सोमवार, 16 जनवरी 2012

ये मीडिया का पतनकाल है

e मीडिया मंथन ये मीडिया का पतनकाल है


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ये उत्तर प्रदेश नहीं पतन प्रदेश है, इस पतन में मीडिया की हिस्सेदारी किसी भी राजनैतिक पार्टी से कहीं ज्यादा है. भ्रष्ट सरकार, अतिभ्रष्ट नौकरशाहों के इस प्रदेश में मीडिया की नयी फसल तैयार है इस फसल में आपको पत्रकार भी मिलेंगे, अखबार भी मिलेंगे और वो सभी साजो समान भी मिलेंगे,  जिनसे अखबार सिर्फ और सिर्फ बाजार की चीज बनकर रह जाता है. यकीन न आये तो लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स और डेली न्यूज एक्टिविस्ट में पिछले एक सप्ताह से छापी जा रही प्रथम पेज की ख़बरों को देख लें. एक्टिविस्ट ने अपने प्रथम पृष्ठ पर विवादित और प्रदेश के महाभ्रष्ट मंत्रियों में शुमार बाबू सिंह कुशवाहा के महासचिव पद से हटाये जाने और मुख्यमंत्री द्वारा उनसे किनारा कस लेने के सम्बंध में एक खबर छापी, ठीक अगले ही दिन जनसंदेश टाइम्स ने बसपा के हवाले से इस खबर का खंडन छापा ही एक्टिविस्ट के पत्रकारिता को लाल बुझक्कड़ी करार दिया.
संज्ञान में रहे कि डॉ. सचान की हत्या, खनिज विभाग और स्वास्थ्य विभाग में हुए अरबों के घोटालों में शामिल रहे बाबू सिंह कुशवाहा के काले -कारनामे शीशे की तरह साफ़ हैं, शायद ही कोई ऐसा अखबार हो जो कुशवाहा के क्रिया कलापों के बारे में नहीं जानता हो. ख़बरों के लिए पत्रकार आम तौर पर सूत्रों पर निर्भर होते हैं, कई बार सूत्रों से मिली सूचनाएं गलत हो जाती हैं,  लेकिन क्या इस एक वजह से कोई एक अखबार दूसरे अखबार की पत्रकारिता को लाल बुझक्कड़ी कह सकता है, वो भी सारी हदों को पार करके. अगर जन्सदेश टाइम्स में छपी खबर को पढ़ा जाए तो वो बसपा की विशुद्ध चमचागिरी के सिवाय कुछ नहीं नजर आएगा.
जनसंदेश टाइम्स के सम्मानीय सम्पादक सुभाष राय का नाम प्रदेश के संवेदनशील पत्रकारों में गिना जाता है,  उनसे पाठकों का एक वर्ग इमानदारी की अपेक्षा भी करता है. लेकिन इस एक खबर को पढ़कर साफ़ पता चल जाता है कि उत्तर प्रदेश के अखबार मालिकों और उनके राजनैतिक सरोकारों के हित में चलाये जा रहे हैं,  ये ऐसा वक्त है जब ख़बरें अपना अस्तिव खो देती हैं, अखबार के अपने लाभ बड़े हो जाते हैं.जनसन्देश टाइम्‍स लिखता है कि "मीडिया में आये लाल बुझ्क्कड़ों से सावधान रहना पड़ेगा, इनकी मौजूदगी की वजह से मीडिया की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता पर अब संदेह की अंगुलियाँ उठने लगी हैं." प्रमाणिकता और विश्वसनीयता से बड़ी चीज चरित्र होती है, प्रमाणिकता और विश्वसनीयता सूत्रों से प्रभावित होती है, चरित्र अखबार खुद तय करता है. ख़बरों के लिए अदालती फैसलों पर निर्भर अखबार अपनी चरित्रहीनता में उन दुश्चरित्रों के दामन को भी साफ़ करने की कवायद कर रहे हैं,  जिन से उत्तर प्रदेश का दामन दागदार हो रहा है. आज नहीं तो कल सुभाष राय से ये सवाल जरुर पूछा जायेगा कि दागी नेताओं को महिमामंडित करके कौन से पत्रकारिता धर्म का निर्वहन किया जा रहा था.
