सोमवार, 16 जनवरी 2012

पत्रकारिता में बदलाव : कल आज और कल


लोकेश गुर्जर  
पत्रकारिता यानि मीडिया यानि लोकतंत्र  का चौथा स्तम्भ पढने में ये शब्द  शायद  भारी भरकम लगे पर आज के समय में ये शब्द उतने ही खोखले हों गए हैI कभी पत्रकारिता को  एक क्रांति के रूप में देखा गया था अब वही  क्रांति धीरे -धीरे बिज़नेस  का रूप धारण कर चुकी है और आगे चलकर शायद  ऐसी सब्जी मंडी जहां औने पौने दाम में कुछ भी बेचा जा सकता है I 
देश में अखबार की शुरुआत के साथ शुरू हुआ बदलाव का दौर, राजा राम मोहन राय जैसे समाज सेवको ने इसे एक क्रांति का रूप दिया I धीरे-धीरे इस क्रांति ने जन व्यापक को अपने साथ जोड़ा और शुरू हुई ऐसी शुरुआत  जो देश आज़ाद होने पर ही रुकी। पत्रकारिता का जो असली उद्देश्य था वो पूरा हो चूका था। वो वह दौर था जहां अखबार में छपी खबर को सूरज पूर्व से निकलता है जितना सच मन जाता था।
 और अब का पत्रकारिता का दौर ऐसा दौर है जहा सिर्फ चाटुकारिता की पत्रकारिता होने लगी है ! जहां आगे निकलने की होड़ में उजुल-फिजुल छापने की होड़ तो कहीं अपने आप को सबसे तेज और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अंधविश्वास और बिना पुष्टि के खबर चलने की होड़। कुछ तो दुनिया खत्म   और भूत प्रेत चलाने से भी पीछे नहीं रहते। पत्रकारिता का असली कर्त्तव्य कहीं विलुप्त सा हो गया है। रही सही कसर कुकुरमुत्ते की तरह उगे टीवी चैनल पूरा कर रहे है। सिर्फ एक या दो टीवी चैनल को छोड़ दें, तो बाकी   मुन्नी बदनाम, या दुनिया खत्म होने को ही अपनी लीड  स्टोरी मानते है। हद तो तब हो गयी जब उपायुक्त के पालतू कुत्ते के खोने की खबर दिन भर चलती रही। ऊपर से पेड न्यूज़ नाम का कैंसर भी मीडिया की विश्वसनीयता  को लगातार  खोखला किये जा रहा है ।
 आने वाले टाइम में भी अगर यही पत्रकारिता का हाल रहा तो आम आदमी का नेताओं की तरह पत्रकारों से भी विश्वास उठ जाएगा। एक आम आदमी होने के नाते मैं तो बस भगवान् से यही प्राथर्ना कर सकता हूं की भगवान् मीडिया को सद्बुद्धि दे

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