को वह ख़बर मिल जाती है । मेरा यह कथन अत्युक्ति नहीं है । श्री रणजीत पण्डित मसूरी रह रहे थे तब गुजरात के ‘अब्बाजान’ कहे जाने वाले अब्बास साहेब तैय्यबजी की मृत्यु वहाँ हुई । श्री रणजीत को इस दुखद घटना की जानकारी तीन दिन बाद अख़बारों से मिली जबकि अब्बास साहेब के कुटुंबीजनों को सैंकड़ों मील से दूर से भेजे गए संवेदना के अनेक तार मिल चुके थे ।
यूँ अख़बार समाचार छाप कर एक अहम सेवा करते ही हैं , मगर यह समाचार सच के बदले झूठ हो तब क्या हो ? और कुछ नुकसान हो या न हो सरकार के डाक तार- विभाग की अच्छी आमदनी ऐसी ग़लत खबरें जरूर करा देती हैं । ‘गाँधीजी २७ तारीख़ को मुम्बई हो कर जाएँगे’- यह गप्प किसी अख़बार वाले ने उड़ा दी, नतीजन मुझे नाहक ही ढेरों लिखा पढ़ी करनी पड़ी ।
यदि समाचार सेवा के बदले असेवा के लिए दिए जाँए, तब ! कौमों के बीच ज़हर बरस रहा हो और वहीं आग भड़काने वाली चिन्गारी छोड़ दी जाए, तो ? जहाँ पल भर में शान्ति से लड़ाई की स्थिति बन सकती हो , वहाँ लड़ाई शुरु करवाने के उद्देश्य से सत्य अथवा अर्धसत्य अथवा संशयपूर्ण तथ्य जारी कर दिए जाँए,तब  क्या हो? मिल मजदूरों और मालिकों के बीच झगड़ा चल रहा हो,उसी बीच बड़ी सामूहिक हड़ताल हो जाए ऐसी उड़ती बातें तथा गप्प प्रकाशित की जाँए ,तब क्या हो ? अख़बारनवीस जनता के सेवक न रहकर शत्रु बन जाते हैं,सत्यरूपी अमृत परोसने की जगह असत्य का जहर परोसते हैं । अख़बार की कुछ अधिक प्रतियाँ बिक जाएँगी ऐसे छोटे स्वार्थवश अख़बार इस बुनियादी उसूल की कितनी बार अवहेलना करते हैं ? गांधीजी जेल में थे तब उनके द्वारा वाइसरॉय को कथित तौर पर लिखे गये पत्रों  को ‘मसौदे’ सहित छाप कर एक अखबार ने जनता के चित्त को झूले की पेंग का मजा चखाया था । अन्य एक पत्रकार ने कुछ समय पूर्व ‘नए वाइसरॉय मिलने के विषय में गांधीजी और लॉर्ड हेलिफ़िक्स के बीच पत्राचार चल रहा है’- यह गप्प छाप कर अपनी ,अपने अखबार की प्रतिष्ठा और देश का कितना अहित किया था ? जब से साम्प्रदायिक द्वेष की बीमारी अपने यहाँ आई है और गाहे बगाहे प्लेग की तरह फूट पड़ती है, तब से विशेष रूप से उत्तर में,कितने चीथड़े जैसे अख़बार निकल रहे हैं जो अनेक सच्ची झूठी खबरों से कितना जहर नित्य फैला रहे हैं ? इस जहर के कारण कितनी हत्याएँ हुई हैं ? हाल ही में एक उर्दू अख़बार ने मुम्बई के संवाददाता का निराधार पत्र छापा । पत्र में लिखा था कि फलाँ व्यक्ति गाँधीजी से मिल कर आया है । उसके साथ हुई इस मुलाकात में गांधीजी ने इस्लाम की बखान की , हिन्दू धर्म की निन्दा – आलोचना की तथा कलमा पढ़ा । लखनऊ के इस अखबार के सम्पादक से मिलने के लिए हमने एक मित्र से निवेदन किया और कहा कि ऐसा कोरा झूठ छापने का मकसद भी पूछ लेना । यह मित्र उस व्यक्ति से मिले तब उसने बेशरमी से जवाब दिया : ‘ हमें तो ऐसी खबर मिली है, आपको यदि इसका इनकार छपवाना हो तो छापने के लिए तैयार हूँ । बस यह समझ लीजि कि इनकार छपवाने का यह अर्थ निकलेगा गांधीजी का इस्लाम के प्रति सम्मान नहीं है !’ इस पर टीका करने का यह स्थान नहीं है और आवश्यकता भी नहीं है । परन्तु यह हमारे अभागे देश की अधोगति की सीमा दरशाता है । पत्रकार लोकमत का प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है, तथा लोकमत गढ़ता भी है । इस परतंत्र स्थिति में और विकास के दौर में लोकमत गढ़ना , लोकमत कि ज्ञान से ,सच्चे समाचारों से समृद्ध करना पत्रकार का विशेष धर्म बनता है । अपने देश में लोगों का अज्ञान किस हद तक जाता है इसकी एक मिसाल देता हूँ -  सत्य समाचार देने की जिम्मेदारी कितनी गम्भीर है इसका अन्दाज इस मिसाल से मिलेगा ।कुछ दिन पहले अच्छी खासी तनख्वाह पाने वाला एक व्यक्ति गांधीजी से मिलने आया ।वह अख़बार रोज़ाना तो क्या पढ़ता होगा कभी-कदाच देख लेता होगा । वह एक प्रसिद्ध संस्था में है परन्तु शायद ही अपने काम से बाहर निकल न पाता होगा । वह जब गांधीजी के पास आया तब खान साहब अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान सामने बैठे हुए थे । विवेकवश गांधीजी ने परिचय कराते हुए कहा, ‘ ये ख़ान साहब अब्दुल गफ़्फ़ार खान हैं , नाम तो सुना होगा ? ‘  उसने विनयवश हामी भर दी । मेरे साथ वापस लौटते वक्त रास्तेमें उसने मुझसे पूछा , ‘ यह साहब जो वहां बैठे थे वह तो गांधीजी के पुत्र अब्दुल्ला हैम न, जो कि मुसलमान हुए हैं ?” मैंने उसे वास्तविक बात समझाई । तब उसने दूसरा सवाल दागा , “गांधीजी आजकल यहां बैठे हैं एहमदाबाद में उनकी जो तीन – चार मिलें हैं वह कौन चलाता है ?और यह बड़ा लड़का मुसलमान हुआ तो मिल चलाने वाले कोई दूसरे लड़के हैं ,क्या ?” ऐसा है हमारी जनता का पढ़ना-लिखना जानने वाला एक औसत व्यक्ति !ऐसे लोगों का कितना अहुइत होगा यदि उन्हें गलत खबर दी जाएगी ? उस उर्दू अख़बार के झूठ को कई उर्दू अखबारों ने लिया तथा मेरे पास दर्जनों ख़त यह पूछते हुए आए – ‘गांधीजी के मुसलमान बनने की बाबत सही खबर क्या है ? ‘
[ जारी ]
लेख के अन्य भाग :
पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य
पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

1 टिप्पणी:

  1. अनामी शरण जी , महादेव देसाई के पत्रकारिता पर व्याख्यान के गुजराती से मेरे अनुवाद का सन्दर्भ देने के लिए शुक्रिया|पूरा भाषण एक साथ पीडीएफ़ में भी देखा जा सकता है - पूरा भाषण
    महादेव देसाई गांधीजी के सचिव और उनके अंग्रेजी पत्र हरिजन के सम्पादक थे | अखिल भारतीय समाचार पत्र सम्पादक कानफरेंस के संस्थापक सदस्यों में से एक तथा उसकी स्थायी समिति के सदस्य भी थे |

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