"जनसंदेश टाइम्स" को बसपा समर्थित और "डेली न्यूज एक्टिविस्ट "को सपा समर्थित कहा जा रहा है, इस एक वक्त में जब प्रदेश में छपने वाले तमाम बड़े छोटे अख़बारों के अपने राजनैतिक सरोकार हैं, सम्पादक से लेकर पत्रकार तक संसद से लेकर सभासदी तक में अपनी किस्मत अजमा रहे हैं. किसी भी दल का खुल कर समर्थित होना उतनी बड़ी बात नहीं है जितना ये कि इस समर्थन में हम पत्रकारिता के आदर्शों को किस कीमत पर नीलाम करते हैं. जो डेली न्यूज एक्टिविस्ट के नियमित पाठक होंगे,  उन्हें तीन साल पहले मुख्य पृष्ठ पर छपा प्रभात रंजन दीन का वो सम्पादकीय जरुर याद होगा जिसका शीर्षक था "सराहनीय मायावती उलाह्नीय मीडिया", ये शीर्षक महराजगंज कोतवाली में हुई तोड़फोड़ और सिपाही कृष्णानंद राय की हत्याके सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश सरकार में ताकतवर मंत्री रहे जमुना प्रसाद निषाद की गिरफ्तारी को लेकर था.  इस खबर ने अखबार वालों को सरोकार वालो को और सरकार वालों को भी चौंकाया. अखबार वाले तो जज बनकर जमुना प्रसाद निषाद को क्लीन चीट दे चुके थे। सरोकार वालों को भरोसा ही नहीं था कि एक दिन पहले तक निषाद को बचाने वाली मायावती उनकी गिरफ्तारी का आदेश भी जारी कर सकती हैं। और सरकार वालों को आखिरी समय तक गुमान नहीं था कि मुख्यमंत्री ऐसे फैसले करने वाली है. ये खबर जिस वक्त छपी, ठीक उसी वक्त पूरी बसपा सरकार डेली न्यूज एक्टिविस्ट को उखाड़ फेंकने और उसका प्रेस बंद कराने के लिए जी-तोड़ कोशिशें कर रही थी. इस खबर के छपने के दो दिनों बाद ही फिर एक खबर मुख्य पृष्ठ पर लगी "विकास नहीं वसूली करते हैं कबीनामंत्री",  ये खबर उत्तर प्रदेश के भ्रष्टतम मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के काले कारनामों की पोल खोलती खबर थी. इन दो ख़बरों में एक्टिविस्ट का एक्टिविज्म पानी की तरह साफ़ था.
एक ऐसे प्रदेश में जहाँ का मंत्री और जहाँ की मुख्यमंत्री ये कहते हैं कि जो भी छापते रहो हमें फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि मेरा मतदाता अखबार नहीं पढ़ता है, समाचार पत्रों की जनता के प्रति जवाबदेही बेहद बढ़ जाती है. एक्टिविस्ट ने इस जवाबदेही की गंभीरता को समझा है, वहीं दूसरी तरफ जनसंदेश टाइम्स उत्तर प्रदेश में अखबार चलाने के लिए सत्ता का शरणागत होना स्वीकार कर चुका है. अगर उत्तर प्रदेश का कोई भला कर सकता
आवेश तिवारी
आवेश तिवारी
है तो सिर्फ मीडिया, राजनैतिक दलों में परिवर्तन का सामर्थ्य नहीं रहा, जनता अंधी है, उसके लिए राजनीति उस औजार की तरह है जिसका उपयोग वो खुद के लिए कम, गरीबी, बेचारगी और शोषण के उन प्रतीकों के विरुद्ध ज्यादा करती है,  जिन प्रतीकों का निर्माण इन राजनैतिक दलों ने खुद किया है. समय है कि ये अखबार जनता के प्रति अपने सरोकारों को सबसे उपर रखें नहीं तो आने वाले दिनों में जिस तरह से सत्ता अखबारों को दुत्कार रही है यही काम जनता करेगी.
लेखक आवेश तिवारी प्रतिभाशाली जर्नलिस्‍ट हैं. वे उत्‍तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में सक्रिय पत्रकारिता करते हुए लेखनी को धार देने में जुटे हुए हैं.

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