रविवार, 15 जनवरी 2012

न्यू मीडिया का धमाल, सभी तरह के मीडिया का कॉकटेल





बालेन्दु शर्मा दाधीच
यूं तो दो-ढाई दशक की जीवनयात्रा के बाद शायद ‘न्यू मीडिया’ का नाम ‘न्यू मीडिया’ नहीं रह जाना चाहिए क्योंकि वह सुपरिचित, सुप्रचलित और परिपक्व सेक्टर का रूप ले चुका है। लेकिन शायद वह हमेशा ‘न्यू मीडिया’ ही बना रहे क्योंकि पुरानापन उसकी प्रवृत्ति ही नहीं है। वह जेट युग की रफ्तार के अनुरूप अचंभित कर देने वाली तेजी के साथ निरंतर विकसित भी हो रहा है और नए पहलुओं, नए स्वरूपों, नए माध्यमों, नए प्रयोगों और नई अभिव्यक्तियों से संपन्न भी होता जा रहा है। नवीनता और सृजनात्मकता नए जमाने के इस नए मीडिया की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। यह कल्पनाओं की गति से बढ़ने वाला मीडिया है जो संभवत: निरंतर बदलाव और नएपन से गुजरता रहेगा, और नया बना रहेगा।
फिर भी न्यू मीडिया को लेकर भ्रम की स्थिति आज भी कायम है। अधिकांश लोग न्यू मीडिया का अर्थ इंटरनेट के जरिए होने वाली पत्रकारिता से लगाते हैं। लेकिन न्यू मीडिया समाचारों, लेखों, सृजनात्मक लेखन या पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। वास्तव में न्यू मीडिया की परिभाषा पारंपरिक मीडिया की तर्ज पर दी ही नहीं जा सकती। न सिर्फ समाचार पत्रों की वेबसाइटें और पोर्टल न्यू मीडिया के दायरे में आते हैं बल्कि नौकरी ढूंढने वाली वेबसाइट, रिश्ते तलाशने वाले पोर्टल, ब्लॉग, स्ट्रीमिंग ऑडियो-वीडियो, ईमेल, चैटिंग, इंटरनेट-फोन, इंटरनेट पर होने वाली खरीददारी, नीलामी, फिल्मों की सीडी-डीवीडी, डिजिटल कैमरे से लिए फोटोग्राफ, इंटरनेट सर्वेक्षण, इंटरनेट आधारित चर्चा के मंच, दोस्त बनाने वाली वेबसाइटें और सॉफ्टवेयर तक न्यू मीडिया का हिस्सा हैं। न्यू मीडिया को पत्रकारिता का एक स्वरूप भर समझने वालों को अचंभित करने के लिए शायद इतना काफी है, लेकिन न्यू मीडिया इन तक भी सीमित नहीं है। ये तो उसके अनुप्रयोगों की एक छोटी सी सूची भर है और ये अनुप्रयोग निरंतर बढ़ रहे हैं। जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, तब कहीं न कहीं, कोई न कोई व्यक्ति न्यू मीडिया का कोई और रचनात्मक अनुप्रयोग शुरू कर रहा होगा।
न्यू मीडिया अपने स्वरूप, आकार और संयोजन में मीडिया के पारंपरिक रूपों से भिन्न और उनकी तुलना में काफी व्यापक है। पारंपरिक रूप से मीडिया या मास मीडिया शब्दों का इस्तेमाल किसी एक माध्यम पर आश्रित मीडिया के लिए किया जाता है, जैसे कि कागज पर मुद्रित विषयवस्तु का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रिंट मीडिया, टेलीविजन या रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से दर्शक या श्रोता तक पहुंचने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। न्यू मीडिया इस सीमा से काफी हद तक मुक्त तो है ही, पारंपरिक मीडिया की तुलना में अधिक व्यापक भी है।
पत्रकारिता ही क्या, न्यू मीडिया तो इंटरनेट की सीमाओं में बंधकर रहने को भी तैयार नहीं है। और तो और, यह कंप्यूटर आधारित मीडिया भर भी नहीं रह गया है। न्यू मीडिया का दायरा इन सब सीमाओं से कहीं आगे तक है। हां, 1995 के बाद इंटरनेट के लोकप्रिय होने पर न्यू मीडिया को अपने विकास और प्रसार के लिए अभूतपूर्व क्षमताओं से युक्त एक स्वाभाविक माध्यम जरूर मिल गया।
न्यू मीडिया किसी भी आंकिक (डिजिटल) माध्यम से प्राप्त की, प्रसंस्कृत की या प्रदान की जाने वाली सेवाओं का समग्र रूप है। इस मीडिया की विषयवस्तु की रचना या प्रयोग के लिए किसी न किसी तरह के कंप्यूटिंग माध्यम की जरूरत पड़ती है। जरूरी नहीं कि वह माध्यम कंप्यूटर ही हो। वह किसी भी किस्म की इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल युक्ति हो सकती है जिसमें आंकिक गणनाओं या प्रोसेसिंग की क्षमता मौजूद हो, जैसे कि मोबाइल फोन, पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट (पीडीए), आई-पोड, जून, सोनी पीएसपी, ई-बुक रीडर जैसी युक्तियां और यहां तक कि बैंक एटीएम मशीन तक। न्यू मीडिया के अधिकांश माध्यमों में उनके उपभोक्ताओं के साथ संदेशों या संकेतों के आदान-प्रदान की क्षमता होती है जिसे हम ‘इंटरएक्टिविटी’ के रूप में जानते हैं।
