रविवार, 15 जनवरी 2012

अपने कमाऊ बेटों की मौत का इंतजार कर रहा एक गांव

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नवल किशोर कुमार
जी हां, बिहार का एक गांव, जहां एक के बाद एक पिछले 6 सालों में 63 लोगों की मौत हो चुकी है। इन लोगों में 47 वे नौजवान हैं, जिनकी उम्र केवल 25 वर्ष से लेकर 40 वर्ष के बीच थी। इस अभागे गांव का नाम है जाल्ही। यह गया जिले के मोहनपुर प्रखंड के गोपाल खेड़ा पंचायत में है। इस गांव में कमाऊ बेटों के मरने का सिलसिला जारी है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस गांव पर सिलिकासिस नामक एक लाइलाज रोग का प्रकोप है, जो एक प्रकार का टीबी है। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि इस गांव के नवयुवक रोजगार के लिये राजस्थान के पत्थर उद्योग में लगे हैं, जहां से वे अपने परिवार के लिए पैसे के अलावे अपने लिये मौत भी लाते हैं। काम करने के दौरान पत्थर के धूलकण सांस के सहारे फ़ेफ़ड़े में जम जाते हैं और फ़िर ये सिलिकासिस के चपेट में आ जाते हैं।
इसी गांव के एक निवासी बद्री पासवान ने अपना बिहार को बताया कि पिछले एक साल के दौरान 13 युवकों की मौत हो चुकी है। अभी हाल में मरने वाले नवयुवक का नाम राम अवतार भुइयां था। वैसे यह भी बताते चलें कि वर्ष 2006 में जाल्ही गांव के ही 15 लोगों की मौत इसलिये हो गई थी कि उन लोगों ने जमीन के अंदर गाड़ा गया बकरा का मांस खा लिया था। हालांकि बिहार सरकार ने अबतक इस सच्चाई को नहीं कबूला है कि लोगों ने भूखमरी के कारण जमीन के अंदर दफ़ना दिये गये बकरा का मांस खाया और मर गये।
इस संबंध में पीयूसीएल बनाम भारत सरकार के बीच चल रहे कानूनी विवाद के मद्देनजर नियुक्त किये गये विशेष सलाहकार के राज्य प्रतिनिधि रुपेश ने बताया कि पिछले वर्ष 23 जुलाई को एक जांच टीम ने जाल्ही गांव का दौरा किया था। इस जांच में जिले के आला अधिकारी भी मौजूद थे और सभी ने इसपर सहमति व्यक्त की थी कि जाल्ही गांव के लोग भूखमरी के बीच जीने को मजबूर हैं और इस गांव के युवक सिलिकासिस से पीड़ित हैं। जबकि 12 अगस्त 2010 को अपने जांच प्रतिवेदन (पत्रांक संख्या- 132)  में जिला य्क्ष्मा पदाधिकारी ने सिलिकासिस के प्रकोप से पूरी तरह इन्कार किया और सारा दोष शिकायत करने वालों पर यह कहते हुए मढ दिया कि शिकायत करने वाले लोग असामाजिक तत्व और गुंडा प्रवृति के हैं।
बहरहाल, जाल्ही गांव में 11 युवक अभी और भी हैं, जो अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। इनके साथ ही पूरा जाल्ही गांव भी अपने एक और कमाऊ बेटे की अर्थी को कंधा देने के लिये मजबूर है। रही बात सरकारी कार्रवाई की तो यह बात समझ से परे है कि जाल्ही गांव के युवकों की जान नहीं बचाई जा सकती है।

लेखक   www.apnabihar.org के संपादक हैं
साभार: अपना बिहार (www.apnabihar.org)
Short URL: http://www.wisdomblow.com/hi/?p=38

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