मिलन मीडिया और कम्प्यूटिंग का
न्यू मीडिया के दायरे में ऐसे सभी पाठ (टेक्स्ट), चित्र, चलचित्र, ध्वनियां और सेवाएं आती हैं जिन्हें डिजिटल माध्यमों से प्रोसेस या संगणित किया जा सकता है। इसे दो अलग-अलग क्षेत्रों – मीडिया और कम्प्यूटिंग के सम्मिलन (कनवरजेंस) के रूप में भी देखा जा सकता है। अनोखा संयोग है कि इन दोनों ही क्षेत्रों के विकास की यात्रा मोटे तौर पर 1830 के दशक में शुरू हुई थी। हालांकि उन्हें एक साथ आने में करीब डेढ़ सौ साल का समय लग गया। 1980 के दशक में जब कम्प्यूटर ने काली स्क्रीन से आगे, चित्रात्मक स्क्रीन की ओर कदम बढ़ाया (जिसे ग्राफिकल यूजर इंटरफेस कहते हैं), तब न्यू मीडिया का उभार शुरू हुआ। इसके अगले दशक में शिक्षा और मनोरंजन के लिए कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी-रोम) की लोकप्रियता का दौर आया तो न्यू मीडिया को मजबूती से पांव जमाने का मौका मिला। फिर 1995 के बाद इंटरनेट के प्रसार के साथ-साथ न्यू मीडिया का स्वर्णयुग शुरू हुआ जो आज भी जारी है।
न्यू मीडिया सीमाओं के विरुद्ध कार्य करने वाली शक्ति के रूप में उभरा है। उसे न समय की सीमा प्रभावित करती है और न भौगोलिक सीमा। खबर के वेबसाइट पर डाले जाने की देर है कि वह पाठक तक भी पहुंच जाती है, भले ही वह विश्व के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो। न प्रिंट मीडिया की तरह सुबह तक का इंतजार और न टेलीविजन की तरह अपने उपग्रह के फुटप्रिंट (कवरेज क्षेत्र) तक सिमटे रहने की सीमा। उसकी विषयवस्तु चूंकि आंकिक (डिजिटल) है इसलिए स्थायी भी है। वर्षों सहेजकर रखिए वह न खराब होगी, न उसकी गुणवत्ता में कोई फर्क आएगा। टेलीविजन चैनलों में बीटा और यूमैटिक टेपों का प्रयोग कर चुके पत्रकारों को याद होगा कि किस तरह वीडियो को एक टेप से दूसरी टेप में ट्रांसफर करने पर जेनरेशन लॉस आ जाता था! अगर किसी वीडियो को चार-पांच बार एक से दूसरी टेप में ट्रांसफर किया जा चुका है तो फिर लिप-सिंक की समस्या (वीडियो में बोले जा रहे शब्दों का उनके उच्चारण के कुछ क्षण बाद सुनाई देना) जैसे ही टेलीविजन चैनलों ने डिजिटल माध्यमों को अपनाया, पुरानी पीढ़ी की समस्याएं स्वत: दूर हो गईं।
लेकिन ये अकेली सीमाएं नहीं हैं जिन्हें न्यू मीडिया ने ध्वस्त किया है। उसने अलग-अलग किस्म की सूचनाओं के संप्रेषण के लिए अलग-अलग माध्यम के इस्तेमाल की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। अखबारी खबरें पढ़ने के लिए मुद्रित पन्नों, आकाशवाणी की खबरें सुनने के लिए रेडियो और टीवी चैनलों की खबरें देखने के लिए टेलीविजन सैट जैसे माध्यम अब अपरिहार्य नहीं रहे। कंप्यूटर, स्मार्टफोन और न्यू मीडिया के अन्य डिजिटल माध्यमों ने सूचनाओं के भिन्न-भिन्न स्वरूपों (मुद्रित पाठ, ध्वनि, वीडियो, चित्र आदि) को एक साथ आने के लिए मंच उपलब्ध कराया है। सूचनाओं के ये सभी स्वरूप एक ही वेबपेज पर सौहार्द के साथ रह सकते हैं और एक दूसरे की विषयवस्तु को समृद्ध करते हैं। डिजिटल माध्यम होने के कारण पाठक चाहे तो उन्हें अपने कंप्यूटर या अन्य डिजिटल युक्ति में सहेजकर भी रख सकता है। वह चाहे तो अपने कंप्यूटर में उसे संपादित भी कर सकता है।
(लेखक ‘प्रभासाक्षी’ के संपादक एवं सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ हैं)

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